नयी दिल्ली, तीन मार्च (भाषा) कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की ‘‘लक्षित हत्या’’ पर मोदी सरकार की ‘‘चुप्पी’’ को लेकर मंगलवार को उस पर तीखा हमला बोला और कहा कि उसका यह रुख भारत की विदेश नीति की दिशा और विश्वसनीयता पर गंभीर संदेह पैदा करता है।
उन्होंने अंग्रेजी दैनिक अखबार ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित अपने लेख में यह भी कहा कि आगामी नौ मार्च से जब संसद के बजट सत्र के दूसरे चरण की बैठक शुरू हो तो अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के भंग होने पर सरकार की ‘‘परेशान करने वाली चुप्पी’’ पर स्पष्ट चर्चा होनी चाहिए।
सोनिया गांधी ने कहा, ‘‘जारी कूटनीतिक वार्ता के बीच किसी पदासीन राष्ट्राध्यक्ष की हत्या समकालीन अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एक भयावह विघटन का संकेत है। लेकिन इस स्तब्ध कर देने वाली घटना से परे नयी दिल्ली की चुप्पी भी हैरान करने वाली है।’’
उन्होंने कहा कि भारत सरकार ने न तो इस हत्या और न ही ईरान की संप्रभुता के उल्लंघन की निंदा की है।
कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष ने कहा, ‘‘अमेरिका-इज़राइल के व्यापक हमले की अनदेखी करते हुए, प्रधानमंत्री ने केवल ईरान द्वारा संयुक्त अरब अमीरात पर किए गए प्रतिशोधी हमले की निंदा तक स्वयं को सीमित रखा और उससे पहले के घटनाक्रमों का उल्लेख नहीं किया। बाद में उन्होंने ‘‘गहरी चिंता’’ व्यक्त की और ‘‘संवाद और कूटनीति’’ की बात की, जबकि यही प्रक्रिया इज़राइल और अमेरिका द्वारा किए गए व्यापक, अकारण हमलों से पहले जारी थी।’’
उन्होंने कहा, ‘‘जब किसी विदेशी नेता की लक्षित हत्या पर हमारा देश संप्रभुता या अंतरराष्ट्रीय कानून की स्पष्ट रक्षा नहीं करता और निष्पक्षता त्याग दी जाती है, तो यह हमारी विदेश नीति की दिशा और विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। मौन रहना तटस्थता नहीं है।’’
सोनिया गांधी ने कहा कि ईरानी नेता की हत्या बिना किसी औपचारिक युद्ध घोषणा के और चल रही राजनयिक प्रक्रिया के दौरान की गई।
उन्होंने कहा, ‘‘संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2 (4) किसी भी राष्ट्र की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के विरुद्ध बल के प्रयोग या धमकी को प्रतिबंधित करता है। किसी सेवारत राष्ट्राध्यक्ष की लक्षित हत्या इन सिद्धांतों पर सीधा प्रहार है।’’
उन्होंने तर्क दिया कि यदि ऐसे कृत्यों पर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र द्वारा सैद्धांतिक आपत्ति न जतायी जाए तो अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के क्षरण को सामान्य बनाना आसान हो जाता है।
सोनिया गांधी ने कहा, ‘‘समय की दृष्टि से भी यह असहज करने वाला है। हत्या से मात्र 48 घंटे पहले प्रधानमंत्री इज़राइल की यात्रा से लौटे थे, जहां उन्होंने बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार के प्रति स्पष्ट समर्थन दोहराया, जबकि गाज़ा संघर्ष में बड़ी संख्या में नागरिको, विशेषकर महिलाओं और बच्चों की मौतों पर वैश्विक आक्रोश बना हुआ है।’’
उन्होंने कहा कि ऐसे समय में जब ‘ग्लोबल साउथ’ के कई देश, साथ ही रूस और चीन जैसे भारत के ब्रिक्स साझेदार दूरी बनाए हुए हैं, भारत का उच्च स्तरीय राजनीतिक समर्थन, बिना नैतिक स्पष्टता के एक चिंताजनक बदलाव का संकेत देता है।
कांग्रेस नेता ने कहा कि भारत का रुख इस त्रासदी के प्रति मौन समर्थन का संकेत दे रहा है।
उन्होंने इस बात का उल्लेख किया कि कांग्रेस ने ईरानी धरती पर हुए बम हमलों और लक्षित हत्याओं की स्पष्ट रूप से निंदा की है।
सोनिया गांधी ने कहा, ‘‘हमने ईरानी जनता और विश्वभर के शिया समुदायों के प्रति संवेदना व्यक्त की है और दोहराया है कि भारत की विदेश नीति विवादों के शांतिपूर्ण समाधान पर आधारित है, जैसा कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 51 में परिलक्षित है।’’
उनके मुताबिक, संप्रभु समानता, हस्तक्षेप नहीं करना और शांति को बढ़ावा देना वे सिद्धांत हैं जो ऐतिहासिक रूप से भारत की कूटनीतिक पहचान का हिस्सा रहे हैं।
सोनिया गांधी ने कहा, ‘‘इसलिए वर्तमान सरकार की चुप्पी केवल सामरिक नहीं, बल्कि हमारे घोषित सिद्धांतों के विपरीत प्रतीत होती है। भारत के लिए यह प्रकरण विशेष रूप से चिंताजनक है।’’
सोनिया गांधी ने सवाल किया कि यदि आज ईरान के मामले में संप्रभुता की अवहेलना पर हम संकोच करते हैं, तो कल ‘ग्लोबल साउथ’ के देश अपनी क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए भारत पर कैसे भरोसा करेंगे?
उन्होंने कहा, ‘‘इस विषय के समाधान का उपयुक्त मंच संसद है। जब कार्यवाही फिर से शुरू होगी, तो अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के इस विघटन पर भारत की चुप्पी को लेकर खुली और स्पष्ट चर्चा होनी चाहिए।’’
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष की लक्षित हत्या, अंतरराष्ट्रीय मानदंडों का क्षरण और पश्चिम एशिया में बढ़ती अस्थिरता, सीधे भारत के सामरिक हितों और नैतिक प्रतिबद्धताओं से जुड़े हुए विषय हैं।
सोनिया गांधी ने कहा, ‘‘भारत के स्पष्ट रुख की अभिव्यक्ति में अब विलंब नहीं होना चाहिए। लोकतांत्रिक जवाबदेही और रणनीतिक स्पष्टता इसकी मांग करती है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘भारत लंबे समय से ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के आदर्श का आह्वान करता रहा है। यह केवल औपचारिक कूटनीति का नारा नहीं, बल्कि न्याय, संयम और संवाद के प्रति प्रतिबद्धता का संकेत है, चाहे वह असुविधाजनक ही क्यों न हो।’’
भाषा हक
वैभव गोला
गोला
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