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Saturday, 11 April, 2026
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न्यायिक अधिकारी के आदेश की अवहेलना अक्षम्य : इलाहाबाद उच्च न्यायालय

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प्रयागराज, दो मार्च (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि एक न्यायिक अधिकारी अपने न्यायिक कार्य करते हुए जिला मजिस्ट्रेट या जिला पुलिस प्रमुख और यहां तक कि एक राज्य के राजनीतिक मुखिया से भी ऊपर होता है और उसके आदेश की अवहेलना अक्षम्य है।

अदालत ने कहा कि एक न्यायिक अधिकारी द्वारा दिए गए आदेशों की अवहेलना महज अदालत की अवमानना नहीं है, बल्कि कानून के अधिकार को सीधी चुनौती है।

न्यायमूर्ति अरुण कुमार देशवाल ने 19 फरवरी को दिए अपने निर्णय में ललितपुर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेशों को नजरअंदाज करने के लिए दोषी पुलिस अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाई।

अदालत ने उस दिन मुकदमे की सुनवाई तक थाना प्रभारी (एसएचओ) और जांच अधिकारी को अदालत कक्ष में खड़े रहने की सजा दी।

तथ्यों के मुताबिक, सानू उर्फ राशिद नाम के एक व्यक्ति द्वारा जमानत याचिका दायर की गई थी। धोखाधड़ी के एक मामले में आरोपी सानू को औपचारिक रूप से गिरफ्तार किए बगैर 14 सितंबर, 2025 को कथित तौर पर हिरासत में लिया गया था।

सोलह सितंबर को उसकी बहन ने ललितपुर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन कर दावा किया कि पुलिस ने उसके भाई को हिरासत में लिया था, लेकिन गिरफ्तारी नहीं दिखाई गई। उसने उसी दिन अग्रिम जमानत की एक याचिका भी दायर की।

जिला शासकीय अधिवक्ता (फौजदारी) ने अदालत को बताया कि सानू को 17 सितंबर की सुबह गिरफ्तार किया गया जिस पर अग्रिम जमानत की याचिका खारिज कर दी गई।

हालांकि, हिरासत में लिए जाने को गंभीरता से लेते हुए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 22 सितंबर, 30 सितंबर और तीन नवंबर को सख्त आदेश पारित करते हुए संबंधित एसएचओ और जांच अधिकारी को कथित अवैध हिरासत की तिथियों का सीसीटीवी फुटेज पेश करने का निर्देश दिया। संबंधित थाने द्वारा सीसीटीवी फुटेज पेश नहीं किया गया।

सीजेएम ने स्पष्टीकरण मांगा कि क्यों एक महिला सह आरोपी राशिदा को सुबह चार बजे गिरफ्तार किया गया, जबकि सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पूर्व एक महिला को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता।

सीजेएम ने अपने आदेशों में इन पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की चेतावनी भी दी। इन आदेशों के बावजूद, पुलिस अधिकारियों ने ना तो रिपोर्ट सौंपी और ना ही सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध कराए।

अंततः यह मामला चार फरवरी, 2026 को जब उच्च न्यायालय के समक्ष आया तो अदालत ने संबंधित जांच अधिकारी और एसएचओ को तलब किया। दोनों अधिकारी 18 फरवरी को पेश हुए और बिना शर्त माफी मांगी। उन्होंने दावा किया कि सीसीटीवी स्टोरेज क्षमता केवल 10 टेराबाइट की है और दो माह बाद फुटेज स्वतः ही मिट जाता है।

न्यायमूर्ति देशवाल ने हालांकि, यह स्पष्टीकरण स्वीकार नहीं किया और पाया कि एसएचओ और जांच अधिकारी ने जानबूझकर सीजेएम के आदेशों का अनुपालन नहीं किया। अदालत ने कहा कि वह न्यायिक आदेशों की अवहेलना पर अपनी आंखें बंद नहीं कर सकती।

उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि प्रदेश के विभिन्न थानों के सीसीटीवी कैमरों का उचित ढंग से काम नहीं करना एक नियमित चलन हो गया है जोकि लोगों की निजी स्वतंत्रता को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है।

अदालत ने जोर दिया कि न्यायाधीशों की तुलना प्रशासनिक और कार्यकारी अधिकारियों से नहीं की जा सकती, और उनकी तुलना सचिवालय के कर्मचारियों या प्रशासनिक कार्यकारियों से भी नहीं की जा सकती जो महज राजनीतिक कार्यकारियों के निर्णयों को लागू करते हैं।

अदालत ने कहा कि चूंकि जिला न्यायिक अधिकारी, राहत की मांग कर रहे एक आम आदमी के लिए रक्षा की पहली रेखा है, ऐसे में वह न्यायपालिका की रीढ़ हैं। इसलिए अदालतों की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 10 के तहत प्रदत्त अधिकारों का उपयोग करते हुए उच्च न्यायालय ने जांच अधिकारी और एसएचओ को अवमानना का दोषी पाया।

हालांकि, दंड की मात्रा पर नरम रुख अपनाते हुए अदालत ने उन्हें शाम चार बजे तक अदालत के उठने तक अदालत कक्ष में हिरासत में रहने की सजा सुनाई। साथ ही राज्य सरकार को याचिकाकर्ता को एक लाख रुपये हर्जाना देने का निर्देश दिया और साथ ही यह छूट दी कि राज्य सरकार चाहे तो इस रकम की वसूली जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों के वेतन से कर सकती है।

उच्च न्यायालय ने सभी जिलों के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या संबंधित मजिस्ट्रेट को अपने क्षेत्र के पुलिस थानों का निरीक्षण कर सीसीटीवी कैमरों की जांच करने का भी निर्देश दिया।

भाषा सं राजेंद्र

शफीक

शफीक

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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