नयी दिल्ली, 14 फरवरी (भाषा) जोशीमठ संकट के बाद केंद्र ने एक मानक संचालन प्रक्रिया जारी की है, जिसमें एजेंसियों से अंतरराष्ट्रीय सीमा या नियंत्रण रेखा के 100 किलोमीटर के दायरे में आने वाली सभी सड़कों और राजमार्ग परियोजनाओं में पर्यावरण सुरक्षा उपायों को अनिवार्य रूप से लागू करने को कहा गया है।
केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय द्वारा छह फरवरी को जारी मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) में अनिवार्य आपदा प्रबंधन योजनाओं, जोखिम आकलन और पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशीलता का अध्ययन और सुरंग बनाने के दौरान सावधानियों पर जोर दिया गया है।
मंत्रालय द्वारा अंतरराष्ट्रीय सीमा (आईबी) या नियंत्रण रेखा (एलओसी) के 100 किलोमीटर तक की राजमार्ग परियोजनाओं के लिए पर्यावरण मंजूरी की आवश्यकता को हटाने के सात महीने बाद ये दिशानिर्देश आए हैं।
इसके मुताबिक, ‘‘सतत पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों के लिए अंतरराष्ट्रीय सीमा/नियंत्रण रेखा से 100 किलोमीटर के दायरे में आने वाली सभी सड़कों/राजमार्ग परियोजनाओं के लिए दिशानिर्देशों का पालन किया जाना है।’’
सभी प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के अध्यक्षों, विशेषज्ञ मूल्यांकन समितियां और पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन प्राधिकरणों सहित अन्य लोगों को जारी एक आधिकारिक ज्ञापन में कहा गया है, ‘‘इसके अलावा, नियंत्रण रेखा या सीमा से 100 किलोमीटर तक की सभी राजमार्ग परियोजनाओं के लिए पूर्व पर्यावरण मंजूरी की छूट इसे किसी अन्य अधिनियम, नियम, विनियमन, उप-नियमों और अधिसूचना आदि के तहत प्राप्त की जाने वाली मंजूरी, सहमति, अनुमति आदि से छूट नहीं देती है।’’
एजेंसियों को जोखिम का आकलन करना चाहिए और उसके आधार पर आपदा प्रबंधन अधिनियम के अनुसार एक योजना तैयार की जानी चाहिए।
मंत्रालय ने कहा कि इसे सक्षम प्राधिकारी से मंजूरी मिलनी चाहिए और इसे लागू किया जाना चाहिए।
मंत्रालय ने कहा, ‘‘यदि प्रस्तावित मार्ग किसी पहाड़ी क्षेत्र से गुजर रहा है तो भूस्खलन, ढलान स्थिरता, भूकंपीय गतिविधि के दृष्टिकोण से परियोजना क्षेत्र की संवेदनशीलता पर व्यापक अध्ययन, जिसमें यह स्थित है, क्षेत्र की पर्यावरण संवेदनशीलता अध्ययन प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थान के माध्यम से किया जाए और उसके आधार पर पर्यावरण के अनुकूल और सुरक्षित निर्माण पद्धति अपनाई जाए।’’
मंत्रालय के मुताबिक परियोजना प्रस्तावकों को भूस्खलन प्रबंधन योजनाएं तैयार करने और निर्माण से पहले, दौरान और बाद में सभी उपचारात्मक, एहतियाती उपाय करने के लिए कहा गया है।
इसके मुताबिक उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि निर्माण शुरू करने से पहले विषय विशेषज्ञों की देखरेख में सभी पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों को अनिवार्य रूप से लागू किया जाए।
मंत्रालय ने कहा कि कटाई या तटबंध के मामले में, तटबंध से मिट्टी के कटाव को नियंत्रित करने और भूस्खलन, चट्टानों के गिरने आदि को रोकने के उपाय किए जाने चाहिए।
उत्तराखंड में अधिकारियों ने चमोली जिले के जोशीमठ को भूस्खलन और धंसाव प्रभावित क्षेत्र घोषित किया है। लंबी पैदल यात्रा और तीर्थ स्थल के रूप में प्रसिद्ध शहर में आवासीय और वाणिज्यिक इमारतों और सड़कों और खेतों पर चौड़ी दरारें दिखाई दी हैं। कई इमारतों को असुरक्षित घोषित कर दिया गया है और निवासियों को सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित कर दिया गया है।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा जारी उपग्रह से ली गई तस्वीरों से पता चलता है कि दो जनवरी को जमीन धंसने की संभावित घटना के बाद हिमालयी शहर महज 12 दिनों में 5.4 सेमी धंस गया।
हालांकि जोशीमठ भूस्खलन की संभावना वाले क्षेत्र में एक नाजुक पहाड़ी ढलान पर स्थित है, लेकिन इसके धंसाव के लिए वहां बड़े पैमाने पर की जा रही विकास परियोजनाओं को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है।
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ब्रजेन्द्र प्रशांत
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