नयी दिल्ली, 19 अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि सरकार उन यौन विशेषताओं के आधार पर किसी व्यक्ति के साथ भेदभाव नहीं कर सकती, जिस पर उस व्यक्ति का कोई नियंत्रण नहीं है। न्यायालय ने यह भी कहा कि केंद्र सरकार के पास इस दावे के समर्थन में कोई आंकड़ा नहीं है कि समलैंगिक विवाह ‘अभिजात्य’ या ‘शहरी’ है।
शीर्ष अदालत समलैंगिक विवाह को कानूनी मंजूरी देने के अनुरोध वाली कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।
प्रधान न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच-सदस्यीय संविधान पीठ ने सुनवाई के दूसरे दिन कहा, ‘‘यह बहुत आसान है, सरकार किसी व्यक्ति के साथ उस विशेषता के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकती, जिस पर उस व्यक्ति का कोई नियंत्रण नहीं है।’
केंद्र ने शीर्ष अदालत में दायर अपने एक हलफनामे में याचिकाओं को सामाजिक स्वीकृति के उद्देश्य से ‘शहरी अभिजात्य वर्ग’ के दृष्टिकोण का प्रतिबिंब बताया और कहा कि विवाह की मान्यता अनिवार्य रूप से एक विधायी कार्य है, जिसके निर्धारण से अदालतों को बचना चाहिए।
याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ए. एम. सिंघवी की दलीलों से स्पष्ट रूप से सहमत होते हुए पीठ ने कहा, ”जब आप कहते हैं कि यह जन्मजात विशेषता है तो यह एक तरीके से केंद्र की उस दलील का जवाब भी है कि यह (समलैंगिक शादी) संभ्रांतवादी या शहरी है या इसका एक निश्चित वर्ग पूर्वाग्रह है।’
संविधान पीठ में न्यायमूर्ति एस. के. कौल, न्यायमूर्ति एस. आर. भट, न्यायमूर्ति हिमा कोहली और न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा भी शामिल हैं।
सिंघवी ने जोर देकर कहा कि हलफनामे में केंद्र द्वारा दिया गया हर कथन ‘बिना किसी सर्वेक्षण या बिना डाटा’ के है।
याचिकाकर्ताओं में से एक का प्रतिनिधित्व करने वाले एक अन्य वरिष्ठ अधिवक्ता के. वी. विश्वनाथन ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को ‘शहरी अभिजात्य वर्ग’ के रूप में ब्रांडिंग करना ‘शिष्टता की पूर्ण कमी’ दिखाता है। विश्वनाथन ने कहा, ‘केंद्र सरकार को कुछ शिष्टता दिखानी चाहिए थी।’
दिन की सुनवाई की शुरुआत में, केंद्र का प्रतिनिधित्व कर रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने एक नया हलफनामा दायर किया केंद्र ने शीर्ष अदालत से आग्रह किया कि सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कार्यवाही में पक्षकार बनाया जाए, क्योंकि इस मुद्दे पर उनका (राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों का) विचार प्राप्त किये बिना कोई भी निर्णय वर्तमान ‘प्रतिकूल प्रयास’ को अधूरा और तुच्छ कर देगा।
सुनवाई के दौरान, पीठ ने समलैंगिक विवाह को वैध बनाने के परिणामों पर भी विचार-विमर्श किया, जिसमें गोद लेने और पुरुष तथा महिला के लिए अलग-अलग विवाह योग्य उम्र भी शामिल हैं।
समलैंगिक शादियों को कानूनी मान्यता देने का अनुरोध कर रहे याचिकाकर्ताओं ने बुधवार को उच्चतम न्यायालय से आग्रह किया कि वह अपनी पूर्ण शक्ति, ‘प्रतिष्ठा और नैतिक अधिकार’ का इस्तेमाल कर समाज को ऐसे बंधन को स्वीकार करने के लिए प्रेरित करे, ताकि एलजीबीटीक्यूआईए समुदाय के लोग भी विषम लैंगिकों की तरह ‘सम्मानजनक’ जीवन जी पाएं।
एक याचिकाकर्ता की तरफ से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने पीठ से कहा, “सरकार को आगे आना चाहिए और समलैंगिक शादियों को मान्यता देनी चाहिए।”
रोहतगी ने विधवा पुनर्विवाह से जुड़े कानून का जिक्र किया और कहा कि समाज ने तब इसे स्वीकार नहीं किया था, लेकिन ‘कानून ने तत्परता से काम किया’ और अंतत: इसे सामाजिक स्वीकृति मिली।
उन्होंने पीठ से कहा, “यहां, इस अदालत को समाज को समलैंगिक शादियों को मान्यता देने के लिए प्रेरित करने की जरूरत है। इस अदालत के पास, संविधान के अनुच्छेद-142 (जो उच्चतम न्यायालय को पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक किसी भी आदेश को पारित करने की पूर्ण शक्ति प्रदान करता है) के तहत प्रदत्त अधिकारों के अलावा, नैतिक अधिकार भी है और इसे जनता का भरोसा भी हासिल है। हम यह सुनिश्चित करने के लिए इस अदालत की प्रतिष्ठा और नैतिक अधिकार पर निर्भर हैं कि हमें हमारा हक मिले।”
रोहतगी ने कहा, “सरकार को आगे आकर समलैंगिक शादियों को मान्यता प्रदान करनी चाहिए… इससे हमें विषमलैंगिकों की तरह ही समान जीवन व्यतीत करने में मदद मिलेगी।”
उच्चतम न्यायालय में दायर एक नए हलफनामे में केंद्र ने कहा कि उसने 18 अप्रैल को सभी राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों को पत्र लिखकर इन याचिकाओं में उठाए गए ‘मौलिक मुद्दों’ पर उनकी टिप्पणियां और राय आमंत्रित की है।
हलफनामे में कहा गया है, “इसलिए, विनम्रतापूर्वक अनुरोध किया जाता है कि सभी राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों को मौजूदा कार्यवाही में पक्षकार बनाया जाए, उनके संबंधित रुख को रिकॉर्ड में लिया जाए तथा भारत संघ को राज्यों के साथ परामर्श प्रक्रिया को समाप्त करने, उनके विचार/आशंकाएं प्राप्त करने, उन्हें संकलित करने तथा इस अदालत के समक्ष रिकॉर्ड पर रखने की अनुमति दी जाए, और उसके बाद ही वर्तमान मुद्दे पर कोई निर्णय लिया जाए।”
हलफनामे में कहा गया है, “यह सूचित किया जाता है कि भारत संघ ने 18 अप्रैल 2023 को सभी राज्यों को पत्र जारी कर याचिकाओं में उठाए गए मौलिक मुद्दों पर उनकी टिप्पणियां और विचार आमंत्रित किए हैं।”
सरकार की ओर से दायर नयी याचिका का विरोध करते हुए रोहतगी ने कहा कि याचिकाओं में केंद्रीय कानून, विशेष विवाह अधिनियम को चुनौती दी गई है और सिर्फ इसलिए कि यह विषय संविधान की समवर्ती सूची में है, राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों को नोटिस जारी करने की आवश्यकता नहीं है।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, “आपको इस स्तर पर मेहनत करने की जरूरत नहीं है।”
दलीलों पर लौटते हुए रोहतगी ने आपसी सहमति से बनाए गए समलैंगिक संबंधों को अपराध के दायरे से बाहर किए जाने सहित अन्य फैसलों का जिक्र किया और कहा, “अदालत किसी ऐसे विषय पर फिर से विचार कर रही है, जिसमें पहले ही फैसला किया जा चुका है।”
रोहतगी ने कहा, “मेरा विषम लैंगिक समूहों के मामले में समान रुख है और ऐसा नहीं हो सकता कि उनका यौन अभिमुखीकरण (ओरियेंटेशन) सही हो और बाकी सभी का गलत। मैं कह रहा हूं कि एक सकारात्मक पुष्टि होनी चाहिए… हमें कमतर मनुष्य नहीं माना जाना चाहिए और इससे हमें जीवन के अधिकार का भरपूर आनंद मिल सकेगा।”
शीर्ष अदालत ने मंगलवार को स्पष्ट किया था कि समलैंगिक शादियों को कानूनी मान्यता देने के अनुरोध वाली याचिकाओं पर फैसला करते समय वह शादियों से जुड़े ‘पर्सनल लॉ’ पर विचार नहीं करेगा।
याचिकाओं पर सुनवाई और फैसले का देश पर महत्वपूर्ण प्रभाव होगा, क्योंकि आम लोग और राजनीतिक दल इस विषय पर अलग-अलग विचार रखते हैं।
शीर्ष अदालत ने पिछले साल 25 नवंबर को दो समलैंगिक जोड़ों द्वारा दायर अलग-अलग याचिकाओं पर केंद्र से जवाब मांगा था। इन याचिकाओं में दोनों जोड़ों ने शादी के अपने अधिकार को लागू करने और संबंधित अधिकारियों को विशेष विवाह अधिनियम के तहत अपने विवाह को पंजीकृत करने का निर्देश देने की अपील की थी।
एलजीबीटीक्यूआईए का मतलब लेस्बियन, गे, बाइसेक्शुअल, ट्रांसजेंडर, क्वीर, क्वेश्चनिंग, इंटरसेक्स और एसेक्सुअल से है।
भाषा सुरेश पवनेश
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