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Tuesday, 24 February, 2026
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बीते सप्ताह खाद्य तेल, तिलहन कीमतों में मिला-जुला रुख

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नयी दिल्ली, 29 जनवरी (भाषा) विदेशी बाजारों में खाद्य तेलों के दाम में सुधार के बीच दिल्ली तेल-तिलहन बाजार में बीते सप्ताह कच्चे पामतेल (सीपीओ) और पामोलीन तेल के अलावा किसानों द्वारा नीचे भाव में बिकवाली नहीं करने से सोयाबीन तिलहन के दाम में सुधार आया। दूसरी ओर पिछले तीन महीनों में सभी खाद्य तेलों का भारी मात्रा में आयात होने से सरसों और मूंगफली तेल-तिलहन, सोयाबीन और बिनौला तेल कीमतों में गिरावट आई।

बाजार के जानकार सूत्रों ने कहा कि पिछले दिनों विदेशी बाजारो में कच्चे पामतेल (सीपीओ) और पामोलीन के दाम में कुछ सुधार हुआ है। जिसकी वजह से यहां सीपीओ और पामोलीन के दाम में मामूली सुधार देखने को मिला। सीपीओ के आयात में नुकसान है क्योंकि आयात भाव के मुकाबले उसका स्थानीय भाव नीचे है। उन्होंने कहा कि कच्चे पामतेल (सीपीओ) और पामोलीन के आयात से देश के तिलहन कारोबार पर कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता है। ये दोनों ही तेल भारी तेल में गिने जाते हैं और इसका औद्योगिक मांग और कमजोर आयवर्ग के उपयोग के लिए आयात किया जाता है और ये नरम तेलों से सस्ते भी होते हैं। हमारे देश के तिलहन कारोबार पर सबसे अधिक असर सूरजमुखी और सोयाबीन के आयात से पड़ता है। इन तेलों की घट-बढ़ हमारे देशी तेल तिलहनों पर भरपूर असर डालती है।

सूत्रों ने कहा कि देश में पाम तेल का आयात औसतन सालाना लगभग 90-95 लाख टन का होता है जबकि हल्के तेल में सूरजमुखी और सोयाबीन खाद्य तेल का आयात सालाना औसतन लगभग 45-50 लाख टन का होता है। रैपसीड पर तो सरकार ने पहले ही 38.5 प्रतिशत का आयात शुल्क लगा रखा है, इसलिए उसकी चिंता नहीं है।

सूत्रों ने बताया कि सूरजमुखी तेल की खपत देश में हर महीने लगभग पौने दो से दो लाख टन की होती है जबकि शुल्कमुक्त आयात की कोटा व्यवस्था के तहत जनवरी, 2023 में इसका आयात काफी बढ़कर लगभग चार लाख 70 हजार टन हो गया। सूरजमुखी तेल के साथ सोयाबीन तेल का भी जनवरी में अधिक आयात हुआ। सूरजमुखी तेल का थोक भाव बंदरगाह पर लगभग 100 रुपये लीटर पड़ता है। लगभग 15-20 दिन के भीतर देश की मंडियों में सरसों की नयी फसल आ जायेगी। इसके तेल का भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के हिसाब से लगभग 115 रुपये लीटर बैठना चाहिये। जबकि पिछले साल अप्रैल मई में सूरजमुखी से सरसों तेल लगभग 40 रुपये लीटर नीचे था। सोयाबीन तेल से भी सरसों तेल से लगभग 25 रुपये लीटर सस्ता था। इस बार तो सोयाबीन और सूरजमुखी के मुकाबले सरसों का दाम काफी अधिक है तो फिर यह बाजार में कैसे खपेगा? देश में तिलहन उत्पादन को बढ़ाने के लिए इस स्थिति से निपटा जाना जरूरी है। आयात किया गया सूरजमुखी जब 100 रुपये लीटर के भाव उपलब्ध हो और देशी सूरजमुखी तेल का भाव एमएसपी के हिसाब से लगभग 150 रुपये लीटर बैठता हो तो देश में सूरजमुखी उत्पादन कैसे बढ़ेगा?

सूत्रों ने कहा कि सस्ते आयातित तेलों के दबाव के आगे देशी तेल-तिलहनों के दाम भारी दबाव में आ गये जिस वजह से समीक्षाधीन सप्ताह में सरसों एवं मूंगफली तेल-तिलहन और बिनौला तेल कीमतों में गिरावट आई। जनवरी और उससे पहले के दो महीनों में खाद्य तेलों के आयात की मात्रा लगभग 49 लाख टन होने की संभावना है जबकि पिछले वर्ष की समान अवधि में इनका आयात 35-36 लाख टन का हुआ था। सूरजमुखी और सोयाबीन तेल के आयात में जोरदार वृद्धि की वजह समीक्षाधीन सप्ताह में सोयाबीन तेल कीमतों में गिरावट आई। गिरावट के आम रुख को देखते हुए समीक्षाधीन सप्ताह में बिनौला तेल कीमतों में भी गिरावट आई।

सूत्रों ने कहा कि जो देश अपनी खाद्य तेलों की आवश्यकता को पूरा करने के लिए आयात पर 60 प्रतिशत निर्भर हो वहां के तेल-तिलहन उद्योग नुकसान में चलें इससे बुरी स्थिति क्या हो सकती है। देश के तेल-तिलहन उद्योग के लिए सबसे बड़़ी बाधा अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) की व्यवस्था में है जिसकी वजह से वैश्विक तेल कीमतों में आई गिरावट के लाभ से उपभोक्ता वंचित हो रहे हैं। इन खुदरा बिक्री करने वाली तेल कंपनियों द्वारा एमआरपी लगभग 40-100 रुपये या इससे भी अधिक रखे जाने के कारण ग्राहकों को तेल कीमतों में आई गिरावट का लाभ नहीं मिल रहा है।

सूत्रों ने कहा कि बंदरगाह पर जब शुल्कमुक्त आयात कोटा वाले सोयाबीन और सूरजमुखी तेल लगभग एक ही भाव लगभग 100 रुपये लीटर बैठता है तो फिर खुदरा बाजार में बिक्री के लिए उपलब्ध इन दोनों तेलों के बीच 35-40 रुपये प्रति लीटर का अंतर क्यों है?

सूत्रों ने कहा कि हल्के तेलों (सूरजमुखी और सोयाबीन) पर आयात शुल्क इतना अधिक कर दिया जाना चाहिये ताकि देशी तेल-तिलहन बाजार में खप सकें। तेल- तिलहनों के खपने से देश में खल और डीआयल्ड केक (डीओसी) की भी उपलब्धता बढ़ेगी जिसके महंगा होने से दूध, दुग्ध उत्पाद और अंडों के दाम महंगे होते हैं और जो खुदरा मुद्रास्फीति पर असर डालते हैं।

सूत्रों ने बताया कि पिछले सप्ताहांत के मुकाबले बीते सप्ताह सरसों दाने का भाव 230 रुपये की गिरावट के साथ 6,290-6,340 रुपये प्रति क्विंटल पर बंद हुआ। सरसों दादरी तेल भी समीक्षाधीन सप्ताहांत में 100 रुपये की हानि के साथ 12,900 रुपये प्रति क्विंटल पर बंद हुआ। वहीं सरसों पक्की घानी और कच्ची घानी तेल की कीमतें भी क्रमश: 15-15 रुपये घटकर क्रमश: 2,060-2,090 रुपये और 2,020-2,145 रुपये टिन (15 किलो) पर बंद हुईं।

किसानों द्वारा सस्ते में बिकवाली नहीं करने से समीक्षाधीन सप्ताह में सोयाबीन दाने का भाव मामूली पांच रुपये सुधरकर 5,505-5,585 रुपये प्रति क्विंटल पर बंद हुआ जबकि सोयाबीन लूज का थोक भाव पांच रुपये के सुधार के साथ 5,245-5,265 रुपये प्रति क्विंटल पर बंद हुआ।

वहीं दूसरी ओर जनवरी में खाद्य तेलों के भारी आयात के कारण समीक्षाधीन सप्ताहांत में सोयाबीन दिल्ली, सोयाबीन इंदौर और सोयाबीन डीगम तेल के दाम में गिरावट देखने को मिली और इन तेलों के भाव क्रमश: 250 रुपये, 250 रुपये और 400 रुपये की गिरावट के साथ क्रमश: 12,650 रुपये, 12,450 रुपये और 10,700 रुपये प्रति क्विंटल पर बंद हुए।

गिरावट के आम रुख के अनुरूप समीक्षाधीन सप्ताह में मूंगफली तेल-तिलहनों कीमतों में भी गिरावट आई। सप्ताहांत में मूंगफली तिलहन का भाव 50 रुपये घटकर 6,480-6,540 रुपये प्रति क्विंटल पर बंद हुआ। पूर्व सप्ताहांत के बंद भाव के मुकाबले समीक्षाधीन सप्ताह में मूंगफली तेल गुजरात 40 रुपये घटकर 15,460 रुपये प्रति क्विंटल पर बंद हुआ जबकि मूंगफली साल्वेंट रिफाइंड का भाव 10 रुपये घटकर 2,435-2,700 रुपये प्रति टिन पर बंद हुआ।

समीक्षाधीन सप्ताह में कच्चे पाम तेल (सीपीओ) में सुधार दिखा और इसका भाव 20 रुपये के मामूली सुधार के साथ 8,350 रुपये प्रति क्विंटल पर बंद हुआ। जबकि पामोलीन दिल्ली 9,900 रुपये प्रति क्विंटल पर अपरिवर्तित रहा। पामोलीन कांडला तेल का भाव 60 रुपये सुधरकर 9,000 रुपये प्रति क्विंटल पर बंद हुआ।

गिरावट के आम रुख को देखते हुए बिनौला तेल का भाव 450 रुपये की हानि दर्शाता 10,950 रुपये क्विंटल पर बंद हुआ।

भाषा राजेश

अजय

अजय

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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