scorecardresearch
Monday, 9 March, 2026
होमदेशHC ने CBI पर की गई प्रतिकूल टिप्पणियों पर लगाई रोक, ट्रायल कोर्ट को PMLA कार्यवाही टालने का निर्देश

HC ने CBI पर की गई प्रतिकूल टिप्पणियों पर लगाई रोक, ट्रायल कोर्ट को PMLA कार्यवाही टालने का निर्देश

न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने ये निर्देश CBI की ओर से दायर उस अपील की सुनवाई के दौरान दिए, जिसमें ट्रायल कोर्ट के डिस्चार्ज आदेश को चुनौती दी गई है. सुनवाई के दौरान प्रतिवादियों की ओर से कोई भी उपस्थित नहीं हुआ, जिसके बाद अदालत ने उन्हें नोटिस जारी किया.

Text Size:

नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को दिल्ली आबकारी नीति मामले में ट्रायल कोर्ट के उस आदेश में CBI और जांच अधिकारी के खिलाफ की गई प्रतिकूल टिप्पणियों के प्रभाव पर रोक लगा दी, जिसमें सभी 23 आरोपियों को आरोपों से मुक्त कर दिया गया था. साथ ही हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को संबंधित PMLA मामले की कार्यवाही फिलहाल टालने का निर्देश भी दिया.

न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने ये निर्देश CBI की ओर से दायर उस अपील की सुनवाई के दौरान दिए, जिसमें ट्रायल कोर्ट के डिस्चार्ज आदेश को चुनौती दी गई है. सुनवाई के दौरान प्रतिवादियों की ओर से कोई भी उपस्थित नहीं हुआ, जिसके बाद अदालत ने उन्हें नोटिस जारी किया.

सुनवाई के दौरान CBI की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को मामले की पृष्ठभूमि बताई और कहा कि ट्रायल कोर्ट का आदेश बिना मुकदमा चलाए ही “बरी करने” जैसा है. उन्होंने दलील दी कि कथित साजिश में रिश्वत की रकम हवाला चैनलों के जरिए कई किस्तों में दी गई थी और इसके समर्थन में बैठकों और फॉरेंसिक साक्ष्यों के रूप में सबूत भी जुटाए गए हैं.

मेहता ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने डिस्चार्ज के चरण में कानून का गलत इस्तेमाल किया और अभियोजन पक्ष के सबूतों की ऐसे जांच की जैसे पूरा मुकदमा चलने के बाद फैसला दिया जा रहा हो. उन्होंने कहा कि साजिश से जुड़े मामलों में सबूतों की अलग-अलग कड़ियों को जोड़कर ही मुकदमे के दौरान अपराध साबित होता है और ऐसे मामलों में खुले तौर पर किए गए सीधे सबूत हमेशा उपलब्ध नहीं होते.

सॉलिसिटर जनरल ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 164 के तहत दर्ज सरकारी गवाह के बयान को गलत तरीके से नजरअंदाज किया. उनके मुताबिक, स्थापित कानूनी सिद्धांत बताते हैं कि आरोप तय करने के चरण में ऐसे बयानों का काफी महत्व होता है और इस शुरुआती चरण में अतिरिक्त पुष्टि की जरूरत नहीं होती.

उन्होंने अदालत को यह भी बताया कि जांच एजेंसी ने जांच के दौरान “बहुत बारीकी से सबूत” जुटाए हैं और ट्रायल कोर्ट के निष्कर्ष गलत हैं और कार्यवाही के गलत चरण में दिए गए हैं. उन्होंने कहा कि सभी आरोपियों को बिना मुकदमा चलाए ही आरोपों से मुक्त कर देने से जांच एजेंसी की पूरी प्रक्रिया बेकार हो जाएगी.

प्रतिकूल टिप्पणियों के मुद्दे पर मेहता ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने जांच अधिकारी और एजेंसी के खिलाफ कड़ी टिप्पणियां की थीं, जो डिस्चार्ज के चरण में उचित नहीं थीं. इस दलील को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने उन टिप्पणियों के प्रभाव पर रोक लगा दी.

हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (PMLA) के तहत जुड़े मामले की कार्यवाही फिलहाल ट्रायल कोर्ट में स्थगित रखी जाए, जब तक कि हाईकोर्ट इस अपील पर आगे सुनवाई नहीं कर लेता.

यह अपील 27 फरवरी को राउज एवेन्यू कोर्ट के विशेष न्यायाधीश जितेंद्र सिंह द्वारा दिए गए आदेश के खिलाफ दायर की गई है. उस आदेश में CBI द्वारा दर्ज दिल्ली आबकारी नीति 2021-22 मामले में सभी 23 आरोपियों को आरोपों से मुक्त कर दिया गया था. ट्रायल कोर्ट ने कहा था कि मामले में प्रथम दृष्टया कोई मामला नहीं बनता और आपराधिक साजिश के आरोप न्यायिक जांच में टिक नहीं पाए.

CBI ने इस आदेश को चुनौती देते हुए कहा है कि ट्रायल कोर्ट ने आरोप तय करने के चरण से जुड़े स्थापित कानूनी सिद्धांतों का गलत इस्तेमाल किया और सबूतों का विस्तृत मूल्यांकन कर दिया, जो इस शुरुआती चरण में स्वीकार्य नहीं है. एजेंसी ने यह भी कहा कि अदालत ने सरकारी गवाह से जुड़े कानून को गलत समझा और जांच के दौरान जुटाए गए महत्वपूर्ण सबूतों को नजरअंदाज कर दिया.

यह मामला उन आरोपों से जुड़ा है कि अब वापस ली जा चुकी दिल्ली आबकारी नीति कुछ निजी लाइसेंसधारकों को अनुचित लाभ देने के लिए बनाई गई थी, जिसके बदले कथित रूप से रिश्वत और वित्तीय नुकसान हुआ. ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपों से मुक्त किए गए लोगों में पूर्व दिल्ली मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया भी शामिल हैं.

share & View comments