Friday, 27 May, 2022
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मोबाइल फोन से दे सकेंगे वोट? तेलंगाना देश में पहली बार ई-वोटिंग सिस्टम का ड्राई रन करने जा रहा

तेलंगाना राज्य चुनाव आयोग द्वारा विकसित, ई-वोटिंग प्रणाली द्वारा अपना वोट डालने के लिए एक ऐप डाउनलोड करने की जरूरत होगी. हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि इसमें सिक्योरिटी रिस्क है.

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हैदराबाद: तेलंगाना में भविष्य में होने वाले चुनावों में मतदान प्रक्रिया में बड़ा बदलाव नजर आ सकता है, क्योंकि राज्य सरकार देश में पहली बार स्मार्टफोन आधारित ई-वोटिंग सिस्टम के ड्राई रन की तैयारी कर रही है.

यह प्रणाली मतदाताओं को एक एप्लिकेशन डाउनलोड करके अपने मोबाइल फोन से ही वोट डालने की अनुमति देती है.

इस एप को टेस्ट करने के लिए खम्मम जिले में 20 अक्टूबर को डमी इलेक्शन होगा और जिले के सभी पात्र मतदाता 8 से 18 अक्टूबर तक एप पर आवेदन करके इसमें हिस्सा ले सकते हैं.

ई-वोटिंग सिस्टम की यह पहल तेलंगाना राज्य चुनाव आयोग (टीएसईसी) की तरफ से की गई है और इसे राज्य के आईटी इलेक्ट्रॉनिक्स और संचार विभाग के इमर्जिंग टेक्नोलॉजी विंग के समर्थन से लागू किया जा रहा है, जिसके टेक्निकल डेवलपमेंट में सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग (सीडैक) भी शामिल रहा है.

टेक्निकल डेवलपमेंट का काम एक विशेषज्ञ समिति के नेतृत्व में भी चला जिसमें आईआईटी भिलाई के निदेशक और भारतीय निर्वाचन आयोग के तकनीकी सलाहकार प्रो. रजत मूना और आईआईटी बॉम्बे और आईआईटी दिल्ली के प्रोफेसर शामिल थे.

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इमर्जिंग टेक्नोलॉजी विंग की तरफ से जारी एक बयान, जिसे आईटी मंत्री के.टी. रामा राव के कार्यालय ने भी साझा किया, के मुताबिक मोबाइल एप्लिकेशन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल करके तीन फैक्टर के आधार पर वैध मतदाताओं को प्रमाणित करेगा.

इसमें मतदाताओं के नामों का उनके आधार कार्ड से मिलाना, व्यक्तियों का लाइव डिटेक्शन और उनकी तस्वीर का ईपीआईसी (चुनाव फोटो पहचान पत्र) डेटाबेस के साथ 15 से 20 साल पुराने रिकॉर्ड के साथ मिलान करना आदि शामिल है.

बुधवार को जारी बयान में कहा गया है, ‘इसके अलावा, ब्लॉकचैन (डिस्ट्रिब्यूटेड लेजर) तकनीक का उपयोग डी-आइडेंटिफाइड और एन्क्रिप्टेड वोटों को सुरक्षित करने के लिए किया जाएगा ताकि उन्हें अपरिवर्तनीय रिकॉर्ड के रूप में बनाए रखा जा सके.’

इसमें कहा गया है, ‘स्मार्टफोन एप्लिकेशन एक न्यूनतम डिजाइन एप्रोच पर काम करती है और अंग्रेजी और तेलुगु दोनों को सपोर्ट करती है, और नागरिकों की मदद के लिए ट्यूटोरियल वीडियो और हेल्पलाइन नंबर के साथ एक विस्तृत हेल्प सेक्शन भी है.

हालांकि, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी जैसे तमाम विशेषज्ञ ऑनलाइन वोटिंग के खतरों के बारे में आगाह कर चुके है कि कैसे इसमें आसानी से हेरफेर किया जा सकता है, ‘यही कारण है कि भारतीय निर्वाचन आयोग ने इस पर विचार नहीं किया.’


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मोबाइल एप कैसे काम करेगा

बयान में बताया गया है कि ड्राई रन ‘टीएसईसी ई-वोट’ एंड्रॉइड एप्लिकेशन का इस्तेमाल करके किया जाएगा, जिसमें हेरफेर रोकने के ‘कड़े सुरक्षा’ उपाय किए गए हैं. एप पंजीकरण के दौरान किसी भी व्यक्ति की डिवाइस की आईडी और फोन नंबर को इस तरह दर्ज करती है जिससे सुरक्षा के लिहास से यह सुनिश्चित किया जा सके कि मतदान के लिए उसी डिवाइस का इस्तेमाल किया जा रहा है.

पूरी प्रक्रिया की निगरानी और इस पर नियंत्रण किसी मैनेजर की तरफ से वेब पोर्टल का उपयोग करके किया जाएगा, जिसमें टोकन-आधारित डिक्रिप्शन के साथ परिणामों को निर्धारित करना सुनिश्चित होगा और उन तक पहुंच को सुरक्षित रखा जा सकता है.

ऐप पर एकत्र किए गए डेटा को अतिरिक्त सुरक्षा के साथ राज्य डेटा केंद्रों (एसडीसी) में भी स्टोर किया जाएगा.

राज्य के चुनाव आयुक्त सी. पार्थ सारथी के मुताबिक, राज्य का चुनाव आयोग भारतीय निर्वाचन आयोग (ईआईसी) के तहत एक स्वायत्त इकाई है और राज्य में चुनाव की प्रक्रिया में कोई बदलाव लागू करने के लिए स्वतंत्र है.

पार्थ सारथी ने दिप्रिंट को बताया, राज्य चुनाव आयोग को भी संविधान के तहत अपने अधिकार मिले हुए हैं, इसलिए यदि एसईसी कुछ भी नया लागू करना चाहता है तो उसे ईसीआई से किसी मंजूरी की आवश्यकता नहीं है. और ई-वोटिंग सॉल्यूशन सिर्फ परीक्षण के चरण में हैं, अगर हम इसे लागू करना चाहते हैं या एक पायलट प्रोजेक्ट चलाना चाहते हैं तो एसईसी को पहले सभी राजनीतिक दलों की सहमति लेनी होगी.’

दिप्रिंट की तरफ से इस पर टिप्पणी के लिए ईमेल के जरिये भारतीय निर्वाचन आयोग से संपर्क साधा गया लेकिन यह रिपोर्ट प्रकाशित होने तक कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली थी.

‘इंटरनेट पर वोटिंग में हेराफेरी हो सकती है’

इस कदम के नुकसान को लेकर आगाह करते हुए पूर्व सीईसी कुरैशी ने दिप्रिंट को बताया, ‘ऐप विकसित करना तो बच्चों का खेल है, मुद्दा इस पर अमल और विश्वसनीयता का है. जिस देश में ईवीएम तकनीक, वीवीपैट तकनीक (जिसे हमने 40 साल तक प्रयोग करने के बाद आगे बढ़ाया और लागू किया) को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा रही है, ऐसा किसी कदम के बारे में सोचना भी मूर्खता होगी. इंटरनेट पर वोटिंग में हेरफेर की भी पूरी गुंजाइश हो सकती है, इसीलिए चुनाव आयोग ने इस पर विचार नहीं किया.’

उन्होंने कहा, ‘जब आप मतदान केंद्र पर जाते हैं तो कोई नहीं जानता कि आप किसे वोट दे रहे हैं. लेकिन इस तरह की एप होने पर कोई भी घर आकर लोगों को रिश्वत दे सकता है या किसी खास उम्मीदवार के पक्ष में वोट देने के लिए धमका सकता है. घर में गोपनीयता की गारंटी नहीं दी जा सकती.’

डेटा और गवर्नेंस पर काम कर रहे एक स्वतंत्र शोधकर्ता श्रीनिवास कोडाली ने भी कहा कि अगर इसे लागू किया जाता है तो एप-आधारित वोटिंग ‘गोपनीय मतदान’ के सिद्धांत के लिए खतरा बन सकती है, और ऐप का ‘सोर्स कोड’ गोपनीयता सुनिश्चित नहीं कर सकता है.

कोडाली ने दिप्रिंट से कहा, ‘चुनाव स्वतंत्र एवं निष्पक्ष ढंग से कराने का मूल सिद्धांत गोपनीय मतदान का उपयोग करना है और यह कदम इस विचार के लिए एक जोखिम पैदा करता है. उदाहरण के तौर पर अगर कोई एक बग है और इसे ठीक करने के लिए एप्लिकेशन के सोर्स कोड को देखना होगा. ऐसे में वे मामले में गोपनीयता कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं?’

उन्होंने यह भी कहा, ‘और जब इस तरह के फैसले किए जाते हैं तो सार्वजनिक रूप से चर्चा की जरूरत होती है और यदि सरकार इसे लागू करना चाहती है तो एक सरकारी आदेश पारित किया जाना चाहिए. और इस पर एक सरकारी कार्यालय से बयान क्यों आ रहा है, क्या यह काम केवल चुनाव आयोग के कार्यालय का नहीं होना चाहिए था? कोई सरकार इसमें इतनी सक्रियता से कैसे शामिल हो सकती है?’

कोडाली ने बताया कि कैसे 2017 के राष्ट्रपति चुनाव में केन्या की इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग प्रणाली ने चुनौतियां उत्पन्न कर दी थीं. उस समय देश के आईईबीसी (स्वतंत्र चुनाव और सीमा आयोग) ने बताया था कि चुनावों से एक हफ्ते पहले मतदान प्रणाली को हैक करने का एक ‘असफल प्रयास’ किया गया था.

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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