नयी दिल्ली, चार फरवरी (भाषा) भारत ने अमेरिका के साथ व्यापार समझौते में अपने कृषि और दुग्ध क्षेत्रों के हितों की पूरी तरह रक्षा की है।
यह समझना जरूरी है कि भारत अपने कृषि और दुग्ध क्षेत्र की रक्षा क्यों कर रहा है। इस मुद्दे को स्पष्ट करने के लिए प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं:-
भारत में कृषि संवेदनशील क्षेत्र-
कृषि एवं पशुपालन जैसी संबद्ध गतिविधियां भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, जो 70 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार प्रदान करती हैं। विकसित अर्थव्यवस्थाओं के विपरीत जहां कृषि अत्यधिक मशीनीकृत तथा कॉरपोरेट आधारित है, भारत में यह आजीविका का सवाल है।
विकसित देशों की उन कंपनियों को कृषि आयात शुल्क में छूट देना (जो अपने किसानों को भारी सब्सिडी देते हैं) भारत में सस्ते खाद्यान्न एवं उत्पादों की बाढ़ ला सकता है। इससे भारतीय किसानों की आय और आजीविका पर गंभीर असर पड़ेगा।
वैश्विक कृषि व्यापार परिदृश्य-
रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक खाद्य व्यापार का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा करीब पांच बहुराष्ट्रीय कंपनियों के नियंत्रण में है जिन्होंने ऐतिहासिक रूप से आक्रामक मूल्य निर्धारण रणनीतियों का इस्तेमाल किया है।
यदि भारत इसमें ढील देता है, तो घरेलू किसान इन वैश्विक दिग्गजों पर निर्भर हो सकते हैं जिसके गंभीर राजनीतिक एवं आर्थिक परिणाम हो सकते हैं। यही कारण है कि कृषि भारत सरकार के लिए एक विवादास्पद मुद्दा बना हुआ है।
विकसित देश ज्यादा बाजार पहुंच चाहते हैं-
भारत में कृषि केवल आर्थिक गतिविधि नहीं बल्कि जीवनशैली है, जो 70 करोड़ से अधिक लोगों का सहारा है। भारत खाद्य उत्पादन में काफी हद तक आत्मनिर्भर है, जबकि अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय संघ जैसे देशों के लिए कृषि एक बड़ा व्यापारिक उद्योग है।
एक रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में अमेरिका का कृषि निर्यात 176 अरब डॉलर का रहा जो उसके कुल वस्तु निर्यात का करीब 10 प्रतिशत है।
बड़े पैमाने पर मशीनी खेती एवं भारी सरकारी सब्सिडी से अमेरिका और अन्य विकसित देश भारत को अपने निर्यात विस्तार के लिए आकर्षक बाजार मानते हैं।
कृषि संरक्षण-
भारत का कृषि क्षेत्र फिलहाल मध्यम से ऊंचे शुल्क या आयात शुल्क एवं नियमों के जरिये संरक्षित है, ताकि घरेलू किसानों को अनुचित प्रतिस्पर्धा से बचाया जा सके। किसी क्षेत्र को खोलने का मतलब आयात प्रतिबंध और शुल्क कम करना होता है।
भारत में आयात शुल्क की स्थिति-
भारत कृषि क्षेत्र की सुरक्षा के लिए शून्य से 150 प्रतिशत तक का शुल्क ढांचा बनाए रखता है। अमेरिका भी कुछ कृषि उत्पादों पर ऊंचे शुल्क लगाता है जैसे तंबाकू पर 350 प्रतिशत।
इसके अलावा, विशेषज्ञों के अनुसार अमेरिका जटिल नॉन-एड वैलोरेम (एनएवी) शुल्क भी लगाता है जिससे आयात महंगा हो जाता है। इस तथ्य को व्यापार चर्चाओं में अक्सर नजरअंदाज किया जाता है।
भारत को अमेरिका का कृषि निर्यात-
भारत को अमेरिका का कृषि निर्यात 2024 में 1.6 अरब डॉलर रहा। प्रमुख निर्यातों में बादाम (छिलके सहित – 86.8 करोड़ डॉलर), पिस्ता (12.1 करोड़ डॉलर), सेब (2.1 करोड़ डॉलर) और एथनॉल/एथाइल अल्कोहल (26.6 करोड़ डॉलर) शामिल हैं।
व्यापार विशेषज्ञों के मुताबिक अमेरिका अपने कृषि क्षेत्र को भारी सब्सिडी देता है और कुछ वर्षों में यह उत्पादन मूल्य के 50 प्रतिशत से भी ज्यादा रही है जैसे चावल पर 82 प्रतिशत, कैनोला पर 61 प्रतिशत, चीनी पर 66 प्रतिशत, कपास पर 74 प्रतिशत, मोहायर पर 141 प्रतिशत और ऊन पर 215 प्रतिशत है।
क्या सभी कृषि उत्पाद संवेदनशील हैं?
देश की 50 प्रतिशत से अधिक आबादी कृषि पर निर्भर होने के कारण भारत पूरे क्षेत्र को संवेदनशील मानता है। विशेष रूप से मुख्य फसलों, दुग्ध एवं प्रमुख कृषि उत्पादों पर आयात शुल्क ग्रामीण आजीविका के लिए बेहद अहम हैं।
विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) नियम-
भारत के कृषि शुल्क विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) प्रतिबद्धताओं का उल्लंघन नहीं करते। नियम सदस्य देशों को खाद्य सुरक्षा एवं ग्रामीण रोजगार से जुड़े संवेदनशील क्षेत्रों की रक्षा की अनुमति देते हैं जो भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
भारत का कृषि निर्यात-
वित्त वर्ष 2024-25 में भारत का कुल कृषि निर्यात बढ़कर 51 अरब डॉलर से अधिक हो गया, जो 2023-24 में 45.7 अरब डॉलर था। इसमें से करीब पांच अरब डॉलर अमेरिका को गया। 2024-25 में भारत का कुल निर्यात 437 अरब डॉलर रहा।
भारत अगले चार वर्ष में कृषि, समुद्री उत्पाद तथा खाद्य एवं पेय पदार्थों के संयुक्त निर्यात को 100 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखता है।
विश्व व्यापार संगठन के आंकड़ों के अनुसार, मूल्य के आधार पर भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कृषि उत्पादक है लेकिन वैश्विक कृषि निर्यात में उसकी हिस्सेदारी केवल 2.2 प्रतिशत है जो 2000 में 1.1 प्रतिशत थी।
प्रमुख निर्यातों में चाय, कॉफी, चावल, कुछ अनाज, मसाले, काजू, तेल खली, तिलहन, फल और सब्जियां शामिल हैं।
कृषि में गैर-शुल्क बाधाएं-
शुल्क व्यापार समीकरण का केवल एक हिस्सा हैं। गैर-शुल्क उपाय भी बाजार पहुंच सीमित करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं।
आर्थिके शोध संस्थान ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव के अनुसार, अमेरिका के जटिल ‘सैनिटरी एंड फाइटोसैनिटरी’ (एसपीएस) नियम अक्सर छिपी हुई व्यापार बाधाओं की तरह काम करते हैं।
मिसाल के तौर पर, अमेरिका द्वारा कृषि उत्पादों में कीटनाशकों एवं रसायनों पर लगाए गए अधिकतम अवशेष सीमा (एमआरएल) दुनिया में सबसे सख्त हैं जिससे भारत सहित विकासशील देशों के लिए अनुपालन कठिन हो जाता है।
भाषा निहारिका मनीषा
मनीषा
यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.
