नयी दिल्ली, सात अप्रैल (भाषा) मध्य प्रदेश के कुनो राष्ट्रीय उद्यान में छोड़े गए चीतों में से एक के भटक कर उससे बाहर चले जाने के विषय पर पर्यावरण मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा है कि चीते अपने पर्यावास की तलाश कर रहे हैं और यह एक बहुत अच्छा संकेत है।
नामीबिया से सितंबर, 2022 में लाए गए आठ चीतों में से एक को दो अप्रैल को कुनो राष्ट्रीय उद्यान से बाहर देखा गया था।
राज्य के वन अधिकारियों ने शुक्रवार को बताया कि इस चीते को बृहस्पतिवार शाम पड़ोसी शिवपुरी जिले के वन क्षेत्र से लाया गया और उसे फिर से राष्ट्रीय उद्यान में छोड़ दिया गया।
वन विभाग के अतिरिक्त महानिदेशक एस. पी. यादव ने बताया कि चीतों का इस तरह से घूमना-फिरना उनका प्राकृतिक स्वभाव है और इस बारे में चिंता करने की कोई बात नहीं है।
‘प्रोजेक्ट टाइगर’ के प्रमुख यादव ने पीटीआई-भाषा को एक साक्षात्कार में बताया, ‘‘चार चीतों को पूरी तरह से खुला छोड़ दिया गया है। वे जंगल में मुक्त रूप से विचरण कर रहे हैं। उनका इसे तरह से विचरण करना स्वाभाविक है। हम खुश हैं कि चीतें विचरण कर रहे हैं और इलाके का मुआयना कर रहे हैं तथा उसी आधार पर वे अपने लिए उपयुक्त पर्यावास चुनेंगे।’’
उन्होंने कहा, ‘‘यह बहुत अच्छा संकेत है कि वे (चीते) अन्य इलाकों का भी मुआयना कर रहे हैं। यह उनका प्राकृतिक स्वाभाव है और चिंता करने की कोई बात नहीं है। लेकिन मैं आपको बता दूं कि कुनो में छोड़े गए हर चीते पर हम चौबीसों घंटे नजर रखे हुए हैं।’’
वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि सरकार ने स्थानीय लोगों को चीतों के बारे में बताने, जागरूक करने और भविष्य में किसी प्रकार के संघर्ष को टालने के लिए ‘चीता मित्र’ नियुक्त किए हैं।
मध्य प्रदेश के वन अधिकारियों ने 51 गांवों के करीब 400 ‘चीता मित्रों’ को प्रशिक्षण दिया है। प्रशिक्षण पाने वालों में स्कूली शिक्षक, ग्राम प्रधान और पटवारी शामिल हैं।
यादव ने कहा, ‘‘ यदि भेड़, बकरियों आदि जैसे छोटे जानवरों के साथ कोई संघर्ष होता है तो उसके लिए हमारी मुआवजा योजना तैयार है। उन्हें (इन जानवरों के मालिकों को) समुचित मुआवजा दिया जाएगा।’’
नामीबिया से लाए गऐ आठ चीतों – पांच मादा और तीन नर को 17 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की उपस्थिति में इस उद्यान में उनके बाड़े में छोड़ा गया था।
भारत में अंतिम चीते की मौत वर्तमान छत्तीसगढ़ राज्य के कोरिया जिले में 1947 में हुई थी और जमीन पर सबसे तेज दौड़ने वाले इस वन्य जीव को 1952 में देश में विलुप्त घोषित कर दिया गया था।
भाषा अर्पणा सुभाष
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