नयी दिल्ली, 29 मार्च (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को विवाह, तलाक, विरासत और गुजारा भत्ता जैसे विषयों पर लैंगिक और धार्मिक रूप से तटस्थ एक समान कानून बनाने को लेकर केंद्र को निर्देश देने से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि वह संसद को ‘‘कानून बनाने के लिए निर्देश नहीं दे सकता ।’’
प्रधान न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड एवं न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला की पीठ ने सॉलिसिटर जनरल की इस दलील पर संज्ञान लिया कि यह मुद्दा विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है और इसलिए याचिकाओं पर सुनवाई नहीं की जा सकती।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नेता शाज़िया इल्मी और अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय की ओर से दायर याचिकाओं समेत कुल 16 याचिकाओं का निपटान करते हुये शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘आग्रह एवं अभिवेदन पर विचार करने के बाद, हम याचिका पर सुनवाई करने के इच्छुक नहीं हैं।
पीठ ने कहा, ‘‘यह मुद्दा विशेष रूप से विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है और (कानून बनाने के लिए) संसद को इसके लिए आदेश जारी नहीं किया जा सकता।’’
पीठ ने इन कानूनों पर विधि आयोग को एक रिपोर्ट तैयार करने को लेकर निर्देश देने से भी इनकार कर दिया। याचिकाओं में इसके लिए आग्रह किया गया था।
शीर्ष न्यायालय ने अपने फैसले में कहा, ‘‘जहां तक विधि आयोग को एक रिपोर्ट तैयार करने के लिये निर्देश देने का संबंध है, हमें अनुरोध पर विचार करने का कोई कारण नहीं दिखता है। अंतत: कानून बनाने का मुद्दा विधायिका के अंतर्गत आएगा….याचिकाओं का निस्तारण किया जाता है।’’
पीठ ने, हालांकि एक मुस्लिम महिला की ओर से दायर दायर याचिका को बरकरार रखा, जिसकी व्यक्तिगत शिकायतें थीं।
पीठ विभिन्न मुद्दों पर लैंगिक और धार्मिक रूप से तटस्थ एक समान कानून बनाने के लिए सरकार को निर्देश देने के अनुरोध वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।
उपाध्याय ने केंद्र को तलाक, गोद लेना, संरक्षण, उत्तराधिकार, विरासत, भरण-पोषण, विवाह की उम्र और गुजारे भत्ता के लिए लैंगिक और धार्मिक रूप से तटस्थ एक समान कानून बनाने के संबंध में केंद्र को निर्देश देने का अनुरोध करते हुए पांच अलग-अलग याचिकाएं दायर की थीं।
भाषा रंजन रंजन पवनेश
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