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Sunday, 17 May, 2026
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सेक्स रेशियो में गिरावट से हरियाणा सरकार चिंतित—अब पंडितों, मौलवियों और ग्रंथियों की मदद ले रही

इस साल जनवरी से अप्रैल के बीच, राज्य में 76,305 लड़कियों के मुकाबले 84,953 लड़कों का जन्म दर्ज किया गया है. पूरे राज्य में धार्मिक नेताओं को निर्देश दिए जा रहे हैं कि वे नवविवाहित जोड़ों को लिंग चयन के विरुद्ध परामर्श दें.

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गुरुग्राम: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 22 जनवरी 2015 को पानीपत से बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान शुरू किए जाने के 11 साल बाद हरियाणा में हाल के वर्षों का सबसे खराब जन्म लिंग अनुपात दर्ज किया गया है.

2026 के पहले चार महीनों में जन्म के समय लिंग अनुपात यानी एसआरबी घटकर 1,000 लड़कों पर 898 लड़कियां रह गया. 2025 के पहले चार महीनों में यह 909 था और पूरे पिछले साल में 923 था. राज्य स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक जनवरी से अप्रैल के बीच दर्ज 1,61,258 जन्मों में 84,953 लड़के और 76,305 लड़कियां थीं.

इस गिरावट ने सरकार को इतना चिंतित कर दिया है कि उसने धार्मिक नेताओं की मदद ली है. पूरे राज्य में पंडितों, मौलवियों और ग्रंथियों को नवविवाहितों को लिंग चयन के खिलाफ समझाने के निर्देश दिए जा रहे हैं. यह दिखाता है कि प्रशासनिक कोशिशें नाकाम रही हैं.

चरखी दादरी में स्थिति खास तौर पर ज्यादा खराब हुई है. 2016 में भिवानी से अलग बनाए गए इस जिले में 2020 में पहले पूरे साल के आंकड़ों में एसआरबी 891 था. यह 2025 में बढ़कर 913 हुआ, लेकिन 2026 के पहले चार महीनों में गिरकर 768 रह गया.

हालांकि हर जिले में गिरावट नहीं आई है. रेवाड़ी में 2025 के 882 से सुधार होकर इस साल जनवरी-अप्रैल में 906 हो गया. आर्थिक रूप से पिछड़ा होने के बावजूद अपेक्षाकृत बेहतर एसआरबी के लिए जाना जाने वाला नूंह 918 से थोड़ा गिरकर 913 पर आ गया और अब भी राज्य के बेहतर प्रदर्शन करने वाले जिलों में शामिल है.

Graphic: Deepakshi Sharma | ThePrint
ग्राफ़िक: दीपाक्षी शर्मा | दिप्रिंट

2026 का ब्योरा

जिला स्तर के आंकड़ों में सबसे चौंकाने वाले नंबर सामने आए हैं.

चरखी दादरी में इस साल पहले चार महीनों में एसआरबी सिर्फ 768 दर्ज किया गया, जबकि 2025 की इसी अवधि में यह 875 था. अंबाला 843 पर रहा, जबकि जनवरी-अप्रैल 2025 में यह 906 था. महेंद्रगढ़ 899 से गिरकर 847 पर पहुंच गया और फतेहाबाद इसी अवधि में 980 से गिरकर 893 हो गया.

झज्जर और रोहतक, जो पहले बेहतर प्रदर्शन करने वाले जिलों में थे, दोनों 876 पर रहे. ये क्रमशः 939 और 881 से नीचे आए हैं.

2025 के पूरे साल के आंकड़ों से तुलना भी काफी तेज गिरावट दिखाती है. पिछले साल पंचकूला 971 पर था, फतेहाबाद 961, पानीपत 951 और करनाल 944 पर था. फतेहाबाद की गिरावट—961 से 893—राज्य में सबसे गंभीर गिरावटों में से एक है. 2025 में सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाला पंचकूला अब 902 पर आ गया है. सिरसा 937 से गिरकर 883 और हिसार 926 से गिरकर 888 पर पहुंच गया.

2011 की स्थिति

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान शुरू करने की जरूरत 2011 की जनगणना से पैदा हुई थी. उस समय हरियाणा का एसआरबी भारत में सबसे खराब राज्यों में था, जो 879 था. 0 से 6 साल के बच्चों का बाल लिंग अनुपात 1,000 लड़कों पर 834 लड़कियां था, जो बड़े राज्यों में सबसे खराब था.

उसके बाद सालाना एसआरबी में लगातार सुधार हुआ. 2015 में 876 से बढ़कर 2016 में 900 हुआ, 2017 और 2018 में 914 रहा, 2019 में 923 के उच्च स्तर पर पहुंचा और कोविड के दौरान गिरावट के बाद 2025 में फिर 923 पर पहुंच गया. लेकिन 2026 के चार महीनों ने इस प्रगति पर सवाल खड़े कर दिए हैं.

क्या IAS तबादलों से जुड़ा है मामला?

अभियान की शुरुआत से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों के लगातार तबादले भी गिरावट की एक वजह हो सकते हैं.

एक अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, “जब लगातार नेतृत्व नहीं होता, तो जिले इन लक्ष्यों को गंभीरता से नहीं लेते. उन्हें पता होता है कि आज जो अधिकारी उनकी निगरानी कर रहा है, वह कुछ महीनों में चला जाएगा.”

उसी अधिकारी ने कहा कि एक महीने का एसआरबी आंकड़ा ज्यादा मायने नहीं रखता, क्योंकि जन्म की रिपोर्ट घटना के 21 दिन बाद तक दर्ज हो सकती है. लेकिन चार महीनों तक लगातार गिरावट होना अलग बात है.

पिछले साल जब आईएएस अधिकारी सुधीर राजपाल अतिरिक्त मुख्य सचिव (स्वास्थ्य) थे, तब एसआरबी सुधारने के लिए राज्य स्तरीय टास्क फोर्स बनाई गई थी. राजपाल की अध्यक्षता वाली समिति हर हफ्ते बैठक करती थी. लेकिन इस साल जनवरी में राजपाल के गृह सचिव बनने के बाद ये साप्ताहिक बैठकें पूरी तरह बंद हो गईं.

मशीनरी सक्रिय हुई

अतिरिक्त मुख्य सचिव (स्वास्थ्य) सुमिता मिश्रा ने इस हफ्ते की शुरुआत में राज्यभर के सिविल सर्जनों के साथ बैठक की और कई निर्देश जारी किए.

उन्होंने सभी जिलों को अवैध लिंग जांच के खिलाफ छापेमारी और निरीक्षण तेज करने और जमीनी स्तर पर निगरानी मजबूत करने के निर्देश दिए. उन्होंने कहा कि प्री-कन्सेप्शन एंड प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्निक्स एक्ट यानी पीसी एंड पीएनडीटी एक्ट और मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट को बिना किसी अपवाद के लागू किया जाना चाहिए.

मिश्रा ने यह भी निर्देश दिया कि जिला स्तरीय समिति और जिला टास्क फोर्स की बैठकें डिप्टी कमिश्नरों की अध्यक्षता में तीन कार्य दिवस के भीतर आयोजित की जाएं और उसके बाद नियमित रूप से जारी रहें. फील्ड स्टाफ की जवाबदेही सख्त की जाए और मई 2026 के अंत तक पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में एसआरबी सुधारने के लिए हर संभव कोशिश की जाए.

सामाजिक भागीदारी को लेकर उन्होंने धार्मिक नेताओं, सामुदायिक संगठनों और स्थानीय संस्थाओं की सक्रिय भागीदारी की मांग की. उन्होंने खास तौर पर निर्देश दिया कि शादी कराने वाले पंडित, मौलवी और ग्रंथी नवविवाहित जोड़ों को लिंग चयन से दूर रहने के लिए प्रेरित करें.

उन्होंने गर्भावस्था के मामलों पर ज्यादा निगरानी रखने की भी मांग की, खास तौर पर उन दंपतियों पर जिनकी पहले से एक या अधिक बेटियां हैं, ताकि संदिग्ध गर्भपात के मामलों में समय रहते हस्तक्षेप किया जा सके.

उन्होंने निर्देश दिया कि सभी कार्रवाई और जागरूकता अभियानों का मीडिया और सोशल मीडिया के जरिए व्यापक प्रचार किया जाए. अधिकारियों को साफ चेतावनी दी गई कि लापरवाही पर सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी.

‘4 महीने बहुत छोटा समय है’

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय की प्रोफेसर डॉ. राजेश्वरी, जिन्होंने हरियाणा में जेंडर और जनसांख्यिकीय मुद्दों पर शोध का मार्गदर्शन किया है, ने चार महीने के आंकड़ों को लेकर ज्यादा निष्कर्ष निकालने से सावधान रहने को कहा.

उन्होंने कहा, “हमें सावधान रहना चाहिए कि चार महीने के आंकड़ों को अंतिम फैसला न मान लें. जनवरी से अप्रैल तक का समय सांख्यिकीय रूप से बहुत कमजोर आधार है. जन्म की रिपोर्ट 21 दिन तक की देरी से दर्ज हो सकती है, मौसमी बदलाव भी होते हैं और जिला स्तर के आंकड़े कम समय में तेजी से बदल सकते हैं.”

उन्होंने कहा कि पूरी तस्वीर सालभर के आंकड़े आने के बाद ही सामने आएगी. उन्होंने कहा, “इस चरण पर इसे पूरी तरह गिरावट कहना जल्दबाजी होगी और सच कहें तो वैज्ञानिक तौर पर भी सही नहीं होगा.”

लेकिन डॉ. राजेश्वरी ने साफ कहा कि हरियाणा के एसआरबी को लेकर जो चिंता है वह सही है और इसके पीछे के ढांचागत कारणों को अब तक पूरी तरह हल नहीं किया गया है.

नूंह के अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन पर डॉ. राजेश्वरी ने कहा, “जहां प्रजनन दर ज्यादा रहती है, वहां बेटियों के बचने की सांख्यिकीय संभावना ज्यादा रहती है, क्योंकि बेटे की चाहत का दबाव थोड़ा कम होता है. यह एक कड़वा गणित है, लेकिन सच्चाई है.”

उन्होंने समझाया कि जैसे-जैसे लोग छोटे परिवार की सोच अपनाते हैं, हर जन्म पर बेटे की चाहत का दबाव बढ़ जाता है. उन्होंने कहा, “ऐसे समाज में जहां सोच अब तक नहीं बदली है, वहां परिवार नियोजन का पहला शिकार लड़की बनती है.”

डॉ. राजेश्वरी ने नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे यानी एनएफएचएस-5 के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि बेटे की चाहत अब भी गहराई से मौजूद है. उन्होंने कहा, “ज्यादातर माता-पिता ने कहा कि वे पहला बच्चा बेटा चाहते हैं और अगर उन्हें सिर्फ एक बच्चा हो, तो वे भी बेटा ही चाहते हैं. इसमें कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है.”

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट एनएफएचएस-5 में कहा गया कि बहुत बड़ी संख्या में पुरुषों और महिलाओं यानी 81 प्रतिशत ने कहा कि वे पहला बच्चा बेटा चाहते हैं और अगर सिर्फ एक बच्चा हो तो भी बेटा ही चाहेंगे. सर्वे में यह भी पाया गया कि यह चाहत सीधे प्रजनन संबंधी फैसलों को प्रभावित करती है. जिन महिलाओं के पास पहले से बेटा होता है, उनके गर्भनिरोधक इस्तेमाल करने की संभावना ज्यादा होती है.

डॉ. राजेश्वरी ने माना कि लड़कियों के स्कूल और कॉलेजों में दाखिले में सुधार हुआ है, लेकिन उन्होंने साफ कहा कि सिर्फ शिक्षा से घरों की सत्ता संरचना नहीं बदलती.

उन्होंने कहा, “एक बेटी स्कूल और कॉलेज जा सकती है, लेकिन शादी, संपत्ति, शादी के बाद रहने की जगह और बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल जैसे फैसले अब भी गहरे पितृसत्तात्मक सोच के हिसाब से होते हैं. सोच में बदलाव दाखिले के आंकड़ों जितनी तेजी से नहीं आता.”

खुद आंकड़ों की विश्वसनीयता पर उन्होंने संतुलित लेकिन साफ राय रखी. उन्होंने कहा, “जनगणना के बिना—और अब 2011 की जनगणना को 15 साल हो चुके हैं और नया डेटा नहीं आया—हम प्रशासनिक आंकड़ों पर काम कर रहे हैं, जिनकी अपनी सीमाएं हैं. हाल के वर्षों में कुछ जिलों के बहुत ऊंचे आंकड़ों पर जनसांख्यिकी विशेषज्ञों को हमेशा सवाल रहे हैं.”

उनका आकलन साफ था. “हरियाणा में बेटों की चाहत उतनी तेजी से नहीं बदल रही जितना अभियान की तस्वीरों से दिखाया गया. अभियान ने पहचान बनाई है, बदलाव नहीं.”

उन्होंने कहा कि असली समस्या यह समझने में है कि परिवारों के लिए बेटा होना अब भी आर्थिक और सामाजिक रूप से क्यों जरूरी माना जाता है. उन्होंने कहा, “विरासत की व्यवस्था, बुजुर्गों की सुरक्षा की उम्मीदें, पूरा सामाजिक ढांचा अब भी बेटे की तरफ झुका हुआ है. जब तक ये ढांचागत कारण नहीं बदलेंगे, तब तक लिंग अनुपात आज जैसी उठापटक के लिए संवेदनशील रहेगा.”

ग्राफ़िक: दीपाक्षी शर्मा | दिप्रिंट

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ

ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक वुमेन्स एसोसिएशन यानी एआईडीडब्ल्यूए की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जगमती सांगवान ने कहा कि जब बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान शुरू हुआ था, तब राज्य सरकार ने कुछ गंभीरता दिखाई थी. लेकिन बाद में उसका ध्यान प्रचार पर ज्यादा चला गया और अभियान के संसाधनों का बड़ा हिस्सा विज्ञापनों पर खर्च हुआ, लागू करने पर नहीं.

सांगवान ने कहा कि जनसांख्यिकी विशेषज्ञ हाल के वर्षों में कुछ जिलों में दर्ज ऊंचे एसआरबी आंकड़ों—जैसे 2025 में पंचकूला का 971—को भरोसेमंद नहीं मानते, क्योंकि इतने कम समय में इतना बड़ा सुधार सांख्यिकीय रूप से संभव नहीं लगता.

उन्होंने कहा, “जेंडर अनुपात का एकमात्र भरोसेमंद डेटा वही होता है जो जनगणना के बाद आता है, क्योंकि यह घर-घर जाकर जुटाया जाता है. लेकिन 2011 की जनगणना के बाद कोई नया डेटा नहीं आया है.”

सांगवान ने कहा कि लिंग अनुपात सुधारने के लिए महिलाओं की स्थिति सुधारनी होगी. उन्होंने आरोप लगाया कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर पर्याप्त रोक नहीं लग रही और पढ़ी-लिखी महिलाओं को रोजगार नहीं मिल रहा.

सांगवान ने आगे कहा, “अगर सरकार लिंग अनुपात सुधारना चाहती है, तो उसे एक तरफ पीसी एंड पीएनडीटी एक्ट को सख्ती से लागू करना होगा और दूसरी तरफ महिलाओं की स्थिति सुधारने पर काम करना होगा.”

CAG ने क्या उजागर किया था

बीती बचाओ बेटी पढ़ाओ के लागू होने को लेकर चेतावनी के संकेत शुरुआत से ही दिखने लगे थे. हरियाणा विधानसभा में 2017 में पेश अपनी ऑडिट रिपोर्ट में, जो जनवरी 2015 से मार्च 2016 की अवधि को कवर करती थी, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी सीएजी ने तीन जिलों की जांच की थी. महेंद्रगढ़, जिसे सबसे खराब बाल लिंगानुपात के कारण चुना गया था. पानीपत, जहां यह सबसे बेहतर था. और सोनीपत, जहां इस योजना के तहत सबसे ज्यादा खर्च हुआ था.

रिपोर्ट में कहा गया कि पानीपत के लिए तय एसआरबी लक्ष्य मार्च 2016 तक हासिल नहीं किया जा सका था. यही वह जिला था जहां से इस अभियान की शुरुआत हुई थी. ऑडिट में पाया गया कि हरियाणा के 20 जिलों में योजना लागू होने के बावजूद राज्य स्तर पर सिर्फ एक बैठक हुई और जिला स्तर पर एक भी बैठक नहीं हुई.

सीएजी ने यह भी कहा कि फंड का इस्तेमाल योजना के उद्देश्य से अलग कामों में किए जाने का शक है. पैसे से बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ के नारे छपे लैपटॉप बैग और मग खरीदे गए थे.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि जिन तीन जिलों की जांच हुई, वहां स्कूलों को दिए जाने वाले तय 15 लाख रुपये की जगह सिर्फ 1 लाख रुपये ही दिए गए.

आलोचनाओं पर जवाब देते हुए अतिरिक्त मुख्य सचिव (स्वास्थ्य) सुमिता मिश्रा ने दिप्रिंट से कहा कि राज्य सरकार ने लिंगानुपात सुधारने के प्रयास तेज कर दिए हैं. उन्होंने टेक्स्ट मैसेज में कहा, “राज्यभर के सिविल सर्जनों को पीसी एंड पीएनडीसी एक्ट और मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट को प्रभावी तरीके से लागू करने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि कन्या भ्रूण हत्या रोकी जा सके और लिंगानुपात सुधारा जा सके.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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