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Friday, 16 January, 2026
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तेल-तिलहन कीमतों में मिला-जुला रुख

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नयी दिल्ली, 26 दिसंबर (भाषा) एशियाई खाद्य तेल-तिलहन बाजारों में तेजी के कारण दिल्ली तेल-तिलहन बाजार में सोमवार को सोयाबीन तेल, कच्चा पामतेल (सीपीओ) और पामोलीन तेल कीमतों में सुधार देखने को मिला। वहीं बेपड़ता होने के कारण तेल संयंत्र की कमजोर मांग की वजह से सोयाबीन तिलहन के भाव कमजोर बंद हुए। सर्दियों की मांग होने के बावजूद तेल मिलों को पेराई में नुकसान होने के बीच सरसों और मूंगफली तेल-तिलहन और बिनौला जैसे देशी ‘सॉफ्ट’ तेल की कीमतें पूर्वस्तर पर बंद हुईं।

बाजार के जानकार सूत्रों ने कहा कि सस्ते आयातित तेलों की मौजूदगी में देशी तेल-तिलहन उद्योग, किसान और उपभोक्ता परेशान हैं। यदि सस्ते तेलों पर आयात शुल्क लगाकर हालत काबू में नहीं किया गया तो एक दो महीने के बाद पेराई होने वाली सरसों की बुवाई प्रभावित हो सकती है। अप्रैल, मई में जिस सरसों, सूरजमुखी और सोयाबीन जैसे खाद्य तेलों के दाम, आयातित हल्के तेलों से 20 रुपये लीटर नीचे थे वह मौजूदा समय में काफी अधिक हो गए हैं। सस्ते आयातित तेलों के सामने सरसों का बाजार में खपना दूभर हो जायेगा। सरसों, मूंगफली, सोयाबीन और बिनौला अगर बाजार में खपत नहीं होंगे तो हमें इनसे तेल खल और डीआयल्ड केक (डीओसी) भी प्राप्त नहीं होंगे और इससे मुर्गीदाने और डीओसी की कमी होगी। इस कमी की वजह से हमें दो नुकसान होंगे। एक तो डीओसी और खल के निर्यात से होने वाली विदेशी मुद्रा आय का नुकसान होगा, दूसरा देशी तेल-तिलहन का स्टॉक जमा बच जायेगा।

सूत्रों ने कहा कि जिस देश में लगभग 60 प्रतिशत खाद्य तेल की मांग को आयात से पूरा किया जाता हो वहां देशी तेल-तिलहन खपे नहीं, तेल उद्योग बेपड़ता कारोबार के कारण भारी नुकसान में हो साथ ही सस्ते आयातित तेल का लाभ उपभोक्ताओं को न मिले, ये सब परस्पर विरोधी बातें हैं। अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) को थोक मूल्य से काफी अधिक रखे जाने की वजह से खुदरा बाजार में उपभोक्ताओं को इन खाद्य तेलों को कहीं महंगे में खरीदना पड़ रहा है। यह सारी परिस्थितियां तेल-तिलहन उत्पादन में आत्मनिर्भर होने के बजाय देश को खाद्य तेलों के आयात पर निर्भरता की ओर ले जा सकती हैं। इस परिस्थिति पर तत्काल कोई कदम उठाना होगा तभी देश का तेल-तिलहन उद्योग संरक्षित रह पायेगा।

सूत्रों ने बताया कि ‘क्रिसमस’ की छुट्टियों के कारण मलेशिया और शिकॉगो एक्सचेंज बंद रहे। लेकिन चीन जैसे एशियाई बाजार में खाद्य तेल कीमतों में आई मजबूती का असर स्थानीय खाद्य तेल-तिलहनों पर दिखाई दिया और सोयाबीन तेल, सीपीओ और पामोलीन के भाव मजबूत हो गये। सस्ते आयातित तेलों के मुकाबले महंगा होने के कारण मांग कमजोर रहने के बीच सरसों, मूंगफली तेल-तिलहन और बिनौला तेल के भाव पूर्वस्तर पर बने रहे। जबकि स्थानीय तिलहन के ऊंचे भाव के मुकाबले सस्ता आयातित तेल उपलब्ध होने से सोयाबीन तिलहन कीमतों में गिरावट आई।

सूत्रों ने कहा कि सरकार को ‘एमआरपी’ को लेकर कोई नियम कानून तय करना चाहिये। थोक बिक्री भाव के मुकाबले इसके निर्धारण की कोई निश्चित सीमा तय करने से स्थिति में कुछ सुधार हो सकता है। कई मामलों में देखा गया है कि यह थोक भाव के मुकाबले 60-70 रूपये तक अधिक तय कर दिया जाता है जिससे खुदरा कारोबारी भरपूर फायदा उठाते हैं जबकि थोक विक्रेताओं की हालत पतली है। थोक भाव जरूर कम हुए हैं पर एमआरपी की मनमानी वसूली की वजह से खुदरा में उपभोक्ताओं को पहले से भी अधिक कीमत अदा करनी पड़ रही है। इन परिस्थितियों के बारे में बहुत ध्यान देने की जरुरत है।

सूत्रों ने कहा कि तेल-तिलहन कारोबार से दूध और अंडा उत्पादन भी सीधा जुड़ा है क्योंकि सरसों, बिनौला, सोयाबीन और मूंगफली जैसे तिलहन से हमें खल और डीओसी प्राप्त होते है। इन खल और डीओसी की कमी से ही हाल के दिनों में दूध और अंडे महंगे हुए हैं। देश में तेल-तिलहन की खपत लगभग सालाना लगभग सवा दो करोड़ टन (पामतेल छोड़कर) है जबकि दूध की ,लगभग 13 करोड़ टन सालाना से भी कहीं अधिक की खपत होती है जिसका मुद्रास्फीति पर कहीं ज्यादा असर आता है।

सूत्रों ने कहा कि किसानों के फसल का भाव वैसे तो न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से अधिक है पर दो वर्ष पूर्व उन्हें सोयाबीन की जो कीमत (लगभग 10,000 रुपये क्विंटल) मिली थी उसके मुकाबले किसानों को इसकी मौजूदा कीमत काफी कम लग रही है और इसलिए वे अपना माल तेल मिलों में नहीं ला रहे हैं। तेल उद्योग अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। किसानों पर कोई ‘स्टॉक लिमिट’ जैसे नियम भी लागू नहीं होते कि उन्हें जबर्दस्ती बेचने को बाध्य किया जाये।

सोमवार को तेल-तिलहनों के भाव इस प्रकार रहे:

सरसों तिलहन – 7,030-7,080 (42 प्रतिशत कंडीशन का भाव) रुपये प्रति क्विंटल।

मूंगफली – 6,485-6,545 रुपये प्रति क्विंटल।

मूंगफली तेल मिल डिलिवरी (गुजरात) – 15,250 रुपये प्रति क्विंटल।

मूंगफली रिफाइंड तेल 2,445-2,710 रुपये प्रति टिन।

सरसों तेल दादरी- 14,100 रुपये प्रति क्विंटल।

सरसों पक्की घानी- 2,135-2,265 रुपये प्रति टिन।

सरसों कच्ची घानी- 2,195-2,320 रुपये प्रति टिन।

तिल तेल मिल डिलिवरी – 18,900-21,000 रुपये प्रति क्विंटल।

सोयाबीन तेल मिल डिलिवरी दिल्ली- 13,750 रुपये प्रति क्विंटल।

सोयाबीन मिल डिलिवरी इंदौर- 13,450 रुपये प्रति क्विंटल।

सोयाबीन तेल डीगम, कांडला- 11,750 रुपये प्रति क्विंटल।

सीपीओ एक्स-कांडला- 8,550 रुपये प्रति क्विंटल।

बिनौला मिल डिलिवरी (हरियाणा)- 11,850 रुपये प्रति क्विंटल।

पामोलिन आरबीडी, दिल्ली- 10,150 रुपये प्रति क्विंटल।

पामोलिन एक्स- कांडला- 9,200 रुपये (बिना जीएसटी के) प्रति क्विंटल।

सोयाबीन दाना – 5,500-5,600 रुपये प्रति क्विंटल।

सोयाबीन लूज- 5,320-5,340 रुपये प्रति क्विंटल।

मक्का खल (सरिस्का)- 4,010 रुपये प्रति क्विंटल।

भाषा राजेश राजेश अजय

अजय

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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