नयी दिल्ली, 15 जनवरी (भाषा) तेल एवं गैस उद्योग ने वित्त वर्ष 2026-27 के आम बजट में कच्चे तेल पर लगने वाले ‘तेल उद्योग विकास’ (ओआईडी) उपकर को समाप्त करने या इसकी समीक्षा करने की मांग करते हुए कहा है कि इसका घरेलू उत्पादन और परियोजनाओं की व्यवहार्यता पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है।
भारतीय पेट्रोलियम उद्योग महासंघ (एफआईपीआई) ने वित्त मंत्रालय को बजट के बारे में भेजे गए अपने सुझाव में कहा है कि ओआईडी उपकर अब पेट्रोलियम उद्योग के लिए अत्यधिक बोझ बन गया है। उसने कहा कि ऐतिहासिक रूप से यह उपकर कच्चे तेल की कीमत का केवल 8-10 प्रतिशत रहा है।
तेल उद्योग (विकास) अधिनियम, 1974 के तहत लगाए जाने वाले ओआईडी उपकर को वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट के बाद एक मार्च, 2016 से विशिष्ट दर के बजाय 20 प्रतिशत मूल्य-आधारित शुल्क में बदल दिया गया था।
यह उपकर केवल उन्हीं तेल ब्लॉक पर लागू होता है जिनमें खोज एवं उत्पादन का अधिकार सरकार पहले ही नामित कंपनियों को दे चुकी थी या जो 1997 से पहले की पुरानी लाइसेंसिंग नीति (प्री-एनईएलपी) के तहत आए हैं।
एफआईपीआई ने कहा कि असल में ये ब्लॉक अधिकांशतः पुराने और उत्पादन में गिरावट की स्थिति वाले हैं लिहाजा इनमें उत्पादन बनाए रखने के लिए अधिक निवेश की जरूरत होती है।
इसके उलट, नवीन खोज लाइसेंस नीति (एनईएलपी), मुक्त क्षेत्र लाइसेंस नीति (ओएएलपी) और खोजे गए छोटे क्षेत्र (डीएसएफ) ब्लॉकों पर यह उपकर लागू नहीं है।
उद्योग निकाय ने कहा है कि मुंबई हाई और बेसिन जैसे ओएनजीसी के बड़े क्षेत्र नामित ब्लॉक हैं, जबकि वेदांता केयर्न का राजस्थान क्षेत्र एनईएलपी-पूर्व ब्लॉक है।
संगठन ने यह भी कहा कि ओआईडी उपकर केवल घरेलू कच्चे तेल पर लगने से स्थानीय उत्पादक आयातित तेल की तुलना में नुकसान में रहते हैं और यह ‘मेक इन इंडिया’ तथा ‘आत्मनिर्भर भारत’ के उद्देश्यों के विपरीत है।
उद्योग निकाय ने इस उपकर को पूरी तरह खत्म करने की जगह कच्चे तेल की कीमत से जुड़ा चरणबद्ध उपकर लागू करने का सुझाव दिया है। इसके तहत 25 डॉलर प्रति बैरल तक शून्य उपकर, 25-50 डॉलर पर पांच प्रतिशत, 50-70 डॉलर पर 10 प्रतिशत और 70 डॉलर से ऊपर 20 प्रतिशत उपकर लगाने का प्रस्ताव है।
इसके अलावा, एफआईपीआई ने घरेलू कच्चे तेल पर लगने वाले ‘राष्ट्रीय आपदा आकस्मिक शुल्क’ (एनसीसीडी) और ‘बुनियादी उत्पाद शुल्क’ को भी हटाने की मांग की है।
संगठन का कहना है कि इन करों को हटाने से नियामकीय बोझ कम होगा और कारोबारी सुगमता को बढ़ावा मिलेगा।
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प्रेम रमण
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