नयी दिल्ली, 24 अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने पश्चिम बंगाल में एक अप्रैल को हुई उस सनसनीखेज घटना की जांच पूरी होने पर राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) को आरोप-पत्र दाखिल करने की शुक्रवार को अनुमति दे दी, जिसमें मालदा जिले में एक भीड़ ने सात न्यायिक अधिकारियों को बंधक बना लिया था।
पश्चिम बंगाल, ओडिशा और झारखंड के कुल 700 न्यायिक अधिकारी एसआईआर प्रक्रिया में तैनात हैं, ताकि मतदाता सूची से बाहर किए गए लोगों की 60 लाख से अधिक आपत्तियों का निपटारा किया जा सके।
शीर्ष अदालत ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पत्र पर स्वतः संज्ञान लिया था, जिसमें एक अप्रैल की रात की भयावह घटना का विवरण दिया गया था। इसमें कहा गया था कि सात न्यायिक अधिकारियों को भीड़ ने नौ घंटे से अधिक समय तक भोजन और पानी के बिना बंधक बनाकर रखा। इन अधिकारियों में तीन महिलाएं भी शामिल थीं। उन महिला अधिकारियों में से एक के साथ पांच साल का बच्चा भी था।
बाद में, निर्वाचन आयोग की शिकायत पर शीर्ष अदालत के निर्देश के तहत एनआईए को मामले की जांच का जिम्मा सौंपा गया था।
एनआईए की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) एस. वी. राजू ने प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ को बताया कि जांच एजेंसी ने अब तक की जांच का विवरण देते हुए एक नयी स्थिति रिपोर्ट दाखिल की है।
पीठ ने विधि अधिकारी की दलीलों का संज्ञान लेते हुए कहा, ‘‘एनआईए को सक्षम क्षेत्राधिकार वाली अदालत में आरोप-पत्र दाखिल करने की स्वतंत्रता होगी।’’
शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि फिलहाल एनआईए को आगे कोई स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने की आवश्यकता नहीं है। इस पर राजू ने कहा कि जांचकर्ता “व्यापक जांच में जुटे हैं”।
पीठ ने 13 अप्रैल को स्पष्ट किया था कि पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में लगे न्यायिक अधिकारियों को दी गई सुरक्षा व्यवस्था विधानसभा चुनाव के समापन तक जारी रहेगी और इसे अदालत की पूर्व-अनुमति के बिना वापस नहीं लिया जा सकता।
पीठ ने यह भी जानना चाहा कि क्या एक अप्रैल को सात न्यायिक अधिकारियों के घेराव के मामले में एनआईए द्वारा गिरफ्तार किए गए लोगों की कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि है।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘इस मामले को तार्किक निष्कर्ष तक ले जाना होगा।’’
भाषा सुरेश अविनाश
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