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Tuesday, 23 April, 2024
होमदेशकूड़े के ढेर में तब्दील हो रहा है बिहार, शहर से लेकर गांव तक फैली है बदबू ही बदबू

कूड़े के ढेर में तब्दील हो रहा है बिहार, शहर से लेकर गांव तक फैली है बदबू ही बदबू

बिहार में शहरों में कचरा जहां सड़कों पर बिखरा मिलता है, वहीं गावों में इसे खेत-खलियानों में फेंका जा रहा है.

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बिहार: बिहार सचिवालय,  से लगभग 10 मिनट की दूरी पर स्थित पुनाइचक के पोस्ट ऑफिस गली में विद्यार्थियों के लिए 4 बड़े लॉज बने हुए हैं, जिसमें लगभग 300 से ज्यादा छात्र रहते हैं. चारों लॉज का कचरा बीच के बगल वाली जगह में फेंका जाता है, जिससे लोग परेशान हैं.

उसी चार लॉज में से एक राम दुलारी लॉज, में रहने वाले प्रशांत पाण्डेय बताते हैं, ‘3000 प्रति कमरा किराया देने के बावजूद ग्राउंड फ्लोर और फर्स्ट फ्लोर पर रहने वाले छात्र 24 घंटा रूम बंद करके ही रहते हैं, ताकि छोटे कीड़े, मच्छर घर में न आएं. वहां से बदबू इतनी बुरी आती है कि आप 10 मिनट भी नहीं ठहर सकते हैं. महीने-2 महीने पर कचरे को मकान मालिक के द्वारा जलाया जाता है. सुबह में सरकार की कचरा फेंकने वाली गाड़ी आती है, लेकिन वह मुख्य सड़क से होकर ही चली जाती है. गली में नहीं आती है. इसलिए मजबूरी में हम लोग सड़क पर ही कचरा फेंकते हैं. पूरे इलाके की स्थिति ऐसी ही हैं.’

105 घाटों पर 3 लाख किलो प्लास्टिक कचरा

राजधानी पटना में पिछले महीने हुए छठ महापर्व में प्लास्टिक कचरे का इस्तेमाल धड़ल्ले से किया गया. जबकि राज्य में सिंगल यूज प्लास्टिक पर बैन है. राजधानी पटना में सरकार और आम पब्लिक कचरे को लेकर कितनी जागरूक हैं इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि नगर निगम के अलावा बिहार के दो-तीन गैर सरकारी संस्थान अभी तक घाटों की सफाई लगे हैं.

इसी गैर सरकारी संस्थान में एक संस्थान बीईंग हेल्पर के मुख्य सदस्य सन्नी सिंह बताते हैं, ‘छठ में गंगा नदी में इतना कचरा फेंका गया हैं कि अगर इसे साफ नहीं किया गया तो गंगा और पटना का काफी नुकसान होगा. अगर पटना के सभी 105 घाटों की सफाई हो तो 3 लाख किलो से ज्यादा ही प्लास्टिक वेस्ट निकलेगा.’


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बिहार के सुपौल में कचरा जलाया जाता हुआ | फोटो- राहुल कुमार गौरव

मेडिकल कचरा और सामान्य कचरे में कोई फर्क नहीं

राजधानी पटना से 250 किलोमीटर दूर स्थित सुपौल शहर का सारा कचरा स्टेशन के बगल वाली सड़क पर फेंका जाता है. यह रोड शहर की सबसे व्यस्त सड़कों में से एक है. यहां सदर अस्पताल सुपौल के अलावा प्राइवेट अस्पतालों का कचरा भी फेंका जाता है. बिहार के वरिष्ठ स्थानीय पत्रकार अमित कुमार के मुताबिक बिहार के चार शहरों पटना, मुजफ्फरपुर, राजगीर, गया और भागलपुर के अलावा किसी भी शहर में मेडिकल कचरे के उचित निपटान की व्यवस्था नहीं है.

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हाल ही में बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (बीएसपीसीबी) ने राज्य के 1,800 स्वास्थ्य केंद्रों को जैव चिकित्सा अपशिष्ट निपटान के लिए निर्धारित मानदंडों का पालन करने में विफल रहने पर उन्हें बंद करने का नोटिस भेजा है.

बीएसपीसीबी के अध्यक्ष अशोक कुमार घोष ने मीडिया से बात करते हुए कहा, ‘1800 स्वास्थ्य केंद्र राज्य में सामान्य जैव- चिकित्सा अपशिष्ट उपचार सुविधाओं में चिकित्सा अपशिष्ट के वैज्ञानिक भंडारण, परिवहन और उपचार से संबंधित मानदंडों का पालन करने में विफल रहते हैं, तो बीएसपीसीबी उन्हें बंद कर देगा.’

सहरसा के एक चिकित्सक ओम प्रकाश बताते है, ‘बिहार के सभी शहरों के सरकारी और फर्जी अस्पतालों का कचरा सामान्य कचरे के साथ जलता है. इसको लेकर अस्पताल प्रशासन और सरकार दोनों असंवेदनशील है. जबकि डब्ल्यूएचओ के रिपोर्ट के मुताबिक स्वास्थ्य संस्थानों से पैदा होने वाले कचरे का 15 फीसदी काफी खतरनाक होता है. अधिकांश मेडिकल कचरा जलाने से हानिकारक गैस भी निकलती है. वहीं अगर मेडिकल कचरे को गड्ढे में डाला जाए तो भूमिगत जल प्रदूषित होता है. साथ ही अगर किसी संक्रमित सुई से चोट लग जाए तो संक्रमण होने का खतरा बना रहता है.’

बिहार में बायो-मेडिकल वेस्ट निपटान की जमीनी हकीकत इस आंकड़े से पता चल जाता है कि भारत सरकार के केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार 2019 में बिहार में हर दिन पैदा होने वाले 34 हजार किलो वेस्ट में से तीन-चौथाई यानी 76% कचरे का निपटान नहीं किया जाता है.

अवैध अस्पताल नियमों का पालन नहीं करते

पटना के जाने-माने आरटीआई एक्टिविस्ट विद्याकर बताते हैं, ‘बिहार के प्रत्येक जिले में फर्जी अस्पतालों का लिस्ट लंबा है. खास कर ग्रामीण इलाकों में बड़े स्तर पर दूसरे डाक्टरों का बोर्ड लगा फर्जी अस्पताल संचालित हो रहे हैं. इसके साथ ही कई पंजीकृत डॉक्टर और अस्पताल के पास बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा अधिकार पत्र नहीं हैं. जिसके पास पत्र हैं, वो इन नियमों का कितना पालन करते हैं. इस पर भी सरकार की कोई नजर नहीं है. ऐसे में मेडिकल कचरे का निष्पादन होना असंभव है. मेडिकल कचरा पूरे देश के लिए बहुत ही गंभीर समस्या है, लेकिन न ही सरकार और न ही यह मीडिया के प्राइम टाइम में खबर होती है.’

बायो-मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट नियम, 2016 के तहत अस्पतालों, नर्सिंग होम, पैथोलॉजिकल लैब और ब्लड बैंक आदि को नियम 10 के तहत बोर्ड द्वारा अधिकार पत्र (ऑथराइजेशन) और सहमति (कंसेंट) लेना आवश्यक है. जबकि बिहार में हजारों मेडिकल संस्थान बिना किसी अधिकार पत्र के काम कर रहे हैं.

मेडिकल कचरा निस्तारण को बिहार में लगेंगे 6 प्लांट

बिहार सरकार के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मीडिया प्रभारी संजय सिंह बताते हैं, ‘बिहार के स्वास्थ्य मंत्री तेजस्वी यादव ने सभी जिला अस्पतालों को जल्द से जल्द जैविक कचरा प्रबंधन की व्यवस्था सुनिश्चित करने का आदेश दिया है. यह ताजा निर्देश एक नई उम्मीद की किरण बन कर उभरा है. अभी मेडिकल वेस्ट और बायो मेडिकल कचरा के निस्तारण के लिए सिर्फ चार बायो मेडिकल वेस्ट प्लांट ही हैं. जबकि दिनों-दिन स्वास्थ्य सुविधा केंद्रों की बढ़ोत्तरी हो रही है. इसलिए सरकार ने फैसला किया है कि निजी सहभागिता से राज्य में कम से कम छह मेडिकल वेस्ट प्लांट की स्थापना की जाएगी.’

गांव में कचरा का निष्पादन खेतों तक सीमित

सिंगल यूज प्लास्टिक हो या मेडिकल कचरा यह शहरों के अलावा गांवों में भी प्रतिबंधित है. शहरों में कचरा उठाने के लिए गाड़ी आती है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में प्लास्टिक कचरे का निपटान नहीं हो पाता है.

बिहार के भागलपुर जिला के नारायणपुर प्रखंड स्थित भ्रमरपुर गांव के वार्ड नंबर 3 के पवन मिश्रा बताते हैं, ‘गांव में सरकार ने मंदिर और चौक चौराहे पर डस्टबिन्स बैग लगाए हैं. लेकिन गांव के लोग आज भी कचरा खेत-खलिहान या गांव के बीच जो खाली जगह होती है, वहीं फेंकते हैं.’

वहीं, सहरसा जिला के महिषी पंचायत के पूर्व प्रमुख नितिन ठाकुर बताते हैं, ‘गांव में स्थित तारा मंदिर परिसर और अगल-बगल वाले जगहों के कचरे को सरकारी आदमी उठाते हैं लेकिन गांव के बाकी लोग कचरा खेत में फेंकते हैं. गांव से सहरसा शहर लगभग 8-10 किलोमीटर दूर है. वहां तक कचरे वाली गाड़ी आती है, लेकिन गांव नहीं आती.’

गिने-चुने गांवों में होता है कचरा प्रबंधन

बिहार के ज्यादातर गांवों में कचरा निपटान की स्थिति भ्रमरपुर और महिषी गांव जैसी ही है. जबकि फरवरी 2022 में ही बिहार में 15वें वित्त आयोग के तहत मिली राशि से डस्टबिन बांटने की जिम्मेदारी वार्ड प्रबंधन एवं क्रियान्वयन समिति को मिल चुकी है. इसके बावजूद गिने-चुने गांवों में ही कचरे का प्रबंधन होता है. अधिकांश कचरा खेत-खलियान में फेंका जाता है.

सुपौल शहर से 2 किलोमीटर दूर स्थित मलहद गांव में कचरा उठाने के लिए पहुंचा ठेली वाला | फोटो- राहुल कुमार गौरव

वहीं सुपौल शहर से 2 किलोमीटर दूर स्थित मलहद गांव में कचरा उठाने के लिए गाड़ी आती है. गांव के अभिनव झा बताते हैं, ‘शहर का विस्तार हुआ है. इसलिए लगभग 5-6 महीने से कचरे की गाड़ी हमारे गांव तक आ रही है. हालांकि 50% कचरा ही गाड़ी में जाता है, बाकी लोग आज भी खेत में ही फेंकते हैं.’

आदर्श गांव पचगछिया से सीखना चाहिए

पचगछिया गांव के मुखिया राघवेंद्र कुमार बताते है, ‘अभिया पचगछिया पंचायत भागलपुर शहर से लगभग 4 घंटे की दूरी पर स्थित है. हमारे गांव के चारों तरफ खेत खलियान भी हैं. इसके बावजूद हम लोगों ने प्रशासन पर जोर देकर सूखा कचरा और गीला कचरे के निपटान का व्यवस्था की है. ग्रामीण विकास विभाग के अधिकारियों ने भी बहुत मदद की.’

(राहुल कुमार गौरव स्वतंत्र पत्रकार हैं)


 

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