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Friday, 1 March, 2024
होमदेशअर्थजगतजो काम नोटबंदी नहीं कर पायी वह कोविड ने कर दिया! बढ़ रहा 'डिजिटल इंडिया' और 'कैशलेस इकॉनमी' का ट्रेंड

जो काम नोटबंदी नहीं कर पायी वह कोविड ने कर दिया! बढ़ रहा ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘कैशलेस इकॉनमी’ का ट्रेंड

डेटा दर्शाता है कि लॉकडाउन हटने के बाद एटीएम से कैश निकासी तो काफी हद तक समान रही है, लेकिन यूपीआई का इस्तेमाल तेजी से बढ़ना व्यवहारगत बदलावों का संकेत देता है. यही नहीं करेंसी का सर्कुलेशन भी काफी बढ़ा है.

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नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मानें तो नोटबंदी लागू करने का एक कारण यह भी था कि सरकार भारतीय अर्थव्यवस्था को ‘लेस कैश’ पर आधारित बनाना चाहती थी. हालांकि, नोटबंदी अपने इस लक्ष्य में पूरी तरह सफल नहीं हो पाई. लेकिन अब ऐसा लगता है कि नोटबंदी के कारण जो नहीं हो पाया था, उसे कोविड-19 के कारण उपजी परिस्थितियों ने कर दिखाया है.

माना जा रहा है कि वायरस को लेकर लोगों के मन में बैठे डर और इसी कारण व्यवहार में आए बदलाव का ही नतीजा है कि अक्टूबर 2020 में देशव्यापी लॉकडाउन पूरी तरह हटने के बाद पिछले दो सालों से एटीएम से निकाली जाने वाली राशि लगभग समान, 2.6 लाख करोड़ रुपये, बनी हुई है.

इसके विपरीत, नोटबंदी के बाद की स्थिति पर नजर डालें तो पता चलता है कि कुछ ही समय में एटीएम से कैश निकासी ने गति पकड़ ली थी और एक साल के भीतर ही नोटबंदी से पूर्व की स्थिति में पहुंच गई थी. और फिर लॉकडाउन होने तक ढाई सालों में यह आंकड़ा उससे भी ऊपर पहुंच गया था.

वहीं, यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) पर लेन-देन नोटबंदी और लॉकडाउन के बीच की अवधि में मजबूती से बढ़ता रहा, लेकिन यह स्थिति कोविड-19 के दौरान ही आई जब यूपीआई भुगतानों ने पूर्व की हर वृद्धि को बहुत पीछे छोड़ दिया.

दूसरे शब्दों में कहें तो, यद्यपि नोटबंदी और उसके बाद लिए गए नीतिगत फैसलों के जरिये नगदी का इस्तेमाल घटाने और ज्यादा से ज्यादा डिजिटल लेन-देन अपनाने के प्रयास किए गए लेकिन इसका वास्तविक असर तभी नजर आया जब देश महामारी की चपेट में आया.

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बैंक ऑफ बड़ौदा के चीफ इकोनॉमिस्ट मदन सबनवीस ने दिप्रिंट को बताया, ‘ये दोनों ही ट्रेंड साफ नजर आ रहे हैं, कि एटीएम से कैश निकासी घट रही है और यूपीआई पेमेंट जोर पकड़ रहा है. कहा जा सकता है कि सरकार ने नोटबंदी और उसके बाद जो अन्य प्रयास किए थे, वो महामारी के बाद ही सही मायने में आगे बढ़ पाए हैं.’

अर्थशास्त्री ऋषि शाह का कहना है, ‘पिछले कुछ सालों में लोगों के व्यवहार में उल्लेखनीय बदलाव दिखा है क्योंकि वे भुगतान के डिजिटल साधनों के इस्तेमाल को लेकर सहज हो गए हैं. इस दिशा में पहल की सफलता का नतीजा है कि तमाम छोटी-बड़ी पेमेंट ऐप इस्तेमाल में आने लगी हैं और विक्रेता भी उन्हें बेझिझक स्वीकार रहे हैं.’


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Graphic: Manisha Yadav | ThePrint
ग्राफिक: मनीषा यादव | दिप्रिंट

भारतीय स्टेट बैंक की रिसर्च टीम ने गुरुवार को प्रचलन में नगदी और डिजिटल बैंकिंग की बदलती स्थिति पर एक रिपोर्ट जारी की जिसमें माना गया है कि डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा देने में महामारी का काफी असर रहा है.

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘प्रौद्योगिकी क्षेत्र में इनोवेशन ने भारतीय भुगतान प्रणाली को एकदम बदलकर रख दिया है.’

इसमें बताया गया है कि पिछले कुछ सालों में भारत की नगदी-आधारित अर्थव्यवस्था स्मार्टफोन-आधारित भुगतान अर्थव्यवस्था में बदल गई है.

रिपोर्ट कहती है, ‘कोविड-19 महामारी ने रोजमर्रा की जरूरतों के लिए किए जाने वाले भुगतान के लिए कांटैक्टलेस डिजिटल लेन-देन को अपनाने के लिए प्रेरित किया, क्योंकि लोग खुद को वायरस की चपेट में आने से बचाना चाहते थे. देश में डिजिटल भुगतान की बढ़ती स्वीकार्यता के साथ ही नगदी पर अधिक निर्भरता धीरे-धीरे कम होती जा रही है.’

कैश सर्कुलेशन का क्या मतलब है?

हालांकि, एटीएम से निकाली जा रही राशि और सर्कुलेशन में होने वाली मुद्रा के बीच अंतर है. करेंसी के सर्कुलेशन का आशय उस सारी नगदी से है जो आरबीआई ने मुद्रित की है, उसे छोड़कर जो उसने वापसी ले ली है. इसलिए बैंकों में नगदी भी सर्कुलेशन वाली करेंसी में आती है.

सकल घरेलू उत्पाद के प्रतिशत के तौर पर प्रचलन वाली मुद्रा पिछले पांच वर्षों में बढ़ी है. हालांकि, 2021-22 का नवीनतम डेटा इसमें गिरावट को दर्शाता है, उस वर्ष का स्तर अभी भी 14 वर्षों में दूसरा सबसे उच्च स्तर है.

Graphic: Manisha Yadav | ThePrint
ग्राफिक: मनीषा यादव | दिप्रिंट

एसबीआई रिसर्च ने अपनी रिपोर्ट में सर्कुलेशन में होने वाली करेंसी का जिक्र किया है. हालांकि, इसमें बताया गया है कि जीडीपी के लिहाज से तो प्रचलन में मुद्रा बढ़ रही है, लेकिन वार्षिक आधार पर ग्रोथ रेट पहले की तुलना में काफी कम है.

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘यूपीआई और ई-वॉलेट के माध्यम से डिजिटल लेनदेन बढ़ रहा है, और नगदी की मांग घट रही है. अगर हम सीआईसी (करेंसी इन सर्कुलेशन) संबंधी आंकड़ें देखें, तो यद्यपि अर्थव्यवस्था के साथ मुद्रा का सर्कुलेशन बढ़ रहा है, लेकिन इसका ट्रेंड घट रहा है…खासकर करेंसी के सब्सीट्यूट के तौर पर बदलाव दिख रहा है और इसका अधिकांश हिस्सा भुगतान के डिजिटल मोड पर केंद्रित हो गया है.’

हालांकि, सबनवीस कहते हैं कि एटीएम से नगद निकासी में स्थिरता और यूपीआई भुगतान बढ़ना व्यवहार में एक अलग ही तरह के बदलाव का संकेत हो सकता है.

हो सकता है कि महामारी के मद्देनजर लोग एहतियातन बड़ी मात्रा में नगदी निकाल रहे हों, लेकिन छोटे-मोटे लेनदेन यूपीआई पर कर रहे हों.

उन्होंने कहा, ‘यहां ध्यान देने वाली एक अहम बात यह है कि सर्कुलेशन में होने वाली नगदी बढ़ रही है, जबकि एटीएम से निकाली गई राशि में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है. हो सकता है कि लोग सीधे बैंकों से कैश निकाल रहे हों और एटीएम की निर्धारित सीमा से अधिक राशि निकाल रहे हों. यह कहना अधिक सटीक होगा कि महामारी ने एक बड़े व्यवहारगत बदलाव को बढ़ावा दिया है—खासकर युवा आबादी के बीच, जो एटीएम से दूरी बना रहे हैं और यूपीआई को तेजी से अपना रहे हैं.

यूपीआई पर सरकार का जोर

यह कहना गलत नहीं होगा कि डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा देने और यूपीआई जैसे प्लेटफॉर्म तैयार करने के लिए सरकार की तरफ से उठाए गए कदम डिजिटल भुगतान के प्रति व्यवहारिक बदलाव लाने में तभी ज्यादा सफल हो पाए जब महामारी ने लोगों को इसके लिए प्रेरित किया. इस बात का जिक्र एसबीआई की रिपोर्ट भी किया गया है.

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘डिजिटल जर्नी की सफलता का एक प्रमुख कारण यह भी है कि अर्थव्यवस्था को फॉर्मल और डिजिटल बनाने की दिशा में सरकार लगातार गंभीर प्रयास करती रही है. यही नहीं, यूपीआई, वॉलेट और पीपीआई जैसे इंटरऑपरेबल पेमेंट सिस्टम ने डिजिटली मनी ट्रांसफर के सरल और सस्ते तरीके मुहैया कराए गए हैं, यहां तक कि वे लोग भी इस सुविधा का फायदा उठा सकते हैं जिनके बैंक खाते नहीं हैं. पिछले कुछ सालों में क्यूआर कोड, एनएफसी आदि जैसे इनोवेशन इस सिस्टम के तेजी से विस्तार में मददगार बने हैं, और बड़ी टेक कंपनियां भी तेजी से इस क्षेत्र में आ रही हैं.’

शाह ने आगे कहा, ‘महामारी वास्तव में एक व्यवहारगत बदलाव की वजह बनी है और उसे सरकार की तरफ से बनाए गए सेफ और सिक्योर पेमेंट इंफ्रास्ट्रकचर का पूरी सहारा मिला है.’

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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