नयी दिल्ली, चार अप्रैल (भाषा) केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने शनिवार को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन द्वारा तीन-भाषा व्यवस्था की आलोचना पर निशाना साधते हुए कहा कि ‘थोपने’ की कहानी राजनीतिक विफलताओं को छिपाने का एक ‘घिसा-पिटा प्रयास’ है।
प्रधान ने कहा कि एक प्रगतिशील और समावेशी सुधार को ‘भाषाई थोप’ के रूप में गलत तरीके से प्रस्तुत करना केवल अनावश्यक चिंता और भ्रम पैदा करने का प्रयास है।
इससे पहले स्टालिन ने कहा कि तीन-भाषा सूत्र गैर-हिंदी भाषी क्षेत्रों में हिंदी को फैलाने की एक ‘छुपी हुई’ रणनीति है। उन्होंने आरोप लगाया कि सीबीएसई पाठ्यक्रम ढांचा भाषा थोपने का एक चिंताजनक प्रयास है।
इस आलोचना का जवाब देते हुए प्रधान ने कहा, ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020, वास्तव में भाषाई स्वतंत्रता का घोषणापत्र है। यह मातृभाषा को प्राथमिकता देती है ताकि हर तमिल बच्चा अपनी गौरवशाली मातृभाषा में उत्कृष्टता प्राप्त कर सके।’
उन्होंने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ‘एक लचीली नीति को अनिवार्य हिंदी के रूप में गलत तरीके से प्रस्तुत करके, आप तमिल की रक्षा नहीं कर रहे हैं; आप ऐसी बाधाएं पैदा कर रहे हैं जो हमारे युवाओं को बहुभाषी वैश्विक नेता बनने के अवसर से वंचित करती हैं।’
प्रधान ने कहा कि नई नीति सभी भाषाओं को समान रूप से बढ़ावा देकर संवैधानिक सिद्धांतों को बरकरार रखती है और मौजूदा दो-भाषा प्रणाली की सीमाओं को भी दूर करती है।
प्रधान ने कहा, “प्रशासनिक विफलताओं को छिपाने के लिए हिंदी थोपने का तर्क देना बंद करें और हर भारतीय भाषा को सशक्त बनाने के राष्ट्रीय मिशन में शामिल हों।”
भाषा तान्या रंजन
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