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Wednesday, 4 February, 2026
होमदेशजांच में विलंब व जागरूकता की कमी से फेफड़े और गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर का देर से पता चलता है:विशेषज्ञ

जांच में विलंब व जागरूकता की कमी से फेफड़े और गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर का देर से पता चलता है:विशेषज्ञ

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(सुदीप्तो चौधरी)

कोलकाता, चार फरवरी (भाषा) कोलकाता के प्रमुख अस्पतालों के कैंसर विशेषज्ञों ने विश्व कैंसर दिवस पर कहा कि जांच, उपचार और प्रौद्योगिकी में महत्वपूर्ण प्रगति के बावजूद, भारत में फेफड़े और गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर का पता अक्सर आखिरी चरण में चलता है, जिसका मुख्य कारण जागरूकता, जांच और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच की कमी है।

उन्होंने कहा कि बीमारी का देर से पता चलना केवल गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर तक ही सीमित नहीं है, बल्कि फेफड़ों के कैंसर का भी अक्सर आखिरी चरण में पता चलता है, यहां तक ​​कि धूम्रपान न करने वालों, महिलाओं और युवा भारतीयों में भी।

चार फरवरी को विश्व कैंसर दिवस मनाया जाता है जो कैंसर की रोकथाम, शीघ्र पता लगाने और उपचार को बढ़ावा देने के लिए अंतरराष्ट्रीय कैंसर नियंत्रण संघ के नेतृत्व में एक वैश्विक जागरूकता पहल है।

मणिपाल अस्पताल में स्त्रीरोग कर्करोग विज्ञान विभाग की प्रमुख और वरिष्ठ सलाहकार डॉ. अरुणावा रॉय ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि कम जागरूकता, सामाजिक कलंक, नियमित जांच की कमी और प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल स्तर पर देर से ‘रेफरल’ के कारण गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर का पता अब भी देर से चलता है।

उन्होंने नियमित देखभाल में कैंसर जांच (स्क्रीनिंग) को शामिल करने के महत्व पर जोर दिया।

रोकथाम योग्य होने के बावजूद गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर से होने वाली उच्च मृत्यु दर के बने रहने पर, रॉय ने टीकाकरण और सामाजिक बाधाओं की ओर इशारा किया।

उन्होंने कहा, “मुख्य कमियों में लोगों के बीच एचपीवी टीकाकरण का कम होना, जांच में कम भागीदारी और लगातार बने रहने वाला सामाजिक कलंक हैं। भ्रांतियां, भय और अपर्याप्त फॉलो-अप से इलाज में और देरी होती है।”

उन्होंने कहा कि समाधानों में “स्कूल-आधारित एचपीवी टीकाकरण, सामुदायिक स्तर के परीक्षण कार्यक्रम और सतत, सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील जागरूकता पहल” शामिल हैं।

‘एचपीवी वैक्सीन’ इंजेक्शनों की एक श्रृंखला है जो ‘ह्यूमन पैपिलोमावायरस (एचपीवी)’ से सुरक्षा प्रदान करती है। एचपीवी एक आम वायरस है जो 90 प्रतिशत से अधिक गर्भाशय ग्रीवा कैंसर और कई अन्य कैंसर का कारण बनता है।

डॉक्टरों का कहना है कि बीमारी के पहले लक्षणों से ही अक्सर इलाज में देरी शुरू हो जाती है।

कोलकाता स्थित अपोलो कैंसर सेंटर के मेडिकल कर्कविज्ञान विभाग के वरिष्ठ सलाहकार डॉ. संदीप गांगुली ने कहा कि इलाज में खामियों के बजाय लक्षणों की गलत व्याख्या के कारण ही मरीजों की बीमारी की देर से पहचान हो पाती है।

उन्होंने कहा, ‘‘जागरूकता की कमी के कारण ही फेफड़ों के कैंसर के मरीज आखिरी चरण में निदान के लिए आते हैं। लोग अक्सर इसे तपेदिक या सामान्य संक्रमण समझ लेते हैं, और चूंकि कई मरीज़ों को सीओपीडी (सांस संबंधी गहरी परेशानी) होता है, इसलिए वे इसे सीओपीडी के लक्षण मान लेते हैं।’’

उन्होंने कहा कि गर्भाशय ग्रीवा कैंसर का, विशेष रूप से निम्न सामाजिक-आर्थिक वर्ग में, इसी तरह अनदेखा किया जाता है।

उन्होंने कहा, “अत्यधिक स्राव या रक्तस्राव जैसे लक्षणों के बारे में जागरूकता की कमी भी है। लोग इन्हें सामान्य मानते हैं और अनदेखा कर देते हैं।”

गंगुली ने पर्यावरणीय कारकों पर भी प्रकाश डाला और बताया कि “डब्ल्यूएचओ के अनुसार फेफड़ों के कैंसर का सबसे महत्वपूर्ण कारण पर्यावरण में मौजूद तंबाकू का धुआं या पर्यावरण प्रदूषण है,” जिसमें अगरबत्ती जैसे आंतरिक संपर्क भी शामिल हैं।

सीके बिरला हॉस्पिटल्स, सीएमआरआई के ‘पल्मोनोलॉजिस्ट’ डॉ. श्याम कृष्णन ने कहा कि फेफड़े और गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर अक्सर शुरुआती चरणों में पता नहीं चल पाते हैं क्योंकि लक्षण अस्पष्ट होते हैं या उन्हें नजरअंदाज कर दिया जाता है।

भाषा

राजकुमार संतोष

संतोष

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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