अगरतला, नौ अप्रैल (भाषा) त्रिपुरा में महिलाओं के एक समूह ने राज्य का पहला संपूर्ण महिला संगीत बैंड ‘मेघबालिका’ बनाया, जो पूर्वोत्तर राज्यों में काफी प्रसिद्ध है।
बैंड की प्रमुख सदस्य गिटारवादक मून साहा (32) ने बताया कि जब वो 26 साल की थी। तब उसके परिवार के सदस्य उन पर शादी का दवाब बना रहे थे। लेकिन, वो संगीत में आगे बढ़ना चाहती थी और संगीत विद्यालयों में जाने वाली अन्य महिलाओं के लिए सोशल मीडिया को खंगालती थी।
उन्होंने बताया कि वो 2017 में पांच महिलाओं को इकट्ठा करने में सफल हुईं और उनके साथ मिलकर बैंड ‘मेघबालिका’ (क्लाउड गर्ल) का नामकरण करते हुए संगीत कार्यक्रमों के लिए पूर्वाभ्यास (रिहर्सल) शुरू किया।
उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया, ‘‘प्रसिद्ध गायक अमर घोष ने एक शीर्षक गीत तैयार करने में हमारी मदद की और हमने अगरतला के बाहरी इलाके में शो करना शुरू किया। धीरे-धीरे हमें लोकप्रियता मिलने लगी।’’
उन्होंने बताया कि बैंड की लोकप्रियता उस वक्त बढ़ी जब अगरतला में एक सांस्कृतिक संगठन ‘छंदनीर’ ने बैंड को प्रदर्शन के लिए आमंत्रित किया। इसके बाद बैंड को दूरदर्शन, आकाशवाणी और अन्य कार्यक्रमों में भी प्रदर्शन के लिए आमंत्रित किया गया।
उन्होंने बताया, ‘‘हमारे पास रिहर्सल के लिए कोई जगह नहीं थी। हम अपने सदस्यों के घरों में अभ्यास करते थे। हमारी समस्याओं के बारे में जानने के बाद, एक स्थानीय समाचार पत्र के संपादक समीरन रॉय ने हमें अपने कार्यालय में एक कमरा दिया। इससे हमें बहुत मदद मिली।’’
उन्होंने बताया कि बैंड पास उस वक्त केवल एक गिटार और एक हारमोनियम था। जिसके बाद ‘ओएनजीसी’ द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में प्रदर्शन करते हुए कंपनी ने ड्रम का एक सेट दान किया।
उन्होंने बताया कि इस साल बैंड पूरे पूर्वोत्तर राज्य में प्रसिद्ध हो गया है और कई कार्यक्रमों में प्रदर्शन किया है। अब बैंड में सदस्यों की संख्या बढ़कर 10 हो गई है। जिसमें 16 साल से लेकर 32 साल के लोग शामिल हैं। बैंड ने पश्चिम बंगाल स्थित शांतिनिकेतन में भी प्रदर्शन किया।
संगीतकार अंकिता रॉय ने बताया, ‘‘प्रसिद्ध रवींद्र संगीत कलाकार मोहन सिंह खांडोरे शांति निकेतन के कार्यक्रम में मौजूद थे उन्होंने हमें सराहा।’’
उन्होंने बताया कि बैंड के कुछ सदस्य छात्र हैं जबकि रॉय के पास सरकारी नौकरी है और साहा गिटार की ट्यूशन देती हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘अब हमारा सपना एक संगीत संस्थान स्थापित करने का है, जहां युवाओं के अलावा बुजुर्गों को कम से कम खर्च पर संगीत सीखने को मिले। हम ऐसे कई बुजुर्ग लोगों से मिले हैं, जो आर्थिक तंगी या अन्य बाधाओं के कारण अपने सपनों को पूरा नहीं कर सके।’’
भाषा साजन धीरज
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