नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी की एक अदालत ने सोमवार को भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के निष्कासित नेता कुलदीप सिंह सेंगर की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें उसने उन्नाव रेप पीड़िता के पिता की हिरासत में मौत के मामले में मिली 10 साल की सज़ा को निलंबित करने की मांग की थी. कोर्ट ने सेंगर की इस दलील को नहीं माना कि उसकी आपराधिक अपील कई सालों से नहीं सुनी गई है. कोर्ट ने कहा कि इस देरी के लिए “आंशिक रूप से वह खुद जिम्मेदार है.”
कोर्ट सेंगर की ओर से दायर की गई बार-बार की अंतरिम अर्जियों की ओर इशारा कर रहा था. इनमें सज़ा निलंबन की कई याचिकाएं शामिल थीं, जिनके कारण मुख्य आपराधिक अपील—यानी 13 मार्च 2020 को हुई उसकी दोषसिद्धि और सज़ा को चुनौती, की सुनवाई में देरी हुई.
फैसला सुनाते हुए हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि अपराध की गंभीरता और उसका समाज पर गहरा असर, ज़मानत के पक्ष में दी गई दलीलों से कहीं ज्यादा भारी है.
यह इस मामले में सज़ा निलंबन की मांग को लेकर सेंगर की दूसरी असफल कोशिश है. इससे पहले 7 जून 2024 को दिल्ली हाई कोर्ट ने ऐसी ही याचिका खारिज कर दी थी.
उन्नाव रेप मामले में, हाई कोर्ट की एक डिवीजन बेंच ने दिसंबर 2025 में सेंगर को अस्थायी तौर पर सज़ा निलंबन और ज़मानत दी थी, लेकिन कुछ ही दिनों बाद सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश पर रोक लगा दी थी.
अदालत के सामने जो मामला है, वह अप्रैल 2018 की घटनाओं से जुड़ा है. नाबालिग से रेप के बाद पीड़िता का परिवार एक सुनवाई के लिए उन्नाव गया था, जहां दिनदहाड़े आरोपी से जुड़े लोगों ने उनके पिता पर हमला किया. अगले दिन पुलिस ने पिता को अवैध हथियार रखने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया.
बाद में पिता की पुलिस हिरासत में मौत हो गई. पोस्टमार्टम में 14 बाहरी चोटें पाई गईं और यह निष्कर्ष निकाला गया कि उनकी मौत आंत में छेद के कारण हुए सेप्टीसीमिया से हुई.
अगस्त 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए उन्नाव रेप से जुड़े पांच मामलों जिसमें हिरासत में मौत का मामला भी शामिल है, की सुनवाई उत्तर प्रदेश से दिल्ली स्थानांतरित कर दी थी.
दिसंबर 2019 में सेंगर को रेप मामले में दोषी ठहराया गया और उसे उम्रकैद की सज़ा सुनाई गई. तीन महीने बाद, 13 मार्च 2020 को सेंगर को पीड़िता के पिता की हिरासत में मौत की साजिश रचने का दोषी ठहराया गया.
दिल्ली हाई कोर्ट में बचाव पक्ष ने दलील दी कि सेंगर अब तक साढ़े सात साल जेल में काट चुका है, जो 10 साल की सज़ा का आधे से ज्यादा है. उन्होंने यह भी कहा कि सेंगर को चार बार अंतरिम ज़मानत मिली और उसने सभी शर्तों का पालन किया और मिली छूट का दुरुपयोग नहीं किया.
बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि सेंगर 13 अप्रैल 2018 से हिरासत में है और जेल प्रशासन की ओर से उसके खिलाफ कोई नकारात्मक रिपोर्ट नहीं आई है. यह भी दलील दी गई कि किसी भी अदालत ने सेंगर को पीड़िता या उसके परिवार को धमकाने का दोषी नहीं पाया है.
इन दलीलों के बावजूद, दिल्ली हाई कोर्ट ने हिरासत में मौत के मामले में सेंगर को कोई राहत नहीं दी.
याचिका का विरोध करते हुए सीबीआई ने कहा कि सेंगर की पिछली अर्जी सबूतों की विस्तृत जांच के बाद खारिज की गई थी और ऐसा कोई नया हालात सामने नहीं आया है, जिससे मामले पर फिर से विचार किया जाए.
एजेंसी ने यह भी कहा कि सेंगर का राजनीतिक प्रभाव ऐसा है कि अगर उन्हें रिहा किया गया तो गवाहों और न्याय प्रक्रिया में हस्तक्षेप की आशंका है.
अभियोजन पक्ष ने यह भी बताया कि पीड़िता, उसके परिवार और उसके वकील को दी गई सीआरपीएफ सुरक्षा हटाने से जुड़ी अर्जियां अभी सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं, जिससे उसकी सुरक्षा को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं.
उसने अदालत से अपराध की गंभीरता, अपराध की प्रकृति और उसके समाज पर असर को लेकर समन्वय पीठ (कोऑर्डिनेट बेंच) के निष्कर्षों पर भरोसा करने की अपील की और कहा कि इन्हें हल्के में नहीं लिया जा सकता.
12 पन्नों के अपने आदेश में हाई कोर्ट ने दोहराया कि “दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 389 के तहत सज़ा का निलंबन कोई अधिकार नहीं है” और यह एक विवेकाधीन शक्ति है, जिसका इस्तेमाल सोच-समझकर किया जाना चाहिए.
कोर्ट ने सेंगर की याचिका खारिज करते हुए कहा, “किया गया अपराध बेहद गंभीर है और इसका समाज पर गहरा असर पड़ा है.”
अदालत ने सेंगर की मुख्य आपराधिक अपील की अंतिम सुनवाई के लिए 3 फरवरी की तारीख तय की है.
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