नई दिल्ली: 2025 में भारतीयों ने साइबर अपराध में जो पैसा गंवाया, उसमें 75 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा निवेश घोटालों का था. हालांकि, कुल वित्तीय नुकसान पिछले साल की तुलना में थोड़ा कम रहा. यह जानकारी गृह मंत्रालय से मिले डेटा में सामने आई है.
2025 में भारतीयों ने साइबर धोखाधड़ी में कम से कम 22,495 करोड़ रुपये गंवाए, जबकि 2024 में यह आंकड़ा 22,845 करोड़ रुपये था, लेकिन मामलों की संख्या बढ़ गई.
2025 में कुल 28.15 लाख मामले सामने आए, जबकि 2024 में यह 22.68 लाख थे. मामलों में बढ़ोतरी के बावजूद, 2025 में एफआईआर की संख्या घटकर 55,484 रह गई, जो एक साल पहले 66,370 थी. गृह मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि बैंकों और पुलिस की तेज़ कार्रवाई से शिकायत के एफआईआर बनने से पहले ही पैसा ब्लॉक कर दिया गया.
हालांकि, यह डेटा एक चिंता बढ़ाने वाला ट्रेंड दिखाता है—साइबर अपराध का दायरा बढ़ रहा है, लेकिन एजेंसियां रियल-टाइम कार्रवाई, खातों की निगरानी और अलग-अलग एजेंसियों के तालमेल से वित्तीय नुकसान को काबू में रखने में सफल हो रही हैं.
डेटा के अनुसार, 2025 में कुल खोए गए पैसे में से 76 प्रतिशत निवेश धोखाधड़ी की वजह से था. इसमें पोंजी स्कीम, नकली शेयर मार्केट ट्रेडिंग घोटाले, क्रिप्टोकरेंसी घोटाले आदि शामिल हैं.
एक सूत्र ने कहा, “इन साइबर धोखाधड़ी का सबसे बड़ा हिस्सा निवेश घोटालों से जुड़ा है. यह लोगों की जल्दी पैसा कमाने की इच्छा की वजह से होता है, इसलिए वे ऐसे स्कीम में फंस जाते हैं जो जल्दी रिटर्न का वादा करते हैं.”
सूत्र ने आगे कहा, “चाहे ज्यादा रिटर्न देने वाली स्कीम हो, ज्यादा कमाई वाले शेयरों में पैसा लगाने का लालच हो, या गेमिंग के जरिए पैसा कमाने का लालच—यही लालच उन्हें जाल में फंसा देता है और वे लाखों रुपये गंवा देते हैं.”
वहीं, डिजिटल अरेस्ट से कुल नुकसान का 9 प्रतिशत हिस्सा हुआ, जबकि सेक्सटॉर्शन का हिस्सा 4 प्रतिशत था.
इसके अलावा, कुल दर्ज मामलों में 35 प्रतिशत निवेश धोखाधड़ी से जुड़े थे, 19 प्रतिशत सेक्सटॉर्शन से और 6 प्रतिशत डिजिटल अरेस्ट से जुड़े थे, बाकी अन्य धोखाधड़ी के मामले थे.
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि यह बढ़ोतरी तकनीक के ज्यादा एडवांस होने और फिशिंग, रैनसमवेयर, डिजिटल अरेस्ट और पहचान चोरी जैसे तरीकों के इस्तेमाल की वजह से हुई है.
राज्यों के बीच बढ़ रहा तालमेल
इस बीच, केंद्र सरकार का कहना है कि उसने साइबर अपराध से निपटने के लिए अपनी संस्थागत क्षमता बढ़ाई है. गृह मंत्रालय के तहत काम करने वाला इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (I4C) अब राज्यों, बैंकों और वित्तीय संस्थानों के बीच तालमेल पर ध्यान दे रहा है.
सितंबर 2024 में स्थापित I4C ने बैंकों के साथ मिलकर संदिग्ध साइबर अपराधियों की पहचान का एक रजिस्टर शुरू किया, ताकि धोखाधड़ी का पता लगाने और उसे रोकने में मदद मिल सके.
गृह मंत्रालय ने पिछले दिसंबर में लोकसभा सांसद देलकर कलाबेन मोहनभाई के सवाल के जवाब में बताया कि अब तक बैंकों ने 18.43 लाख से ज्यादा संदिग्ध पहचान और 24.67 लाख म्यूल बैंक खातों की जानकारी साझा की है. इससे शुरू होने के बाद से 8,031.56 करोड़ रुपये के धोखाधड़ी वाले ट्रांजेक्शन ब्लॉक करने में मदद मिली.
अलग से, 2021 में शुरू किए गए सिटीजन फाइनेंशियल साइबर फ्रॉड रिपोर्टिंग एंड मैनेजमेंट सिस्टम ने तुरंत शिकायत दर्ज करने की सुविधा देकर 23.02 लाख शिकायतों में 7,130 करोड़ रुपये से ज्यादा बचाए हैं.
अब भारत में 459 समर्पित साइबर अपराध पुलिस स्टेशन हैं, जो 2020 में 169 थे, और उत्तर प्रदेश 75 साइबर अपराध पुलिस स्टेशनों के साथ सबसे आगे है.
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