नयी दिल्ली, 22 अगस्त (भाषा) नेशनल बायोस्टिमुलेंट इंडस्ट्री फेडरेशन (एनबीआईएफ) ने प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) से आग्रह किया है कि वह नीति आयोग, कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय (एमओए एंड एफडब्ल्यू), और एमएसएमई मंत्रालय को निर्देश दे ताकि भारतीय जैव-उत्प्रेरक उद्योग के लिए ठोस और समन्वित सुधार किए जा सकें, जो विदेशों में शुल्क बाधाओं और घरेलू स्तर पर नियामकीय समस्याओं का सामना कर रहा है।
एक बयान के अनुसार, एनबीआईएफ ने कहा कि जैसे ही सतत कृषि की ओर वैश्विक बदलाव गति पकड़ता है, भारत का बायोस्टिमुलेंट उद्योग – 5,000 से अधिक एमएसएमई और नवप्रवर्तकों द्वारा संचालित – एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है। अपनी समृद्ध जैव विविधता, कच्चे माल की बहुतायत और विनिर्माण विशेषज्ञता के बावजूद, 4,000 करोड़ रुपये मूल्य वाला भारतीय बायोस्टिमुलेंट उद्योग दोहरी चुनौती का सामना कर रहा है।
एनबीआईएफ ने चेतावनी दी कि विदेशों में, निर्यातकों को प्रमुख वैश्विक बाजारों में 15-28 प्रतिशत के शुल्क का सामना करना पड़ता है, जो उद्योग के विकास और वैश्विक बाजार में हिस्सेदारी को प्रभावित कर रहा है।
बयान में कहा गया कि जैव-उत्प्रेरक उद्योग को गैर-शुल्क बाधाओं से भी निपटना होगा, जिनमें उत्पत्ति-विशिष्ट दक्षता परीक्षण, अवशेष परीक्षण और अस्थिर एचएस वर्गीकरण शामिल हैं। यूरोपीय संघ और आसियान जैसे प्रमुख ब्लॉक के साथ पारस्परिक मान्यता समझौतों (एमआरए) की अनुपस्थिति भारतीय निर्यातकों के लिए एक और बड़ी समस्या है।
इसमें कहा गया है कि घरेलू स्तर पर, घरेलू कारोबारी उर्वरक नियंत्रण आदेश (एफसीओ) के तहत उत्पाद अनुमोदन में नियामकीय अस्पष्टता और देरी से जूझ रहे हैं। इसके अलावा, समुद्री शैवाल, ह्यूमिक एसिड या अमीनो एसिड जैसे प्राकृतिक पदार्थों के लिए कोई समर्पित परीक्षण प्रोटोकॉल नहीं है। इसके साथ ही आईसीएआर, एमओए एंड एफडब्ल्यू और राज्य उर्वरक नियंत्रकों के बीच तालमेल की कमी है, जिससे कार्यान्वयन में दिक्कतें पैदा हो रही है।
एनबीआईएफ के अध्यक्ष राजित चोकसी ने कहा, ‘‘उद्योग को सब्सिडी की जरूरत नहीं है। इसे स्पष्ट, विज्ञान-आधारित और उद्योग-तालमेलयुक्त विनियमन की जरूरत है।’’
फेडरेशन ने कहा कि विदेशी खिलाड़ी पहले से ही भारतीय बाजार की क्षमता का फायदा उठा रहे हैं जबकि भारतीय एमएसएमई नियामक गतिरोध का सामना कर रहे हैं।
एनबीआईएफ के महासचिव साहिल मलिक ने कहा, ‘वैश्विक कारोबारी भारत का उपयोग, विनिर्माण और निर्यात के लिए करते हैं, जबकि स्थानीय एमएसएमई घरेलू मंजूरी भी नहीं प्राप्त कर सकते हैं। यह एक गैर-बराबरी वाले खेल का मैदान है।’’
इसने कहा, ‘‘पीएमओ को इस मामले में आगे आकर नेतृत्व करना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि भारतीय निर्माता विदेशी फर्मों के लिए अनुबंध पैकर्स तक सीमित न रह जाएं। बल्कि भारत को ब्रांड बनना चाहिए – न कि केवल फैक्ट्री।’’
भाषा राजेश
राजेश अजय
अजय
यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.
