गुरुग्राम: पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने पुलिस सुरक्षा की मांग करने वाले एक लिव-इन कपल की याचिका खारिज कर दी. अदालत ने कहा कि ऐसे रिश्ते भारतीय समाज के एक वर्ग द्वारा पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव में अपनाई गई “आधुनिक जीवनशैली” को दर्शाते हैं, जो भारतीय परंपराओं के विपरीत है. अदालत ने यह भी कहा कि जोड़े जब अपने माता-पिता का घर छोड़कर साथ रहने लगते हैं, तो इससे परिवार की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचती है और माता-पिता के सम्मान के साथ जीने के अधिकार का उल्लंघन होता है.
दोनों याचिकाकर्ताओं ने संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत हाईकोर्ट में याचिका दायर कर अपने परिजनों से कथित उत्पीड़न से सुरक्षा और साथ रहने की अनुमति मांगी थी.
अदालत में उन्होंने कहा कि वे दोनों बालिग हैं, आपसी सहमति से रिश्ते में हैं और शादी करना चाहते हैं.
कपल ने 1 जून को पटियाला के पुलिस अधीक्षक को भी एक आवेदन दिया था. याचिका के अनुसार, परिवार के सदस्य महिला पर पुरुष का साथ छोड़ने का दबाव बना रहे थे और पुरुष को झूठे आपराधिक मामले में फंसाने की धमकी दे रहे थे.
हालांकि, याचिका में यह भी बताया गया कि पुरुष अभी शादी की कानूनी उम्र तक नहीं पहुंचा है और वह उम्र पूरी होने के बाद ही अपनी साथी से विवाह करेगा.
अदालत ने डी. वेलुसामी बनाम डी. पैचैयम्मल मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया. इस फैसले के अनुसार, किसी लिव-इन रिश्ते को कानूनी मान्यता पाने के लिए दोनों पक्षों को समाज के सामने पति-पत्नी की तरह रहना चाहिए, शादी की कानूनी उम्र पूरी होनी चाहिए और वे विवाह के लिए अन्य सभी शर्तों को पूरा करते हों.
याचिकाकर्ताओं ने संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला दिया, जो गरिमा के साथ जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है, लेकिन अदालत ने कहा कि यही अनुच्छेद माता-पिता को भी सम्मान और गरिमा के साथ जीने का अधिकार देता है. अदालत के अनुसार, घर छोड़कर साथ रहने का फैसला करके याचिकाकर्ताओं ने माता-पिता के इस अधिकार को प्रभावित किया है.
जस्टिस मौदगिल ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट की अन्य पीठें पहले भी ऐसे मामलों में सुरक्षा देने से इनकार कर चुकी हैं, क्योंकि इससे समाज की संरचना पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है.
अदालत ने कहा कि केवल कुछ दिनों तक साथ रहना और सामान्य दावे कर देना, कानून की नजर में लिव-इन रिलेशनशिप साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है.
अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे आधार पर पुलिस सुरक्षा देना एक तरह से उस रिश्ते को अप्रत्यक्ष रूप से मान्यता देना होगा, जिसे अदालत ने “अवैध संबंध” बताया. अदालत के अनुसार, अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाली स्वतंत्रता भी कानून की सीमाओं के भीतर ही लागू होती है.
इन्हीं टिप्पणियों के साथ अदालत ने याचिका खारिज कर दी. याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता कोमल सिद्धू ने पैरवी की.
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