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Monday, 23 March, 2026
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प. बंगाल में एसआईआर को बाधित करने के जानबूझकर प्रयास किये जा रहे: आयोग ने न्यायालय से कहा

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नयी दिल्ली, नौ फरवरी (भाषा) निर्वाचन आयोग ने उच्चतम न्यायालय को बताया है कि पश्चिम बंगाल में उसके विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को बाधित और विफल करने के लिए जानबूझकर और सुनियोजित प्रयास किए जा रहे हैं।

निर्वाचन आयोग ने अपने अतिरिक्त हलफनामे में राज्य सरकार, सत्ताधारी पार्टी के कुछ निर्वाचित प्रतिनिधियों और अन्य पार्टी पदाधिकारियों की मिलीभगत का आरोप लगाया है, जिन्होंने किसी भी माध्यम से- चाहे वैध हो या अवैध — एसआईआर को रोकने के लिए सही तरह से योजना बनायी और कार्य किया।

इस बीच, उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि वह किसी को भी इस प्रक्रिया में बाधा डालने नहीं देगा।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजरिया की पीठ ने निर्वाचन आयोग द्वारा दाखिल हलफनामे को ध्यान में रखते हुए कहा कि वह इस मामले में आवश्यक सभी आदेश या स्पष्टीकरण जारी करेगा।

हलफनामे में कहा गया है कि एसआईआर को बाधित करना “गंभीर संवैधानिक चिंता” का मामला है।

हलफनामे में कहा गया है, “दाखिल किए गए साक्ष्यों से पता चलता है कि पश्चिम बंगाल में निर्वाचन आयोग द्वारा किए जा रहे एसआईआर कार्य को योजना और समन्वित कार्रवाई के माध्यम से बाधित और विफल करने के लिए जानबूझकर और व्यवस्थित प्रयास किए जा रहे हैं।”

इसमें कहा गया है, ‘‘इन कार्रवाइयों से राज्य के प्रमुख कर्ताओं की मिलीभगत उजागर होती है, जिसमें राज्य सरकार, सत्ताधारी पार्टी के कुछ निर्वाचित प्रतिनिधि और पार्टी पदाधिकारी शामिल हैं। हर संभव चाल का इस्तेमाल किया जा रहा है ताकि एसआईआर प्रक्रिया को किसी भी तरह — चाहे वैध हो या अवैध — रोका या विफल किया जा सके।’’

इसमें में कहा गया है कि उच्चतम न्यायालय को आश्वासन देने के बावजूद लगातार गैर-सहयोग, बाधा, डराने-धमकाने और हस्तक्षेप की घटनाएं हुई हैं।

हलफनामे में यह भी कहा गया कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और अन्य ने चुनाव अधिकारियों को धमकाने के उद्देश्य से सार्वजनिक बयान दिए तथा धमकियां देने, हिंसा और जबरन व्यवधान की कई ऐसी घटनाएं हुई हैं, जैसे आधिकारिक कागजात को नष्ट किया जाना, मतदाता फॉर्म जलाना और कार्यालयों में जबरन प्रवेश करना शामिल है।

हलफनामे में कहा गया कि गृह मंत्रालय द्वारा खतरे का आकलन करने के बाद, पश्चिम बंगाल के मुख्य चुनाव अधिकारी को ‘वाई’ श्रेणी की सुरक्षा प्रदान की गई और वह एकमात्र चुनाव अधिकारी हैं जिन्हें ऐसी सुरक्षा मिली है।

हलफनामे में कहा गया है कि राज्य सरकार ने निर्वाचन आयोग के निर्देशों की “खुली अवहेलना” की है, जिसमें उन लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज ना करना शामिल है जिन्होंने चुनाव अधिकारियों पर हमला किया या उनके काम में बाधा डाली। इसमें कहा गया है कि कुछ राज्य अधिकारियों का स्थानांतरण या निलंबन ना करना और आवश्यक पद के अधिकारियों की तैनाती के निर्देशों का पालन न करना भी इसमें शामिल है।

हलफनामे के अनुसार, योग्य अधिकारियों की तैनाती नहीं की गई ताकि प्रक्रिया योग्य कर्मचारियों की कमी के कारण असफल हो जाए।

हलफनामे में कहा गया, “जब प्रशासनिक बाधा विफल हुई, तो सत्ताधारी पार्टी के कार्यकर्ता और स्थानीय नेता, सत्ता में बैठे लोगों के कहने पर, चुनाव अधिकारियों के खिलाफ धमकियां देने, डराने-धमकाने और हिंसा का सहारा लेने लगे।’’ इसमें यह भी कहा कि राज्य प्रशासन ने ऐसे कृत्यों पर आंखें मूंद लीं, जिससे इस तरह के व्यवहार को हौसला मिला।

हलफनामे में कहा गया कि स्थिति तब और बिगड़ गई जब सत्ताधारी पार्टी के “सर्वोच्च स्तर के नेताओं” ने एसआईआर और निर्वाचन आयोग को लेकर उत्तेजक भाषण दिए।

हलफनामे में कहा गया, “जब सत्ताधारी पार्टी के निर्वाचित प्रतिनिधि और पार्टी पदाधिकारी सार्वजनिक रूप से चुनावी सूची के पुनरीक्षण में लगे अधिकारियों को नाम लेकर धमकाते हैं, तो निर्भीक, निष्पक्ष और तटस्थ पुनरीक्षण का माहौल असंभव हो जाता है।”

हलफनामे में यह भी कहा गया कि एसआईआर को बाधित करने की साजिश में क्षेत्रीय अधिकारियों के खिलाफ आर्थिक और व्यक्तिगत उत्पीड़न भी शामिल है, जिसमें बूथ स्तर के अधिकारियों (बीएलओ) को मिलने वाली भुगतान राशि रोकी गई और सूक्ष्म-निरीक्षकों को धमकाया गया।

हलफनामे में कहा गया, “ऐसा व्यवहार संवैधानिक प्रक्रिया को रोकने के लिए सरकारी, पदानुक्रमिक और राजनीतिक शक्ति के स्पष्ट दुरुपयोग को दर्शाता है।”

हलफनामे में बीडीओ कार्यालयों में तोड़फोड़, आगजनी, सड़क अवरोध, शारीरिक हमले, धमकियां और उत्तेजक भाषण जैसी घटनाओं की सूची भी दी गई।

हलफनामे के अनुसार, ऐसा व्यवहार “एसआईआर प्रक्रिया को पूरी तरह रोकने” और “पहले से ही गंभीर खामियों वाली चुनावी सूची को बनाए रखने” के उद्देश्य से किया गया।

हलफनामे में कहा गया, “ऐसा व्यवहार संवैधानिक प्रक्रिया को प्रभावित करने, निर्वाचन आयोग के अधिकार को कमजोर करने और इस अदालत (उच्चतम न्यायालय ) द्वारा जारी आदेशों की स्पष्ट और अपमानजनक अवहेलना करने के प्रयास के समान है।”

हलफनामे में उच्चतम न्यायालय से राज्य के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को यह निर्देश देने का अनुरोध किया गया कि वह यह सुनिश्चित करें कि निर्वाचन आयोग द्वारा अनुरोध की गई प्राथमिकी दर्ज की जाए। उसने साथ ही, सभी राजनीतिक और प्रशासनिक कार्यकारी अधिकारियों, जिनमें मुख्य सचिव और डीजीपी शामिल हैं, को निर्वाचन आयोग के निर्देशों को लागू करने और अनुपालन की रिपोर्ट देने का निर्देश देने का भी अनुरोध किया गया।

भाषा अमित रंजन

रंजन

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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