प्रयागराज, 24 जनवरी (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक आदेश में कहा है कि गिरफ्तारी मेमो में गिरफ्तारी के विशिष्ट आधार का उल्लेख करने में विफलता, कर्तव्य की अवहेलना के समान माना जाएगा और ऐसी गलती करने वाले पुलिसकर्मियों को निलंबित किया जाना चाहिए।
उमंत रस्तोगी नाम के व्यक्ति द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार करते हुए न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की पीठ ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को रिहा किया जाए और इस राज्य में गिरफ्तारी मेमो में गिरफ्तारी के विशिष्ट आधार का उल्लेख करने में विफल किसी भी पुलिस अधिकारी को निलंबित कर विभागीय कार्यवाही की जाए।
अदालत ने कहा, “बिना तथ्यों के महज फॉर्म भरकर कानूनी अनुपालन की खानापूर्ति करना, दायित्व की अवहेलना के समान है।”
उच्च न्यायालय ने कहा, “अब समय आ गया है कि जो पुलिस अधिकारी गिरफ्तारी मेमो की जरूरतों का पालन नहीं कर रहे और संविधान के अनुच्छेद-22(1) के तहत संवैधानिक जनादेश का उल्लंघन करने के अलावा भारतीय न्याय सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 47, 48 का उल्लंघन भी कर रहे हैं, उनके साथ सख्ती से निपटा जाए।”
पीठ ने निर्देश दिया कि इस आदेश की प्रति उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक के पास भेजी जाए।
इस मामले में याचिकाकर्ता ने गिरफ्तारी और गौतम बुद्ध नगर के दीवानी मामलों के न्यायाधीश द्वारा पारित रिमांड आदेश को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय का रुख किया था। याचिकाकर्ता का कहना था कि उसकी गिरफ्तारी अवैध है क्योंकि उसे गिरफ्तारी का आधार लिखित में नहीं दिया गया।
याचिकाकर्ता ने यह आरोप भी लगाया कि उसे गिरफ्तारी का कोई आधार बताए बगैर 26 दिसंबर, 2025 को उत्तराखंड के हल्द्वानी से गिरफ्तार किया गया। उसे गौतम बुद्ध नगर में रिमांड मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया, लेकिन उसे गिरफ्तारी मेमो की प्रति उपलब्ध नहीं कराई गई।
जब याचिकाकर्ता के वकील ने उसी दिन, उक्त आधार पर रिहाई के लिए आवेदन किया तो संबंधित मजिस्ट्रेट ने आवेदन खारिज कर दिया। इसलिए याचिकाकर्ता ने अवैध रिमांड के आदेश और गिरफ्तारी को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय का रुख किया।
अदालत ने पाया कि जहां जांच अधिकारी ने गिरफ्तारी मेमो तैयार करने के लिए सही प्रारूप का उपयोग किया, गिरफ्तारी के आधार से जुड़े कॉलम उचित ढंग से नहीं भरे गए।
भाषा
सं, राजेंद्र रवि कांत
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