प्रयागराज, 26 मार्च (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक निर्णय में कहा है कि धर्मनिरपेक्ष भारत में किसी व्यक्ति द्वारा यह दावा करना गलत है कि एक विशेष धर्म ही “एकमात्र सच्चा धर्म” है क्योंकि ऐसा कहना अन्य धर्मों का अनादर करना है और इसके लिए प्रथम दृष्टया भारतीय दंड संहिता (भदंस) की धारा 295ए लागू होती है।
उक्त टिप्पणी के साथ अदालत ने रेवरेंड फादर विनीत विंसेंट परेरा द्वारा दायर याचिका खारिज कर दी।
परेरा पर भदंस की धारा 295ए (जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण तरीके से किए गए ऐसे कृत्य जिनका उद्देश्य किसी भी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना या उनके धर्म या धार्मिक मान्यताओं का अपमान करना हो) के तहत मुकदमा पंजीकृत है।
न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव ने 18 मार्च को दिए अपने निर्णय में कहा, “किसी भी धर्म के लिए यह दावा करना गलता है कि केवल वही एकमात्र सच्चा धर्म है क्योंकि इसका अर्थ अन्य धर्मों का अनादर करना होगा।’’
प्राथमिकी के मुताबिक, याचिकाकर्ता ने कथित तौर पर प्रार्थना सभाएं बुलाई थीं जहां उसने बार-बार यह बात कही कि ईसाई धर्म ही एकमात्र सच्चा धर्म है। इससे एक खास धर्म जैसे हिंदू में आस्था रखने वालों की भावनाएं आहत हुईं।
प्रारंभिक जांच के दौरान यद्यपि जांच अधिकारी ने यह निष्कर्ष निकाला कि वंचित तबके के लोगों का कोई अवैध धर्मांतरण नहीं किया गया, पुलिस ने अन्य धर्मों की आलोचना के आरोपों के संबंध में आरोप पत्र दाखिल किया।
सुनवाई के दौरान, फादर विंसेंट के वकील ने दलील दी कि उनके मुवक्किल को परेशान करने के लिए झूठा फंसाया गया है और प्राथमिकी के मुताबिक, भदंस की धारा 295ए के तहत कोई अपराध नहीं बनता।
सुनवाई के दौरान यह दलील भी दी गई कि मजिस्ट्रेट ने विवेक का इस्तेमाल किए बगैर आरोप पत्र को संज्ञान में लिया।
वहीं, राज्य सरकार के वकील ने दलील दी कि याचिकाकर्ता के तर्कों में विवादित प्रश्न शामिल थे और इसके लिए साक्ष्यों के गहन विश्लेषण की आवश्यकता है।
अदालत ने कहा कि भारत वह भूमि है जहां सभी आस्था और विश्वास के लोग साथ साथ रहते हैं। धारा 295 की पहली पंक्ति विशेष रूप से जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण तरीके से किए गए ऐसे कृत्य जिनका उद्देश्य किसी भी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना या उनके धर्म या धार्मिक मान्यताओं का अपमान करना हो, के बारे में है।
अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता का कृत्य धारा 295-ए के दायरे में आता है और इस चरण में यह नहीं कहा जा सकता कि प्रथम दृष्टया कोई अपराध नहीं बनता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि एक मजिस्ट्रेट को रिकॉर्ड में दर्ज तथ्यों के आधार पर प्रथम दृष्टया विचार दर्ज करने की आवश्यकता होती है और उसे शुरुआती चरण में आरोपी के बचाव की समीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है।
भाषा सं राजेंद्र
संतोष
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