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Friday, 17 April, 2026
होमदेशसंरक्षित क्षेत्रों में वन्यजीवों के आवास को नष्ट करना दंड का कारण बनेगा: न्यायालय

संरक्षित क्षेत्रों में वन्यजीवों के आवास को नष्ट करना दंड का कारण बनेगा: न्यायालय

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नयी दिल्ली, 20 मार्च (भाषा) राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में अंधाधुंध अवैध रेत खनन के कारण जलीय जीवों के आवास नष्ट होने का संज्ञान लेते हुए उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि संरक्षित क्षेत्र में इस तरह का काम वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम सहित विभिन्न कानूनों के तहत अपराध और दंड के दायरे में आएगा।

न्यायमूर्ति विक्रमनाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश राज्यों के संबंधित विभागों के अधिकारियों को इस बारे में ‘‘अप्रत्यक्ष रूप से उत्तरदायी’’ ठहराया जाएगा कि उन्होंने अवैध रेत खनन जारी रखने की अनुमति देकर बहुमूल्य पर्यावास के विनाश में सहायता की।

राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य को राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल वन्यजीव अभयारण्य भी कहा जाता है। यह 5,400 वर्ग किलोमीटर में फैला त्रिराज्य संरक्षित क्षेत्र है। लुप्तप्राय घड़ियाल (लंबे थूथन वाले मगरमच्छ) के अलावा, यह लाल मुकुट वाले कछुए और लुप्तप्राय गंगा नदी डॉल्फिन का आवास है।

राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश के त्रिकोणीय बिंदु के पास चंबल नदी पर स्थित इस अभयारण्य को पहली बार 1978 में मध्यप्रदेश में संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया था और अब यह तीनों राज्यों द्वारा संयुक्त रूप से प्रशासित एक लंबा एवं संकरा पारिस्थितिकी आरक्षित क्षेत्र है।

न्यायालय राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में अवैध रेत खनन और लुप्तप्राय जलीय वन्यजीवों के लिए खतरा शीर्षक वाले स्वतः संज्ञान मामले की सुनवाई कर रहा था।

पीठ ने राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश और अन्य को नोटिस जारी कर इस मामले में उनसे जवाब मांगा है।

इसने कहा कि संरक्षित प्रजाति घड़ियाल के आवासों को नष्ट करने वाले अवैध रेत खनन से संबंधित कुछ खबरों के आधार पर स्वतः संज्ञान लेते हुए रिट याचिका दर्ज की गई थी।

पीठ ने कहा कि विभिन्न राज्य सरकारों और उनके विभागों से प्रतिक्रिया प्राप्त होने के बाद इन पहलुओं पर विस्तृत विचार किया जाएगा।

पीठ ने कहा, ‘‘फिलहाल, हम यह कह सकते हैं कि किसी संरक्षित क्षेत्र में वन्यजीवों के आवास को नष्ट करने का प्रत्येक कृत्य वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, वन (संरक्षण) अधिनियम, जैव विविधता अधिनियम और भारतीय वन अधिनियम के साथ-साथ अन्य कानूनों के तहत अपराध माना जाएगा।

इसने कहा कि राज्य सरकारों और विभागों से जवाब मिलने के बाद पीठ उचित और विस्तृत निर्देश जारी करेगी।

पीठ ने कहा, ‘‘रजिस्ट्री को निर्देश दिया जाता है कि वह राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश राज्यों को उनके प्रधान सचिवों के माध्यम से तथा पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को उसके सचिव के माध्यम से पक्षकार बनाकर नोटिस जारी करे।’’

इसने कहा कि इस कार्यवाही का नोटिस केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) को भी जारी किया जाना चाहिए।

उच्चतम न्यायालय ने दो अधिवक्ताओं को अदालत मित्र के रूप में नियुक्त किया और मामले की सुनवाई दो अप्रैल के लिए निर्धारित कर दी।

गत तेरह मार्च को न्यायालय ने राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में अवैध रेत खनन और लुप्तप्राय जलीय वन्यजीवों के लिए खतरे का स्वतः संज्ञान लिया था।

भाषा नेत्रपाल अविनाश

अविनाश

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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