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Thursday, 18 July, 2024
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जलवायु से जुड़े खतरों को लेकर तैयार नहीं भारतीय बैंक- RBI को करनी होगी कार्रवाई, नई रिपोर्ट में खुलासा

क्लाइमेट रिस्क होराइज़न्स ने जिन 34 बैंकों का विश्लेषण किया, उनमें से किसी ने भी जलवायु परिवर्तन की स्थिति में, अपनी निवेश सूची के लचीलेपन का मूल्यांकन नहीं किया है. केवल 2 बैंकों ने नए कोयला बिजली संयंत्रों को पैसा न देने की प्रतिबद्धिता जताई है.

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नई दिल्ली: भारत के सबसे बड़े बैंक जलवायु परिवर्तन को अपनाने के लिए पर्याप्त रूप से तैयार नहीं हैं, और अभी तक अपने रोज़मर्रा के फैसलों और व्यवसायिक रणनीतियों में, जलवायु संबंधी वित्तीय ख़तरों को शामिल नहीं कर रहे हैं, ये ख़ुलासा एक नई स्टडी में किया गया है.

सोमवार को जारी थिंक-टैंक क्लाइमेट रिस्क होराइज़न्स की रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के ख़तरों को कम करने, और स्वच्छ ऊर्जा पर जाने का वित्त-पोषण करने में, बैंकों, विशेषकर केंद्रीय बैंकों को एक अहम भूमिका निभानी है.

यूएन के जलवायु परिवर्तन पर इंटर गवर्मेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) की ताज़ा रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत जलवायु परिवर्तन के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील देशों में से एक है, और मानव प्रेरित ग्लोबल वार्मिंग होने की वजह से, 1991 से इसकी प्रति-व्यक्ति जीडीपी 16 प्रतिशत कम चल रही है.

कई वित्तीय संस्थाओं ने कहा है, कि जलवायु परिवर्तन की वजह से भारत की जीडीपी प्रभावित होगी. लेकिन, क्लाइमेट रिस्क होराइज़न्स की रिपोर्ट में पाया गया कि जिन 34 बैंकों का विश्लेषण किया गया, उनमें से किसी ने भी जलवायु परिवर्तन की स्थिति में अपनी निवेश सूची के लचीलेपन का मूल्यांकन नहीं किया है. केवल 2 बैंकों ने नए कोयला बिजली संयंत्रों को पैसा न देने की प्रतिबद्धिता जताई है.

रिपोर्ट में 34 बैंकों की सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी का, 10 मानदंडों पर विश्लेषण किया, जिसमें कुल 20 अंक निर्धारित थे. इनमें से 29 बैंकों को 10 से कम अंक मिले, जो रिपोर्ट के मुताबिक़, ‘ख़तरे की टिमटिमाती लाल बत्ती की तरह होनी चाहिए थी’.

जिन बैंकों का विश्लेषण किया गया उनमें आईसीआईसीआई बैंक, कोटक महिंद्रा बैंक, बैंक ऑफ इंडिया, भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) और पंजाब नेशनल बैंक जैसे बड़े बैंक शामिल हैं.

रिपोर्ट में आगे कहा गया, ‘ये सामूहिक निष्क्रियता भारतीय अर्थव्यवस्था को, ऐसे वित्तीय संस्थानों से दीर्घ-कालिक संभावित नुक़सान की याद दिलाती है, जो जलवायु परिवर्तन के ख़तरों से निपटने के समय सोते हुए नज़र आते हैं. इस वजह से और भी ज़रूरी हो जाता है कि भारतीय रिज़र्व बैंक जैसी नियामक एजेंसियां, सुधारात्मक कार्रवाई के लिए क़दम उठाएं’.


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सार्वजनिक बैंकों से आगे हैं निजी बैंक

विश्लेषण किए गए 34 बैंकों में से 12 सार्वजनिक क्षेत्र से थे, 18 निजी क्षेत्र से थे, और चार छोटे वित्तीय बैंक थे, जो 31 मार्च 2021 तक कुल मिलाकर, 26.81 लाख करोड़ का प्रतिनिधित्व करते थे.

बैंकों के मूल्यांकन के कुछ मानदंड थे- कोयले में निवेश को चरणबद्ध तरीके से हटाना, प्रत्यक्ष व परोक्ष उत्सर्जनों का ख़ुलासा और सत्यापन करना, ग्रीन लोन्स जारी करना, जलवायु राहत या अनुकूलन का वित्तपोषण और विभिन्न प्रकार के उत्सर्जनों तथा और उनकी कार्यान्वयन योजनाओं के लिए नेट-ज़ीरो लक्ष्य तय करना.

यस बैंक ने सबसे अधिक 15 अंक अर्जित किए, जिसे एक, दो, और तीन स्कोप्स के तहत, अपने उत्सर्जनों का ख़ुलासा और सत्यापन करने के लिए दूसरों से अधिक अंक मिले.

ग्रीनहाउस गैस प्रोटोकोल के अंतर्गत स्कोप वन उत्सर्जन वो होते हैं, जो स्वामित्व या नियंत्रण वाले स्रोतों (जैसे फॉसिल फ्यूल) से सीधे तौर पर निकलते हैं. स्कोप टू वो होते हैं जो ख़रीदी हुई बिजली, भाप और रिपोर्टिंग कंपनी द्वारा हीटिंग और कूलिंग से परोक्ष रूप से पैदा होते हैं. स्कोप तीन में वो तमाम अप्रत्यक्ष उत्सर्जन शामिल होते हैं, जो किसी कंपनी की वैल्यू चेन में होते हैं.

14 अंकों के साथ इंडसइंड बैंक दूसरे स्थान पर था, जबकि एक्सिस बैंक और एचडीएफसी बैंक 12-12 अंकों के साथ तीसरे स्थान पर रहे.

रिपोर्ट में कहा गया, ‘शीर्ष 10 में सभी बैंक निजी हैं, सिवाय एसबीआई को छोड़कर, जो छठे स्थान पर है. ग़ौरतलब है कि 34 में आधे से अधिक बैंकों के शून्य या एक अंक थे’.

बैंक ऑफ बड़ौदा, पंजाब नेशनल बैंक, कर्नाटक बैंक, बैंक ऑफ इंडिया, और केनरा बैंक उन संस्थाओं में से थे, जिन्हें सिर्फ एक अंक मिला.

महत्वपूर्ण निष्कर्ष

रिपोर्ट के अनुसार, किसी भी बैंक ने स्कोप एक, दो, और तीन के उत्सर्जनों को कवर करने के लिए, दीर्घ-कालिक नेट-ज़ीरो टारगेट्स और क्रियान्वयन योजना निर्धारित नहीं की है.

केवल एचडीएफसी और यस बैंक दो ऐसे बैंक थे, जिन्होंने स्कोप एक और दो उत्सर्जनों के तहत लक्ष्य निर्धारित किए थे, जबकि एसबीआई का ‘एक दीर्घ-कालिक कार्बन न्यूट्रल साल का लक्ष्य था, जिसमें शामिल किए गए उत्सर्जनों के स्कोप का स्पष्ट रूप से विवरण नहीं था’.

नवंबर 2021 में ग्लासगो में आयोजित यूएन जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (सीओपी26) में, भारत ने 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन का लक्ष्य प्राप्त करने की प्रतिबद्धता ज़ाहिर की, जिसके लिए तेज़ी के साथ बैंकिंग समेत सभी क्षेत्रों का एक रोडमैप तैयार करने की ज़रूरत है, जो इस लक्ष्य की प्राप्ति के दौरान आर्थिक विकास को बनाए रखेगा.

रिपोर्ट में कहा गया कि अधिकतर बैंकों (26) ने, स्कोप एक और दो के तहत अपने उत्सर्जनों का ख़ुलासा नहीं किया, जबकि केवल छह ने अपने उत्सर्जनों को किसी तीसरी पार्टी से प्रमाणित कराया.

उसमें आगे कहा गया, ‘सकारात्मक पक्ष ये है कि 27 बैंकों ने जलवायु परिवर्तन में कमी या अनुकूलन के लिए, ग्रीन लोन्स/बॉण्ड्स/ वित्त पोषण उपलब्ध कराए. लेकिन, केवल 11 बैंकों ने संबंधित वित्त-पोषित गतिविधियों के अलग अलग मूल्यों का ख़ुलासा किया, जिससे स्वतंत्र सत्यापन के काम में मुश्किल पेश आई’.

रिपोर्ट में कहा गया कि जलवायु परिवर्तन के प्रति लचीलापन लाने, और जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप सामने आने वाले वित्तीय ख़तरों के प्रति, बेहतर ढंग से तैयार रहने के लिए, बैंकों को पहला क़दम ये उठाना चाहिए कि अपने उत्सर्जनों को लेकर ज़्यादा पारदर्शी बनें. उसमें आगे कहा गया कि बैंकों को कोयले में निवेश को, अपनी निवेश सूची में विस्तार से बाहर रखने के लिए भी ज़्यादा प्रयास करने चाहिए.

भारत का बैंकिंग क्षेत्र और जलवायु परिवर्तन

रिपोर्ट में कहा गया कि बैंकों के नियामक के तौर पर, भारतीय रिज़र्व बैंक इस बारे में एक अहम भूमिका निभा सकता है, कि बैंक जलवायु परिवर्तन के हिसाब से ख़ुद को कैसे ढालते हैं.

हाल के वर्षों में, आरबीआई ने स्वीकार किया है कि जलवायु परिवर्तन वित्तीय स्थिरता के लिए ख़तरा पैदा कर सकता है. मसलन, मार्च 2021 में, उसने अपने विनियमन विभाग के भीतर एक सस्टेनेबल फाइनेंस ग्रुप का गठन किया, जिसका मक़सद ‘जलवायु परिवर्तन से जुड़े विषयों पर, दूसरी राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों के साथ समन्वय करना था’.

इस महीने जारी एक बुलेटिन में, आरबीआई ने विश्लेषण किया कि ग्रीन ऊर्जा पर जाने से, फॉसिल फ्यूल-आधारित उद्योगों पर क्या असर पड़ेगा.

क्लाइमेट रिस्क होराइज़न्स रिपोर्ट में कहा गया, ‘लेकिन इन बयानात के बावजूद, पिछले दो साल से अधिक से आरबीआई ने अभी तक, अनुसूचित और कॉमर्शियल बैंकों (एससीबीज़) के लिए, ख़तरों के आकलन और प्रबंधन पर जलवायु संबंधी कोई दिशा-निर्देश, और अनुपालन संस्कृति या व्यवसायिक रणनीति जारी नहीं की है’.

क्लाइमेट रिस्क होराइज़न्स के सीईओ आशीष फर्नाण्डिस ने रिपोर्ट के साथ एक बयान में कहा, ‘वैश्विक स्तर पर केंद्रीय बैंक जलवायु मुद्दे के प्रति जागरूक हो रहे हैं. दुनिया भर के 106 बैंकों ने, जो 68 ट्रिलियन डॉलर की संपत्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं, साल 2050 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन हासिल करने की प्रतिबद्धता जताई है. यूएन के संयोजन में नेट-ज़ीरो बैंकिंग गठबंधन में 40 देशों के बैंक सदस्यों के तौर पर सूचीबद्ध हैं, लेकिन इसमें भारत से एक भी बैंक नहीं है’.

फर्नाण्डिस ने आगे कहा, ‘ये सुनिश्चित करने में आरबीआई की एक महत्वपूर्ण भूमिका है कि भारतीय कॉमर्शियल बैंक जलवायु परिवर्तन को, एक प्रणालीगत आर्थिक ख़तरे की तरह देखें, जो कि वो है’.

(इस ख़बर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

(खुलासा: उदय कोटक दिप्रिंट के प्रतिष्ठित संस्थापक-निवेशकों में से हैं. कृपया निवेशकों के विवरण के लिए यहां क्लिक करें.)


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