Monday, 8 August, 2022
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बड़े राज्यों को तोड़ने से अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलता है? जानिए क्या कहते हैं अध्यन के आंकड़े

इंदिरा गांधी विकास एवम् अनुसंधान संस्थान के शोधकर्ताओं ने साल 2000 में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार के पुनर्गठन के आर्थिक प्रभाव की पड़ताल की.

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नई दिल्ली: अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि बड़े और ज़्यादा आबादी वाले राज्यों को छोटी इकाइयों में विभाजित करने से प्रशासनिक और आर्थिक दोनों दृष्टिकोण से मदद मिलती है. हालांकि अब एक नए अध्ययन के मुताबिक, आंकड़े विशेष आर्थिक लाभ के बारे में ऐसे दावों की पुष्टि नहीं करते हैं.

साल 2000 में बिहार, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के पुनर्गठन के प्रभाव की पड़ताल करने वाले एक अध्ययन में पाया गया कि नए राज्यों में विकास पहले ज़ोर-शोर के किए गये प्रचार से मेल नहीं खाता, वहीं ‘मूल’ राज्यों को उतना नुकसान नहीं हुआ है जैसा कि आमतौर पर माना जाता था.

‘डज़ द क्रियेशन ऑफ स्मालर स्टेट्स लेड तो हाइयर एकनामिक ग्रोथ? एविडेंस फ्रॉम स्टेट रिऑर्गनाइजेशन इन इंडिया’, नाम वाले इस अध्ययन को पिछले हफ्ते मुंबई स्थित इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट रिसर्च (आईजीआईडीआर) ने छापा था, जिसे भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा स्थापित किया था और फंड भी दिया था. इसके शोधकर्ता इसी संस्थान के विकास वैभव और के.वी. रामास्वामी हैं.

हालांकि आजादी के बाद से भारत के राज्यों की सीमाएं कई बार बदली हैं, लेकिन वर्ष 2000 के बाद से केवल पांच राज्यों – उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और जम्मू और कश्मीर – का पुनर्गठन किया गया है.

इस अध्ययन ने इन पांच राज्यों में से तीन की पड़ताल की और लेखकों ने उनके विश्लेषण से जम्मू और कश्मीर और आंध्र प्रदेश को बाहर रखा क्योंकि उनकी कार्यप्रणाली के लिए लंबी अवधि के डेटा की आवश्यकता होती है और इन दोनों को पिछले एक दशक के भीतर ही पुनर्गठित किया गया है.

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अध्ययन ने साढ़े तीन दशकों (1980 से 2015 तक) में उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश के विभाजन के उनके सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) पर पड़े प्रभाव की जांच की गई.

इसमें आगे यह पता लगाने का प्रयास किया कि विभाजन का राज्यों के विकास पर क्या प्रभाव पड़ा और इसके लिए विभाजन के बाद इन राज्यों का अलग-अलग विश्लेषण करके और मूल, अविभाजित राज्यों – बशर्ते वे एक साथ रहते – के लिए काल्पनिक संख्या प्राप्त करने के बाद इनके आंकड़ों का मिलान किया.

साल 2000 में नए राज्यों के रूप में निकलने वाले तीन क्षेत्रों – बिहार से झारखंड, मध्य प्रदेश से छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड – के डेटा का 1994 के बाद से ही विश्लेषण किया गया था.

बिहार-झारखंड

अध्ययन में कहा गया है कि सामूहिक रूप से, बिहार की प्रति व्यक्ति आय (जीएसडीपी को जनसंख्या से विभाजित किए जाने पर प्राप्त संख्या) का ग्राफ 1980 और 1990 के दशक के दौरान एक सपाट रेखा जैसा था, जिसका अर्थ है कि विभाजन से पहले भी इस राज्य में पर्याप्त वृद्धि दर्ज नहीं की गई थी.

इसमें यह भी पाया गया कि बिहार – जिसे झारखंड और विभाजन के बाद के बिहार के आंकड़ों के साथ एक काल्पनिक संयुक्त राज्य के रूप में लिया गया था – इसके विकास के लिए बेहतर वर्ष 2000 में इसके विभाजन के लगभग पांच साल बाद शुरू हुए; तब तक इसकी विकास रेखा सपाट ही रही थी.

विभाजन के बाद इन राज्यों पर अलग- अलग रूप से विचार करने पर इस अध्ययन में पाया गया कि अलग होने के बाद बिहार का विकास तो स्थिर रहा था, लेकिन झारखंड को शुरुआत में मंदी का सामना करना पड़ा था.

झारखंड के मामले में इस अध्ययन में यह भी पाया गया कि राज्य बनने से पहले इस क्षेत्र की प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि अनियमित थी. लेकिन सीमित डेटा उपलब्ध होने के कारण, लेखक इस बारे में निश्चित रूप से कोई टिप्पणी करने में असमर्थ थे कि यह किन कारणों की वजह से था.

उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड

उत्तर प्रदेश का प्रक्षेपवक्र (ट्रजेक्टरी) भी बिहार के समान ही था – विभाजन से पहले सपाट विकास और विभाजन के पांच साल बाद एक काल्पनिक संयुक्त राज्य के रूप में बेहतर विकास.

विभाजन के बाद बने राज्यों पर अलग-अलग विचार करने पर, लेखकों की सांख्यिकीय कवायद ने उत्तर प्रदेश पर इस पुनर्गठन का कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं पाया. दूसरी ओर, उत्तराखंड ने अपने मूल राज्य से अलग होने के बाद उल्लेखनीय प्रदर्शन किया.


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मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़

मध्य प्रदेश के मामले में, विभाजित होने से पहले प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि बिहार की तरह सपाट नहीं थी, अपितु यह ऊपर की ओर बढ़ रही थी. हालांकि, इसके विभाजन के ठीक बाद, संयुक्त राज्य की प्रति व्यक्ति आय गिर गई, और बाद में फिर ऊपर उठी.

अलग हुए राज्यों के संदर्भ में, मध्य प्रदेश में विभाजन के बाद प्रति व्यक्ति आय गिर गई और फिर स्थिर हो गई. वहीं छत्तीसगढ़ को भी शुरू में मंदी का सामना करना पड़ा, लेकिन मप्र की तुलना में इसकी हालत जल्दी ठीक हो गयी.

विश्लेषण

कुल मिलकर यह अध्ययन इस बात की अरफ़ इशारा करता है कि विभाजन के 15 साल बाद भी, ‘संयुक्त राज्यों’ ने आर्थिक विकास में कोई उल्लेखनीय अंतर नहीं दिखाया.

इसमें कहा गया है, ‘इस उप-खंड में हमारे विश्लेषण के परिणाम बताते हैं कि जिस डेढ़ दशक की अवधि (2000 से 2015) पर हमने विचार किया है, उस दौरान ‘संयुक्त राज्यों’ ने कोई ‘असाधारण’ सकारात्मक, या नकारात्मक, विकास नहीं दिखाया.’

लेखकों का कहना है कि कुछ मामलों में प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि राजनीतिक परिवर्तनों के कारण भी हो सकती है और जरूरी नहीं कि यह पुनर्गठन का ही प्रभाव हो.

वे लिखते हैं, ‘बिहार का मामला, जो सकारात्मक, लेकिन सांख्यिकीय रूप से महत्वहीन है, राजनीतिक नेतृत्व में बदलाव के कारण प्रतीत होता है. इस बात के लिए और अधिक जांच की आवश्यकता है कि क्या राजनीतिक नेतृत्व में यह बदलाव पुनर्गठन के कारण हुआ? संयुक्त मध्य प्रदेश का उदाहरण यह सुझाव देने के लिए पर्याप्त नहीं है कि पुनर्गठन का कोई नकारात्मक प्रभाव होता है. यूपी का मामला भी सोच के इस ढांचे को तोड़ने में कामयाब होता नजर नहीं आ रहा है.’

एकाकी रूप से, यह अध्ययन छह नव निर्मित राज्यों के लिए अलग-अलग परिणाम पाता है, और इसलिए निश्चित रूप से यह नहीं कहा जा सकता कि विभाजन की वजह से सभी के लिए आर्थिक लाभ होता है.

विभाजन के बाद के मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के मामले में ‘मूल राज्य’ मध्य प्रदेश के विकास को अलग होने के बाद नुकसान उठाना पड़ा.

लेखक उत्तराखंड को यह कहते हुए एक अपवाद बताते हैं कि इसकी वृद्धि का श्रेय उद्योगों – जिनकी इस राज्य की अर्थव्यवस्था में हिस्सेदारी इसके गठन के बाद के दशक में दोगुनी हो गई थी – को दी जाने वाली छूटों और केंद्र सरकार से प्राप्त अतिरिक्त धन (इस राज्य को ‘विशेष श्रेणी’ का दर्जा दिया गया) को दिया जा सकता है.

लेखक आगे टिप्पणी करते हैं, ‘हम सुरक्षित रूप से यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि पुनर्गठन मूल राज्यों को उस तरह से प्रतिकूल रूप से प्रभावित नहीं करता है जैसा कि आमतौर पर माना जाता था. इसके अलावा, नव निर्मित राज्यों में आर्थिक विकास आमतौर पर इस तरह की घटनाओं से जुड़े प्रचार के आस-पास भी नहीं है.’

जटिल गतिकी

ऐसा नहीं है कि राज्यों को छोटी इकाइयों में बांटने की मांग अब खत्म हो गई है.

साल 2011 में, बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख और उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने इस राज्य को चार भागों में विभाजित करने का प्रस्ताव पारित किया था.

सालों से, भारत के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग राज्यों की मांग उठाई गई है, जैसे गुजरात में सौराष्ट्र, महाराष्ट्र में विदर्भ, असम में बोडोलैंड, उत्तरी पश्चिम बंगाल में गोरखालैंड आदि.

आईजीआईडीआर के इस अध्ययन का उद्देश्य नीति निर्माताओं को राज्यों के विभाजन के आर्थिक परिणामों के बारे में एक अंतर्दृष्टि प्रदान करना है, और इसमें कहा कि उन्हें पुनर्गठित करने की प्रक्रिया की जटिल गतिकी (कॉंप्लेक्स डाइनमिक्स) को समझने के लिए और अधिक शोध की आवश्यकता है.

इसमें कहा गया है, ‘हमारा विश्लेषण इसके सर्वोत्तम रूप में भी सिर्फ़ मध्यम अवधि में इसके औसत प्रभाव को कैप्चर करता है. क्षेत्रीय पुनर्गठन एक जटिल परिघटना है, और यह विभिन्न पहलुओं को प्रभावित कर सकता है. इसकी एक और अधिक व्यापक तस्वीर प्राप्त करने हेतु इन विशेषताओं को समझने के लिए और अधिक शोध की आवश्यकता है.’

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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