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Sunday, 8 March, 2026
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बुनियादी ढांचा क्षेत्र में तेजी से मिट रहा वर्ग-भेद, कुशल श्रमिक अब विमान से जा रहे काम पर

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(लक्ष्मी देवी एरे)

बेंगलुरु, नौ जनवरी (भाषा) उत्तर प्रदेश के रायबरेली के 19 वर्षीय निर्माण श्रमिक लव कुश अपने कार्यस्थल पर पहुंचने के लिए दिल्ली से बेंगलुरु जाने वाले विमान में अपने स्मार्टफोन के साथ व्यस्त दिखे। यह उनके जीवन की दूसरी हवाई यात्रा थी।

आमतौर पर ट्रेन या सड़क मार्ग से यात्रा करने वाले कुश की कहानी भारत की अर्थव्यवस्था में आ रहे बदलाव का प्रतीक है। यहां विशेष ‘ब्लू-कॉलर’ (शारीरिक श्रम से जुड़े कार्य) कौशल की मांग इतनी अधिक हो गई है कि कंपनियां अब श्रमिकों को देश के एक कोने से दूसरे कोने तक विमान से भेज रही हैं। यह बदलाव पारंपरिक वर्गीय सीमाओं को मिटा रहा है।

कक्षा आठ के बाद पढ़ाई छोड़ देने वाले एक किसान के बेटे कुश पिछले एक साल से ‘एकेजी शटरिंग’ के साथ काम कर रहे हैं और प्रति माह 15,000 रुपये कमाते हैं। शटरिंग (छत की ढलाई से पहले तैयार अस्थायी ढांचा) के काम में उनके विशेष कौशल ने उन्हें इतना मूल्यवान बना दिया है कि उनके नियोक्ता उन्हें देश भर के विभिन्न स्थलों पर तैनात करने के लिए हवाई टिकट एवं आवास का खर्च भी वहन करते हैं।

यह रुझान अर्थव्यवस्था में हो रहे व्यापक बदलावों को दर्शाता है, जहां अवसंरचना पर खर्च और तेजी से होते शहरीकरण ने कुशल श्रमिकों की भारी कमी उत्पन्न कर दी है। निर्माण श्रमिक, जो कभी खचाखच भरे ट्रेन के डिब्बों में यात्रा करते थे, अब हाथ में स्मार्टफोन लिए विमानों में कार्यालय जाने वाले कर्मचारियों के साथ बैठते हैं।

कुश के साथ उनके नौ सहकर्मी भी थे, जो सभी पहली बार हवाई यात्रा कर रहे थे। वे एक परियोजना स्थल पर जा रहे थे, जहां वे साढ़े तीन महीने तक काम करेंगे। ‘पीटीआई-भाषा’ की पत्रकार बेंगलुरु जाने वाली इस उड़ान में कुश के साथ वाली सीट पर ही बैठी थीं।

इन श्रमिकों का आत्मविश्वास स्पष्ट था, लेकिन हवाई यात्रा के नियमों और शिष्टाचार से उनकी अनभिज्ञता भी झलक रही थी।

पश्चिम बंगाल के दक्षिण दिनाजपुर जिले के एक किसान के पुत्र अशोक दीप शर्मा ने कहा, ”पहले हम रेलगाड़ी से यात्रा करते थे। यह मेरी पहली हवाई यात्रा है। विमान से यात्रा करना एक शानदार अहसास है।”

यह साफ पता चल रहा था कि ये श्रमिक हवाई यात्रा को लेकर पूरी तरह सहज नहीं थे। जब एक विमान परिचारिका ने उनसे जलपान के लिए पूछा, तो एक श्रमिक इतनी धीरे बोला कि वह सुन नहीं पाई। एक अन्य श्रमिक ने ‘कॉम्प्लीमेंट्री’ भोजन यह सोचकर लेने से मना कर दिया कि इसके लिए पैसे देने होंगे। परिचारिका ने धीरे से हिंदी में समझाया, ”सर, आपको भुगतान नहीं करना है। यह मुफ्त है।”

यह बदलाव केवल व्यक्तिगत कहानियों तक सीमित नहीं है। उद्योग के विशेषज्ञों का कहना है कि श्रमिकों को विमान से यात्रा करना दो बातों को रेखांकित करता है… कुशल श्रम की कमी और धीमी रेल यात्रा के कारण काम के घंटों का नुकसान जो हवाई टिकट की तुलना में अधिक महंगा पड़ता है।

विमान से उतरने के बाद श्रमिकों ने कार्यस्थल की ओर बढ़ने से पहले विमान के सामने अपनी तस्वीरें लीं। यह भारत के बदलते आर्थिक परिदृश्य का एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण क्षण था, जहां श्रम बल को भी वैसे ही लाभ मिल रहे हैं, जो कभी कार्यालय में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए आरक्षित थे।

भाषा पाण्डेय निहारिका रमण

रमण

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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