नई दिल्ली: प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने, 10 अक्टूबर को दिल्ली में लगाई गई पाबंदियों और जंतर-मंतर को तय प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने से जुड़े करीब 46 नए मामलों पर नोटिस जारी करते हुए, भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने गुरुवार को कहा, “कोई भी सुप्रीम कोर्ट पर दबाव नहीं बना सकता.”
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कथित तौर पर एकतरफा लिए गए फैसलों और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में ‘गड़बड़ियों’ के खिलाफ विपक्ष की याचिका पर सुनवाई करते हुए पीठ ने भारतीय चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया. इस पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची भी शामिल थे.
हालांकि, पीठ ने विपक्षी नेताओं-कांग्रेस के राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे, समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव और केरल कांग्रेस से भी जवाब मांगा. उनके खिलाफ एक याचिका में 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट परिसर के अंदर जुलूस निकालने के लिए अदालत की अवमानना की कार्रवाई करने की मांग की गई है. इसी दिन उन्होंने याचिका दायर की थी.
पीठ ने मौखिक रूप से कहा, “आपको अपने व्यवहार के बारे में भी सफाई देनी होगी. हम कोई ऐसी जगह नहीं रहते जहां बाहर की दुनिया से हमारा कोई संपर्क न हो. कोई भी न्यायपालिका पर दबाव नहीं बना सकता. ये बेकार की कोशिशें हैं और कोई भी इन पर ध्यान नहीं देता.”
ये टिप्पणियां तब की गईं, जब याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील गौरव भाटिया ने दलील दी कि राहुल गांधी और अन्य के खिलाफ अदालत की अवमानना की कार्रवाई की मांग करने वाले लोगों की याचिका के संबंध में सुप्रीम कोर्ट परिसर के अंदर एक राजनीतिक रैली की गई थी. उन्होंने कहा कि यह न्यायपालिका पर दबाव बनाने की कोशिश थी.
सुप्रीम कोर्ट ने जंतर-मंतर को तय प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को भी नोटिस जारी किया है. पीठ ने दिल्ली पुलिस से उन याचिकाओं पर भी जवाब देने को कहा, जिनमें भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 163 लागू किए जाने पर सवाल उठाए गए हैं. इस धारा के तहत कुछ तय इलाकों में पांच से ज्यादा लोगों के इकट्ठा होने पर रोक लगाई जाती है. 10 अक्टूबर को दिल्ली पुलिस ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के प्रदर्शन को रोकने के लिए इसी प्रावधान का इस्तेमाल किया था.
पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के दोनों बार एसोसिएशनों- सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन और सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन- से भी न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखने के लिए सुझाव देने को कहा है.
महिला पत्रकारों से कथित बदसलूकी
अदालत में सुनवाई के दौरान माहौल काफी गरम हो गया. 10 अक्टूबर को हिरासत में लिए गए और कथित तौर पर प्रताड़ित किए गए लोगों की ओर से पेश वकीलों और दूसरी तरफ दिल्ली पुलिस तथा प्रदर्शन के आयोजन के तरीके और 12 अक्टूबर को गांधी की रैली पर सवाल उठाने वाले लोगों के बीच आरोप-प्रत्यारोप हुए.
दोनों पक्षों के बीच बहस के दौरान वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने आरोप लगाया कि प्रदर्शन स्थल पर मौजूद महिला पत्रकारों के साथ पुलिसकर्मियों ने यौन उत्पीड़न किया. उन्होंने कहा कि महिला पत्रकारों को जिन परेशानियों का सामना करना पड़ता है, उन पर खास तौर पर ध्यान देने की जरूरत है. वे काम करने के अपने अधिकार का इस्तेमाल करते हुए अपनी जिम्मेदारियां निभाने के लिए फील्ड में जाती हैं.
उन्होंने उस महिला पत्रकार का उदाहरण दिया, जिसके खिलाफ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज की गई है. यह एफआईआर उस पुलिस अधिकारी की शिकायत पर दर्ज हुई, जिस पर महिला पत्रकार ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था. जयसिंह ने कहा कि महिला पत्रकारों को आपराधिक मुकदमे का सामना करने का खतरा है. उन्होंने कहा कि वह उन महिला पत्रकारों के नाम एक सीलबंद लिफाफे में देने को तैयार हैं, जिन्होंने आरोप लगाया है कि 10 अक्टूबर को ड्यूटी के दौरान पुलिस अधिकारियों ने उनके साथ बदसलूकी की.
उन्होंने मांग की कि अदालत एक समिति बनाए, जिसकी अध्यक्षता बेहतर होगा कि कोई महिला करे. यह समिति इस बारे में दिशा-निर्देश तय करे कि पुलिस और सरकार के दूसरे अधिकारियों को महिला पत्रकारों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए. उन्होंने कहा कि महिला पत्रकार एक ऐसा अलग वर्ग हैं, जिनकी जरूरतों पर खास ध्यान दिया जाना चाहिए.
जयसिंह ने पीठ से यह आदेश देने की भी अपील की कि पुलिस किसी भी महिला पत्रकार के खिलाफ नई एफआईआर दर्ज करने से बचे. उन्होंने कहा कि हर नागरिक को स्वतंत्र पत्रकार बनने का अधिकार है. उन्होंने दिल्ली पुलिस की इस सोच पर भी सवाल उठाया कि केवल प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी) से मान्यता प्राप्त पत्रकारों को ही फील्ड में जाने की अनुमति होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि जब तक किसी मीडियाकर्मी के पास उसके संस्थान की ओर से जारी पहचान पत्र है, तब तक उसे रिपोर्टिंग करने से नहीं रोका जाना चाहिए.
इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सफाई देते हुए कहा कि प्रदर्शन जैसी स्थिति में यह पहचानना मुश्किल होता है कि कौन ‘रील बनाने वाला’ है और कौन स्वतंत्र पत्रकार. उन्होंने कहा कि किसी भी महिला के साथ बुरा व्यवहार नहीं होना चाहिए और इसमें महिला पुलिसकर्मी भी शामिल हैं. उन्होंने महिला पत्रकारों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने पर पूरी तरह रोक लगाने और समिति बनाने की जयसिंह की मांग का विरोध किया. उन्होंने कहा कि अदालत को ऐसा कदम तभी उठाना चाहिए, जब वह इस नतीजे पर पहुंचे कि इस मामले में पर्याप्त काम नहीं किया जा रहा है.
भाटिया ने भी बीच में दखल दिया और दो महीने की गर्भवती महिला पत्रकार का मामला उठाया. महिला पत्रकार ने आरोप लगाया था कि 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट तक निकाले गए विरोध मार्च के दौरान राहुल गांधी ने उन्हें धक्का दिया था. भाटिया ने सुप्रीम कोर्ट से इस मामले पर ध्यान देने की अपील की और जयसिंह से भी उस पत्रकार का मामला उठाने को कहा. इस पर प्रदर्शनकारियों की ओर से पेश एक वकील ने कहा कि भाटिया इस मुद्दे को राजनीतिक रंग दे रहे हैं.
दिल्ली में पाबंदियां और जंतर-मंतर
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने मेहता से कहा कि वह जानना चाहती है कि लोगों के इकट्ठा होने पर रोक लगाने के लिए बीएनएसएस की धारा 163 लागू करने का आदेश कब और क्यों जारी किया गया और इसके लिए किस प्रक्रिया का पालन किया गया.
राष्ट्रीय राजधानी में जंतर-मंतर को तय प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने के फैसले पर भी पीठ के सामने सवाल उठाए गए. पीठ ने मेहता से इस फैसले के पीछे की वजह बताने को कहा. पीठ ने कहा, “हम जानना चाहते हैं कि क्या फैसला लेने से पहले सोच-विचार किया गया था या अदालत (सुप्रीम कोर्ट) की मौखिक टिप्पणियों के आधार पर ही आपने यह फैसला ले लिया.”
वरिष्ठ वकील मुक्ता गुप्ता और गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि सरकार यह कदम नहीं उठा सकती थी, खासकर तब जब इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का पहले का फैसला मौजूद है. 2018 में अदालत ने सरकार को जंतर-मंतर को तय प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने से रोक दिया था.
नौ अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा था कि जंतर-मंतर पर सीजेपी को प्रदर्शन की अनुमति देने में दिल्ली पुलिस की हिचकिचाहट की वजह इस जगह की भौगोलिक स्थिति हो सकती है.
मेहता ने इस बात से इनकार किया कि जंतर-मंतर को सूची से हटाने का फैसला अदालत की टिप्पणी के बाद लिया गया था. उन्होंने कहा कि इसके लिए एक समिति बनाई गई थी और उसकी विस्तृत रिपोर्ट मिलने के बाद ही जंतर-मंतर को तय प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने का आदेश जारी किया गया.
गुप्ता ने कहा कि हर नागरिक को प्रदर्शन करने का अधिकार है. उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 2018 के अपने फैसले में भी कहा था कि प्रदर्शन की जगह ऐसी होनी चाहिए, जहां प्रदर्शन करने वालों की बात सुनी जा सके. उन्होंने अदालत से कहा, “नई दिल्ली सिर्फ कुछ चुनिंदा लोगों के लिए नहीं है.”
अदालत ने दिल्ली पुलिस को 10 अक्टूबर की सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने का निर्देश भी दिया. इसमें सुप्रीम कोर्ट परिसर और उसके आसपास के इलाकों की फुटेज भी शामिल है. उन याचिकाओं पर भी जवाब मांगा गया, जिनमें आरोप लगाया गया है कि प्रदर्शन की रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों के इलेक्ट्रॉनिक उपकरण पुलिस ने जब्त कर लिए थे.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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