नयी दिल्ली, तीन फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने समय पर न्याय सुनिश्चित करने की आवश्यकता रेखांकित करते हुए मंगलवार को कहा कि उच्च न्यायालयों द्वारा महीनों तक फैसलों को सार्वजनिक किए बिना सुरक्षित रखे जाने की प्रथा ‘एक चिह्नित बीमारी’ है, जिसे खत्म किया जाना चाहिए।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें कहा गया था कि झारखंड उच्च न्यायालय ने पिछले साल चार दिसंबर को एक याचिका खारिज करते हुए मौखिक रूप से फैसला सुनाया था और वह फैसला अब तक अपलोड नहीं किया गया है।
पीठ ने कहा कि अगले सप्ताह के आखिर तक वकील को पूरा फ़ैसला उपलब्ध कराया जाए।
देरी का ज़िक्र करते हुए, याचिकाकर्ता की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा, ‘‘ऐसा लगता है कि सिर्फ़ जुबानी जमा खर्च किया जा रहा है… कोई संदेश जाना चाहिए। यह कानून की गरिमा के साथ खिलवाड़ करने जैसा है।’’
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि मोटे तौर पर दो तरह के न्यायाधीश होते हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘एक मेहनती न्यायाधीश होते हैं, जो सबकी बात सुनते हैं और 10-15 मामलों में भी फैसला सुरक्षित रख लेते हैं। कुछ न्यायाधीश ऐसे होते हैं, जो इसके बाद फैसले नहीं सुनाते। हम किसी एक व्यक्ति की बात नहीं कर रहे हैं। यह न्यायपालिका के सामने एक चुनौती है और यह एक पहचानी हुई बीमारी है। इसका इलाज होना चाहिए और इसे खत्म किया जाना चाहिए और इसे फैलने नहीं दिया जा सकता।’’
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि एक और आम चलन है कि कुछ मामलों में दलीलें सुनी जाती हैं तथा फिर उन्हें आगे के निर्देशों के लिए सूचीबद्ध कर दिया जाता है।
उन्होंने कहा कि वह उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के साथ अपनी आगामी बैठक में यह मुद्दा उठाएंगे।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘हम अन्य मुद्दों के साथ इस पर भी चर्चा करेंगे। हम कोई ऐसा समाधान निकालने की कोशिश करेंगे, जिससे इस तरह के टाले जा सकने वाले मुकदमे खत्म हो जाएं।’’
उन्होंने कहा, ‘‘उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के तौर पर अपने 15 साल के करियर में मैंने कभी भी कोई फैसला सुरक्षित नहीं रखा और तीन महीने में फैसला नहीं सुनाया।’’
पीठ ने अपने आदेश में मामले के तथ्यों का ज़िक्र करते हुए कहा, ‘‘झारखंड उच्च न्यायालय ने 4 दिसंबर, 2025 को फैसला सुनाया था, जिसमें रिट याचिका खारिज कर दी गई थी। फैसला अभी तक अपलोड नहीं किया गया है। हमने उच्च न्यायालय की तरफ से पेश वकील को बताया है कि इस देरी का कोई कारण नहीं है। अगले हफ्ते के आखिर तक वकील को पूरा फैसला दे दिया जाए।’’
मामला अब 16 फरवरी से शुरू होने वाले सप्ताह में सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया है।
नवंबर 2025 में, शीर्ष अदालत ने सभी उच्च न्यायालयों को सुरक्षित रखे गए फैसलों का घटनाक्रम संबंधी विवरण सौंपने का निर्देश दिया था, जिसमें फैसले सुरक्षित रखने, सुनाने और अपलोड करने की तारीखें शामिल हों।
शीर्ष अदालत अपने इस निर्देश के पालन की निगरानी कर रही है, जिसमें यह अनिवार्य किया गया है कि फैसलों की सभी प्रमाणित प्रतियों में संबंधित तीनों तारीखें साफ-साफ दर्ज हों।
भाषा
नेत्रपाल दिलीप
दिलीप
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