हैदराबाद: हैदराबाद के एक कपल के लिए, जिन्होंने अपने परिवारों से अपने रिश्ते को मंज़ूरी मिलने का दस साल से ज़्यादा इंतज़ार किया था, यह खबर जून 2020 की एक आम सुबह आई. पति तेलंगाना के सबसे ज़्यादा सर्कुलेट होने वाले तेलुगु डेली में से एक पढ़ रहा था, जब उसे यह रिपोर्ट मिली. उसने अपनी पत्नी को जगाया.
महिला ने याद करते हुए कहा, “मेरे पति ने मुझे खबर दिखाई. मुझे लगा जैसे मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई. चारों तरफ सन्नाटा छा गया.”
खबर में लिखा था कि डॉ. पचिपाला नम्रता को विशाखापट्टनम पुलिस ने बच्चों की तस्करी के आरोप में गिरफ्तार किया है. उसी सेकंदराबाद स्थित फर्टिलिटी क्लिनिक से यह कपल नियमित रूप से व्हाट्सऐप अपडेट, अल्ट्रासाउंड स्कैन और गर्भावस्था की प्रगति दिखाने वाली तस्वीरें ले रहा था. जब वे क्लिनिक पहुंचे तो वहां सिर्फ ताला लगा हुआ भवन मिला, जिस पर छापा पड़ चुका था.
आने वाले महीनों और सालों में, और खासकर पिछले एक साल में तेजी से, जो सच सामने आया वह बेहद क्रूर धोखाधड़ी थी. यह ऐसी योजना थी जिसने उन दंपतियों की मजबूरी का फायदा उठाया, जो अपनी जिंदगी के कई साल और अपनी जमा पूंजी सिर्फ अपना बच्चा पाने की इच्छा पूरी करने में लगा देते हैं.
सीरीज के भाग 1 में दिप्रिंट ने बताया था कि नम्रता के क्लिनिक कई सालों तक कैसे चलते रहे. जांच एजेंसियों का आरोप है कि इन फर्टिलिटी क्लिनिकों ने आईवीएफ और सरोगेसी के लिए कपल्स से लिए गए जैविक नमूनों का असल में कभी इस्तेमाल ही नहीं किया. इसके बजाय, गरीब परिवारों से एजेंटों के नेटवर्क के जरिए लाए गए नवजात शिशुओं को उन दंपतियों को दे दिया जाता था, जिन्हें विश्वास दिलाया जाता था कि यह बच्चा उन्हीं का है.
हैदराबाद पुलिस ने पिछले साल नौ मामले दर्ज किए थे. कुल मिलाकर तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में नम्रता और उसके सहयोगियों के खिलाफ कम से कम 24 पुलिस मामले दर्ज हैं. इसके अलावा प्रवर्तन निदेशालय ने मनी लॉन्ड्रिंग का एक मामला भी दर्ज किया है.
नम्रता फिलहाल ईडी के मामले में न्यायिक हिरासत में है. इसी महीने की शुरुआत में एजेंसी ने उसे गिरफ्तार किया था. उनके वकील ने पहले आरोपों पर टिप्पणी करने से इनकार किया था, लेकिन कहा था कि वे “उचित मंच पर उचित आवेदन” दायर करेंगे.
रैकेट कैसे बना
दिप्रिंट ने बताया था कि इस योजना का सबसे पुराना दर्ज मामला एक एनआरआई कपल का था. अक्टूबर 2014 में उनके यहां एक बेटा हुआ, जिसे वे नम्रता के सेकंदराबाद क्लिनिक में आईवीएफ और सरोगेसी के जरिए पैदा हुआ मान रहे थे. लेकिन नौ महीने बाद सच्चाई सामने आई, जब जांच में बच्चे का डीएनए कपल से मेल नहीं खाया.
2015 में मामला दर्ज हुआ, लेकिन नम्रता की कभी गिरफ्तारी नहीं हुई. उन पर भारतीय दंड संहिता की ऐसी धाराएं लगाई गईं जो जमानती अपराध थीं.
रिपोर्ट की शुरुआत में जिन हैदराबाद के कपल का जिक्र है, वे भी उसी रास्ते से नम्रता के क्लिनिक तक पहुंचे, जिस रास्ते से उसके कई और मरीज पहुंचे थे. यानी एजेंटों का नेटवर्क और ऑनलाइन खोज.
महिला को 2013 में गर्भाशय में फाइब्रॉइड की समस्या बताई गई थी और उनका गर्भपात हो गया था. कई साल बाद एक आईवीएफ साइकिल भी असफल रही. 2019 तक कपल लगभग सभी पारंपरिक विकल्प आजमा चुके थे और अपने बजट में सरोगेसी का विकल्प खोज रहे थे.
महिला ने कहा, “हमने शहर में कई नाम और विकल्प खोजे, लेकिन 2019 में ज्यादातर लोग 20 से 30 लाख रुपये बता रहे थे. यह हमारे बजट से बहुत ज्यादा था, इसलिए तलाश बहुत थकाने वाली हो गई थी.”
कुछ समय बाद उन्हें “दिल्ली के एक एजेंट” का फोन आया. उसने उनकी पसंद और बजट पूछा, जो 15 लाख रुपये से कम था. महिला ने कहा, “मुझे कहा गया कि यह रकम बहुत कम है और बढ़ानी होगी, लेकिन बाद में उसने कहा कि यूनिवर्सल श्रुस्ती शायद हमारे बजट में एक पैकेज दे सकती है.”
फिर रानी नाम की एक महिला का फोन आया. उसने खुद को यूनिवर्सल सृष्टी फर्टिलिटी से बताया और कपल को सेकंदराबाद स्थित नम्रता के क्लिनिक आने के लिए कहा. वे नवंबर 2019 में वहां गए. महिला के मेडिकल इतिहास पर चर्चा के बाद 12.5 लाख रुपये में सरोगेसी पैकेज तय हुआ, जिसे डिलीवरी से पहले चुकाना था.
पुलिस जांच के मुताबिक जो एजेंट दंपतियों को नम्रता के क्लिनिक तक लाते थे, उन्हें आर्थिक लाभ मिलता था. हर नवजात बच्चे को किसी कपल को सौंपने पर उन्हें कथित तौर पर 50 हजार रुपये मिलते थे.
क्लिनिक में कपल को ऐसे विकल्प दिए गए जिनकी उन्हें उम्मीद नहीं थी. एग डोनर चुनने के विकल्प और सरोगेट मां की कद काठी, रंग और शिक्षा जैसी बातें तय करने का विकल्प. लेकिन उन्हें सरोगेट मां से मिलने का मौका नहीं दिया गया.
महिला ने कहा, “हमसे एग डोनर की कद काठी और रंग, शिक्षा जैसी बातें पूछी गईं. मुझे किसी भी रंग से कोई समस्या नहीं थी.”
उन्होंने कहा, “हमें बताया गया कि सरोगेट मां यह काम पैसे के लिए करती हैं और एक दूसरे की पहचान उजागर करने से ब्लैकमेल और वसूली की समस्या हो सकती है.”
फरवरी 2020 तक नम्रता कपल के फोन पर अल्ट्रासाउंड की तस्वीरें भेज रही थीं और बता रही थीं कि गर्भावस्था ठीक चल रही है और अक्टूबर में डिलीवरी होगी.
फिर महामारी आ गई. पति पत्नी दोनों की नौकरी चली गई. इसके बावजूद नम्रता व्हाट्सऐप पर स्कैन रिपोर्ट भेजती रहीं और कहती रहीं कि सरोगेट मां और बच्चा दोनों स्वस्थ हैं.
महिला ने कहा, “हमें बताया गया कि सभी सरोगेट मांओं को विशाखापट्टनम क्लिनिक में रखा गया है. इससे मुझे डर लगने लगा क्योंकि उस समय सरकार सोशल डिस्टेंसिंग और सुरक्षा उपायों की सलाह दे रही थी.”
जून 2020 की उस सुबह जब अखबार उनके घर पहुंचा, तब यह भ्रम टूट गया.
महिला रोते हुए बोलीं, “मैं नहीं चाहती कि किसी और के साथ ऐसा हो. धोखाधड़ी के कई रूप होते हैं, लेकिन यह सबसे बुरा है. लोग धोखे में पैसे या संपत्ति खोते हैं. यहां सिर्फ पैसे का नुकसान नहीं है, यह भावनात्मक और मानसिक जख्म है जो हमारे अंदर रह गया है.”
बाद में कपल ने सेकंदराबाद के गोपालापुरम पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई.
2021 में नम्रता के खिलाफ एक और धोखाधड़ी का मामला दर्ज हुआ. तब तक वह अपना काम विशाखापट्टनम केंद्र में शिफ्ट कर चुकी थीं और सेकंदराबाद क्लिनिक का सरोगेसी लाइसेंस सरेंडर कर चुकी थीं.
2002 से 2022 के बीच भारत में व्यावसायिक सरोगेसी की अनुमति थी, हालांकि विदेशियों और कुछ अन्य समूहों के लिए कुछ प्रतिबंध थे.
राजस्थान का कपल
कई साल बाद 2024 में राजस्थान के झुंझुनूं जिले का एक कपल नम्रता के केंद्र पर पहुंचा. उनके साथ दो गर्भपात का दुख था.
मामले के दस्तावेजों के मुताबिक उन्होंने करीब 66 हजार रुपये मेडिकल जांच के लिए दिए. नम्रता ने उन्हें “गर्भधारण के लिए पूरी तरह फिट” बताया. डॉक्टर ने कथित तौर पर उन्हें आईवीएफ से दूर रहने को कहा और अपने 25 साल से ज्यादा के अनुभव का हवाला देते हुए कहा कि सरोगेसी ज्यादा भरोसेमंद है. कपल के मुताबिक उन्होंने “100 प्रतिशत सफलता दर” का भी दावा किया.
महिला ने पुलिस को बताया, “उन्होंने वादा किया कि हमारे ही एग और स्पर्म से एम्ब्रियो बनाया जाएगा. उसकी जांच कर सरोगेट मां में डाला जाएगा, जिसे क्लिनिक व्यवस्था करेगा. उन्होंने यह भी कहा कि सारा कागजी काम वे खुद संभालेंगे और डीएनए पुष्टि के बाद हमें स्वस्थ बच्चा दिया जाएगा.”
कपल ने 30 लाख रुपये का सरोगेसी पैकेज मंजूर किया. 15 लाख रुपये बैंक ट्रांसफर से और 15 लाख रुपये नकद, जो सरोगेट मां की फीस बताई गई.
सरोगेसी विनियमन अधिनियम 2021 के तहत भारत में किसी असंबंधित महिला के जरिए व्यावसायिक सरोगेसी पर रोक लगा दी गई. संशोधित कानून 2022 से लागू हुआ, जिसके तहत केवल करीबी रिश्तेदार ही बिना किसी आर्थिक भुगतान के सरोगेट बन सकती है.
कपल, जो तब सेकंदराबाद में रह रहे थे और बाद में दिल्ली चले गए, ने जांचकर्ताओं को बताया कि उन्होंने अगस्त 2024 से भुगतान शुरू किया. उन्हें कई मेडिकल चरणों से गुजरना पड़ा ताकि प्रक्रिया असली लगे. महिला को तीन महीने हार्मोनल दवाएं दी गईं ताकि अंडों की “गुणवत्ता” सुधरे. सितंबर 2024 में वे अपने जैविक नमूने देने विशाखापट्टनम क्लिनिक गए.
इसके बाद कई महीनों तक उन्हें भरोसा दिलाया जाता रहा. कहा गया कि सरोगेट मिल गई है. प्रक्रिया चल रही है. डिलीवरी 12 से 19 जून 2025 के बीच होगी.
मई 2025 तक कपल के अनुसार वे कुल 30.26 लाख रुपये अलग अलग किश्तों में दे चुके थे.
डिलीवरी की तारीख नजदीक आने पर पति, जिन्हें काम के लिए विदेश जाना था, ने कहा कि जाने से पहले उनका डीएनए सैंपल ले लिया जाए. 4 जून को महिला को विशाखापट्टनम केंद्र के एक कर्मचारी से सूचना मिली कि सरोगेट का सी सेक्शन से प्रसव हो रहा है, लेकिन सरोगेट का पति क्लिनिक से 3.5 लाख रुपये की मांग कर ब्लैकमेल कर रहा है.
महिला को बताया गया कि मामला 2.5 लाख रुपये में सुलझ गया.
महिला ने केस दस्तावेजों के अनुसार कहा, “5 जून को हमें खबर मिली कि सरोगेट ने बच्चे को जन्म दे दिया है. मुझे विशाखापट्टनम में एक अधबने भवन में बुलाया गया, जिसे उन्होंने सृष्टी अस्पताल का नया स्थान बताया.”
वहां उन्हें एक बच्चा दिखाया गया, जिसे क्लिनिक ने उनका जैविक बच्चा बताया. बिना डीएनए टेस्ट के बच्चे का रजिस्ट्रेशन कपल के नाम पर कर दिया गया.
कपल के मुताबिक जब उन्हें शक हुआ और उन्होंने डीएनए टेस्ट पर जोर दिया, तब सच्चाई सामने आई. जांच में पुष्टि हुई कि बच्चा उनका जैविक बच्चा नहीं है.
झुंझुनूं के कपल ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई. जुलाई 2025 में हैदराबाद पुलिस ने कार्रवाई शुरू की.
पुलिस ने कहा कि जांच में पता चला कि जो बच्चा झुंझुनूं कपल को दिया गया था, वह असम के एक कपल का था, जो हैदराबाद में रह रहा था. पुरुष शहर में मजदूरी करता था.
ये बच्चे किसके हैं?
पिछले साल झुंझुनूं के कपल की शिकायत के बाद नम्रथा के फर्टिलिटी क्लीनिक की बड़ी जांच शुरू हुई. ये क्लीनिक दस साल से ज्यादा समय से चल रहे थे और डॉक्टर व उसके साथियों पर लगभग कोई कार्रवाई नहीं हुई थी.
जांच से जुड़े एक पुलिस अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया, “क्लीनिक में कभी भी असली जैविक माता-पिता की मौजूदगी दर्ज नहीं की गई. नवजात बच्चों को सीधे उस कपल के नाम पर रजिस्टर कर दिया जाता था जिसने पैसे दिए थे. असली माता-पिता का कोई रिकॉर्ड नहीं रखा गया.”
जांच अधिकारियों ने कहा कि ज्यादातर मामलों में क्लीनिक का तरीका लगभग एक जैसा था.
मामला खुलने के बाद कई और लोग, जिन्हें लगता था कि उन्हें नम्रथा की सरोगेसी सेवा से अपना बायोलॉजिकल बच्चा मिला है, डीएनए टेस्ट करवाने आगे आए.
इनमें हैदराबाद का एक और कपल भी था. उन्होंने पुलिस को बताया कि उन्होंने सरोगेसी के लिए 16.5 लाख रुपये और सी-सेक्शन ऑपरेशन के नाम पर 1.5 लाख रुपये दिए थे.
प्रक्रिया वही थी. 14 हार्मोन इंजेक्शन दिए गए. सैंपल लेने के लिए विशाखापट्टनम बुलाया गया. और कहा गया कि सभी कानूनी अनुमति क्लीनिक संभाल रहा है. सरोगेट मां के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई. डिलीवरी जून 2025 में होने की बात कही गई.
जब बच्चा पैदा हुआ और स्वास्थ्य समस्या के कारण उसे एनआईसीयू में भर्ती किया गया, तब कपल को लगा कि बच्चे की शक्ल उनमें से किसी से नहीं मिलती. उन्होंने निजी डीएनए टेस्ट करवाया.
रिजल्ट नेगेटिव आया.
22 जुलाई 2025 को जब उन्होंने नम्रथा से सामना किया, तो उनकी पुलिस शिकायत में दर्ज जवाब चौंकाने वाला था.
शिकायत में लिखा है, “22-07-2025 को हम फिर उनसे मिले. उन्होंने माना कि गलती से डोनर के सैंपल इस्तेमाल हो गए, जिससे असली जैविक माता-पिता का पता लगाना संभव नहीं है. उन्होंने कहा कि लैब में गलती हुई. उन्होंने हमसे बच्चा वापस देने को कहा ताकि वह सरकार के पास गोद लेने के लिए आवेदन कर सकें. और फिर हमारी सैंपल से प्रक्रिया दोबारा करने की बात कही.”
जांच में पता चला कि इस कपल को जो बच्ची दी गई थी, उसे विजयवाड़ा की एक महिला, कदमाला करुणा श्री, ने 3.5 लाख रुपये में खरीदा था. इस मामले में कोर्ट में दी गई रिपोर्ट में हैदराबाद पुलिस ने करुणा श्री को ‘आदतन अपराधी’ बताया, जिसने नम्रथा के साथ मिलकर साजिश में हिस्सा लिया.
पार्ट-1 की रिपोर्ट के अनुसार, करुणा श्री उन ‘एजेंटों’ में से एक थी जो गरीब परिवारों को अपने नवजात बच्चों को बेचने के लिए मनाती थी. बाद में इन बच्चों को नम्रथा के क्लीनिक में सरोगेसी से जन्मे बच्चे बताकर कपल को दे दिया जाता था. करुणा श्री को पिछले साल अगस्त में गिरफ्तार किया गया था और इस महीने की शुरुआत में वह जमानत पर बाहर आई.
झुंझुनूं और हैदराबाद के कपल को दिए गए दोनों बच्चों को जांच शुरू होने के बाद सरकारी शेल्टर होम में रखा गया. इन दो में से, दूसरे हैदराबाद वाले कपल ने कोर्ट जाकर नवजात की कस्टडी ले ली.
इन दो मामलों में जैविक और कानूनी माता-पिता की पहचान हो चुकी है. लेकिन जांच अधिकारी मानते हैं कि पूरे रैकेट का असली आकार पता लगाना और उन सभी बच्चों का पता लगाना जिन्हें इधर-उधर किया गया हो सकता है, बहुत मुश्किल काम है.
फिलहाल उनके पास सिर्फ एक आंकड़ा है. विशाखापट्टनम क्लीनिक में 286 डिलीवरी दर्ज हैं. असली संख्या इससे कहीं ज्यादा भी हो सकती है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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