नयी दिल्ली, 31 जनवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को दो दशक पुरानी केंद्रीय अधिकार-प्राप्त समिति (सीईसी) के स्थान पर पर्यावरण और वन मामलों से जुड़े मुद्दों पर परामर्श के लिए केंद्र द्वारा गठित विशेषज्ञों के एक स्थायी निकाय को अपनी मंजूरी दे दी।
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने पिछले साल पांच सितंबर को पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 3(3) के तहत एक अधिसूचना जारी की थी, जिसमें सीईसी को एक स्थायी निकाय के रूप में गठित किया गया था।
हालांकि, न्यायमूर्ति बी. आर. गवई, न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने कहा कि शीर्ष अदालत जब भी आवश्यक हो, विशेष रूप से पर्यावरण मामलों में न्यायिक समीक्षा जारी रखेगी।
पीठ ने कहा, ‘‘हमने पाया है कि पांच सितंबर, 2023 की अधिसूचना के आधार पर, एक तदर्थ निकाय के रूप में सीईसी के कामकाज के बारे में हमारी चिंताओं और इसके बाद इसे एक स्थायी निकाय के रूप में संस्थागत बनाए जाने, का ध्यान रखा गया है।’’
इसने कहा कि उक्त अधिसूचना सीईसी के गठन, इसकी शक्तियों, कार्यों, सदस्यों, नियुक्ति की विधि, सेवा की शर्तों और इसके कामकाज की निगरानी का प्रावधान करती है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि वर्तमान सीईसी में ऐसे लोग शामिल हैं, जिनकी उम्र 75 वर्ष से अधिक है और उनमें से कुछ भारत से बाहर भी रह रहे हैं।
पीठ ने कहा, ‘हमने यह भी देखा कि जब शुरू में सीईसी का गठन किया गया था तो बहुत पानी बह चुका था, क्योंकि पर्यावरणीय मुद्दों से संबंधित विभिन्न अधिनियम बनाए गए थे, इसलिए उक्त अधिनियमों के तहत विभिन्न नियामक निकायों का गठन भी किया गया था। हमने पाया कि सीईसी की कार्यप्रणाली पर फिर से विचार करना आवश्यक है।’’
सीईसी को मूल रूप से नौ मई, 2002 के शीर्ष अदालत के एक आदेश पर गठित करने का निर्देश दिया गया था और यह लगभग दो दशक से एक तदर्थ निकाय के रूप में कार्य कर रही थी।
पीठ ने सीईसी को अपने कार्यों और आंतरिक बैठकों के संचालन के लिए दिशानिर्देश तैयार करने का निर्देश दिया।
पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की अधिसूचना के अनुसार, नयी सीईसी में एक अध्यक्ष, एक सदस्य सचिव और तीन विशेषज्ञ सदस्य शामिल होंगे, जिनमें से सभी को केंद्र द्वारा नामित या नियुक्त किया जाएगा।
भाषा नेत्रपाल सुरेश
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