बीएसएफ कैम्प के विरोध में धरने पर बैठे महिला और पुरुष आदिवासी ग्रामीण | पृथ्वीराज सिंह
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रायपुर: छत्तीसगढ़ के उत्तरी बस्तर स्थित कांकेर जिले में सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के दो कैम्प खोले जाने से स्थानीय ग्रामीण और जिला प्रशासन आमने सामने आ गए है. आरोप है कि BSF कैम्प जनजातीय समाज के दशकों पुराने दो ‘देव स्थल’ नष्ट करके बनाए गए हैं.

विरोध कर रहे ग्रामीण कह रहे हैं कि जब अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए अरबों रुपए खर्च हो सकते हैं तो नष्ट किए गए ‘देव स्थल’ क्यों पुनःस्थापित नहीं हो सकते. पुलिस का कहना है कि किसी भी देवस्थान को क्षति नहीं पहुंचाई गई है.

कोइलिबेड़ा के ग्रामीण हेमलाल मरकाम ने दिप्रिंट को बताया कि जिले के कोइलीबेड़ा ब्लॉक में मेंडकी नदी के किनारे तुमराघाट और करकाघाट क्षेत्रों में 20-25 दिन पहले बीएसएफ कैम्प के खुलने की जानकारी अचानक मिली. उनको इस बात की भनक भी नहीं लगी. उनका आरोप है कि ये दोनों स्थान 100 से ज्यादा गांवों का धार्मिक स्थान ‘देव स्थल’ के रूप में जाने जाते हैं. यहां इन गावों के लोग हर वर्ष एक धार्मिक उत्सव करते हैं. यह उत्सव उनके सामाजिक समागम भी बन जाता था जहां आदिवासी समाज के लोग अपनी धार्मिक-सामाजिक प्रथाओं के साथ-साथ अन्य मुद्दों पर सामूहिक चर्चा करते थे लेकिन बीएसएफ कैम्प के खुलने से सब कुछ समाप्त हो गया है.

करकाघाट क्षेत्र के रहने वाले आंदोलनकारी ग्रामीण और सर्वसमाज संगठन के सदस्य सहदेव उसेंडी ने दिप्रिंट को बताया, ‘करकाघाट और तुमराघाट में बीएसएफ कैम्प के स्थान पर ‘देवस्थल’ था. वहां पूजा के लिए सहजा का पेड़ और उसके नीचे स्थानीय आदिवासी समाज के पूज्य देवी देवताओं को स्थापित किया गया था. लेकिन कैम्प खुलने की बात जब ग्रामीणों को पता चली तब तक पेड़ कट चुके थे, देवी देवताओं के शिला, श्रृंगार की सामग्री और पूजा के लिए रखे गए चावल भी गायब हो चुके थे. यह स्थानीय आदिवासियों की आस्था पर प्रहार है.’

सहदेव कहते हैं, ‘एक ओर अयोध्या में राम मंदिर के लिए पहले लंबी लड़ाई लड़ी गई और फिर उसके निर्माण के लिए अरबों रुपए खर्च किये जा रहे हैं लेकिन दूसरी ओर हमारी आस्था पर प्रहार किया जा रहा है. हमारे ‘देव स्थल’ क्यों पुनःस्थापित नहीं हो सकते. हम तो ‘देव स्थल’ में होने वाली पूजा में जंगल और पर्यावरण का भी पूरा ख्याल रखतें हैं.’

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इन लोगों का कहना है कि उनका बीएसफ कैम्प से कोई विरोध नहीं है लेकिन उस स्थान के अधिग्रहण से है जो स्थानीय आदिवासियों का आस्था का केंद्र है. गावड़े गांव के रहने वाले लच्छु गावड़े के अनुसार, ‘हमें कैंप से कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन जिस जगह पर कैंप खोला गया है वह आदिवासियों का देवस्थल है. यहां हमारे देवी-देवता निवास करते हैं. करकाघाट और तुमराघाट में खोले गए कैंप से आदिवासी समाज के लोगों की आस्था पर बुरा असर पड़ा है.’


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नहीं हो रही सुनवाई

ग्रामीणों का आरोप है कि 29 नवंबर को बीएसएफ कैम्प उनके जानकारी के बिना खोले गए हैं. स्थानीय प्रशासन से हुई चर्चा में ग्रामीणों द्वारा कई बार आग्रह किया गया कि कैम्प को अन्य स्थान में शिफ्ट किया जाए लेकिन अधिकारी मूकदर्शक बने हुए हैं.

प्रशासन द्वारा कार्यवाही नही किए जाने पर आदिवासी समाज के लोगों ने पहले कोइलीबेड़ा के नजदीक प्रतापतापुर में आंदोलन और रैली की और प्रशासन को ज्ञापन भी सौंपा गया था. इसके बाद आंदोलनरत ग्रामीणों ने सत्तारूढ़ दल के स्थानीय विधायक अनूप नाग को ज्ञापन सौंपा लेकिन वहां से भी कोई कार्यवाही नही हुई. ग्रामीणों ने राज्यपाल अनुसुइया उइके को भी ज्ञापन सौंपकर इसका विरोध जताया था. राज्यपाल ने जांच कराए जाने का आश्वासन भी दिया था लेकिन अब तक कोई कार्यवाही नही हुई.

धरने पर बैठे ग्रामीण | फोटो- पृथ्वीराज सिंह

पखांजूर में ग्रामीणों का धरना शुरू

स्थानीय प्रशासन से मायूसी हाथ लगने के बाद दोनों देव स्थलों पर आस्था रखने वाले 68 ग्राम पंचायतों के 103 गांवों के ग्रामीणों ने कोइलिबेड़ा के पखांजूर नगर पंचायत क्षेत्र में बुधवार से अनिश्चितकालीन धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया है. प्रदर्शनकारी ग्रामीण इतनी तैयारी में हैं कि अपने साथ राशन और बिस्तर लेकर धरने पर बैठें हैं. तुमराघाट के पास रहने वाले ग्रामीण रामजी त्रिवेणी कहते हैं ‘हम पूरी तैयारी में हैं. बीएसएफ कैम्प हटाने तक आंदोलन जारी रहेगा भले ही प्रशासम और सरकार सर्वसमाज के आंदोलन पर कितना भी दबाव डाले. कैम्प खुलने से पहले कोइलिबेड़ा के तत्कालीन एसडीएम को देव स्थलों की पूरी जानकारी थी. उन्होंने पूजा स्थलों को नष्ट करने के विषय में माफी भी मांगी लेकिन कैम्प शिफ्ट करने से मना कर दिया. वे चाहते तो हमारे देव स्थल नष्ट होने से बचाए जा सकते थे.’

ग्रामीणों को नक्सली भड़का रहे: पुलिस

बस्तर के पुलिस अफसरों का कहना है कि बीएसएफ कैंप खुलने से ग्रामीणों के धार्मिक स्थलों को कोई नुकसान नहीं हुआ है. वह जैसे थे वैसे ही हैं. कांकेर के एसपी एम आर अहिरे ने दिप्रिंट को बताया, ’कैम्प साइट में ग्रामीणों का कोई धार्मिक स्थल नही है. उनके पूजा पाठ और कीर्तन के स्थान कैम्प से अलग हैं. कैम्प का विरोध और ग्रामीणों की भीड़ माओवादियों द्वारा प्रायोजित है. माओवादी ग्रामीणों को अपनी ढाल बना रहे हैं. लोगों को विरोध के लिए माओवादियों द्वारा 300-500 रुपए दिए जा रहे हैं.’

कांकेर एसपी का कहना है, ‘इस कैम्प से नक्सलियों के मूवमेंट का पूरा ट्रैक ब्लॉक हो जाएगा और इलाके में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होगी. वर्षों से लंबित पड़े सड़क और पुलों के निर्माण में तेजी आएगी. माओवादी नहीं चाहते हैं कि पिछले कई वर्षों से लंबित दो बड़े पुलों का निर्माण पूरा हो क्योंकि इससे कोइलिबेड़ा-पंखाजूर की दूरी करीब 80 किलोमीट कम हो जाएगी. गांव वालों पर नक्सली विरोध के लिए दबाव बना रहे हैं.’

पुलिस ने इस आरोप का भी खंडन किया है कि बीएसएफ कैम्प किसी औद्योगिक यूनिट और माइनिंग क्षेत्र की सुरक्षा के लिए स्थापित किए गए हैं. बतौर कांकेर एसपी, ‘यहां न तो कोई उद्योग लगने जा रहा है और न ही कोई बड़ी माइनिंग फील्ड खुलने वाली है.’

प्रिंट से बात करते हुए कांकेर कलेक्टर चंदन कुमार ने बताया कि एसडीएम कोइलीबेड़ा और ग्रामीणों के बीच बातचीत आइस ब्रेकिंग कार्य था लेकिन यह अभी खत्म नहीं हुआ है. इस मुद्दे को सुलझाने का प्रयास जारी हैं. अधिकांश ग्रामीण इस बात से सहमत हैं कि बीएसएफ कैम्प उनकी भलाई के लिए हैं. विरोध करने वाले मुख्यरूप से माओवादियों को खुश करने के लिए कर रहे हैं. यह सर्वविदित है कि माओवादी गतिविधियों ने उस क्षेत्र में प्रस्तावित पुलों और सड़कों के निर्माण को रोक दिया था. बीएसएफ कैम्प के साथ माओवादी पलायन करने के लिए बाध्य हैं. उन्होंने ग्रामीणों को अपना कवर बना लिया है. वैसे भी अभी बीएसएफ camps अस्थायी हैं.’

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