Monday, 24 January, 2022
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कश्मीर के दर्द, चीत्कार, असंतोष, टॉर्चर की असंख्य कहानियों का लेखा-जोखा है ‘लाल चौक’

कश्मीर पर असंख्य किताबें लिखी गईं लेकिन उनमें मौजूदा कश्मीर मौजूद नहीं था. वहां के लोगों की बात नहीं थी, आवाम की परेशानियों और मानवाधिकारों के हनन के इतने किस्से मौजूद नहीं थी. इस मायने में रोहिण कुमार की 'लाल चौक' काफी खास और अहमियत रखती है.

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भारत के लिए जम्मू-कश्मीर सियासी, कूटनीतिक, भावनात्मक और अंतर्राष्ट्रीय तौर पर हमेशा से महत्वपूर्ण बना रहा है. पूरा भारत जम्मू-कश्मीर को लेकर अपनी-अपनी समझ रखता है, एक नज़रिया रखता है, जो भले ही परसेप्शन पॉलिटिक्स का हिस्सा हो लेकिन वहां से एक जुड़ाव ज़रूर महसूस करता है.

1947 में मिली आज़ादी के दो महीने बाद तक भी जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं था. वहां के महाराजा हरि सिंह के दिमाग में एक स्वतंत्र देश की कल्पना थी, जो न तो पाकिस्तान के साथ जाना चाहते थे न ही भारत के साथ. लेकिन पाकिस्तानी सेना की शह पर हुए कबायली हमले ने हरि सिंह को एक तय समझौते के साथ भारत से जुड़ने के लिए मजबूर किया. यह तय समझौता था- अनुच्छेद-370.

जम्मू-कश्मीर की आवाम ने भारत के साथ अपने रिश्तों को इसी समझौते के आधार पर हमेशा जोड़े रखा लेकिन 5 अगस्त 2019 को इस अनुच्छेद-370 के हटने के बाद वहां की आवाम ने अपने को छला हुआ महसूस किया. भले ही भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान ये दावे करती रही कि जम्मू-कश्मीर की आवाम ने भारत के इस कदम का स्वागत किया है लेकिन प्रतिरोध की आवाज़ें भी सुनाई देने लगी थीं, जिसके मायने ये थे कि सारी आवाम इस कदम से पूरी तरह तो बिल्कुल भी खुश नहीं थी. दक्षिण कश्मीर के सौरा में हुई घटना इसका उदाहरण है.

जम्मू-कश्मीर को लेकर जो नज़रिया शेष भारत का है, उससे वहां की आवाम में नाराज़गी है. वो नहीं मानते कि उनकी बातों और परिस्थितियों को सही तौर से देश के बाकी लोगों ने समझा है. बल्कि वो अलग-थलग महसूस करते हैं. परसेप्शन पॉलिटिक्स, मिलिटेंट्स को लेकर सहानुभूति, घाटी में बढ़ते सैन्यीकरण को लेकर वहां के लोगों में गहरा रोष है, जिसे भारतीयों ने कभी समझने की कोशिश नहीं की. गौरतलब है कि घाटी दुनिया का सबसे ज्यादा सैन्यीकृत इलाका है.

जम्मू-कश्मीर के लोगों के इसी रोष, उनकी आकांक्षाओं, राजनीति से मोहभंग, मानवाधिकार हनन की असंख्य कहानियों, महिलाओं के साथ हुई नाइंसाफियों, टॉर्चर के साए में बीतती जिंदगियों को युवा स्वतंत्र पत्रकार रोहिण कुमार ने अपनी हालिया किताब ‘लाल चौक’ में दर्ज किया है.

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रोहिण कुमार की किताब जम्मू-कश्मीर के हजारों वर्ष के इतिहास को नहीं खंगालती है, उनकी परंपराओं को विस्तार से नहीं बताती है, घाटी में लंबे समय से बसने-उजड़ने की कहानियों को दर्ज नहीं करती है, बल्कि उनकी किताब जम्मू-कश्मीर के समकालीन समय को वहां की आवाम के नज़रिए से समझने और समझाने की एक ईमानदार कोशिश है.

किताब की भूमिका में लेखक लिखते हैं, ‘किताब कश्मीरियों की जिंदगियों में झांकने का एक मौका देगी कि कश्मीरी क्या सोचते-समझते हैं और क्या महसूस करते हैं. मैंने कश्मीरियों के फर्स्ट-हैंड नैरेटिव को किताब में तवज्जो दी है.’

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रोहिण कुमार की किताब ‘लाल चौक’


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‘परसेप्शन पॉलिटिक्स’

किताब की शुरुआत में लेखक आजादी के बाद जम्मू-कश्मीर किन हालातों में भारतीय गणराज्य का हिस्सा बना, उसे बताते हैं. वहीं कश्मीर को लेकर किस तरह की धारणाएं लोगों, सैन्य प्रतिष्ठानों में व्याप्त हैं, उन्हें भी उदाहरणों सहित बताया है.

जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय होने के बाद 1980 के आखिर तक वहां कमोबेश शांति बनी रही. हां ये जरूर है कि बीच-बीच में कुछ मुद्दों ने वहां की राजनीति को प्रभावित किया लेकिन आतंकवाद, मिलिटेंसी जैसी चुनौतियां उस दौर में नहीं थी.

मौजूदा कश्मीर जिस स्थिति में पहुंचा है उसका सबसे बड़ा कारण 1987 में हुए विधानसभा चुनाव में की गई धांधली है. लेखक कहते हैं, ‘1987 का चुनाव कश्मीर के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास का निर्णायक क्षण था. चुनावों में धांधली के आरोपों ने कश्मीरियों को आश्वस्त कर दिया कि भारत कश्मीरियों के राजनीतिक अधिकारों का सम्मान नहीं करता.’

लेखक कहते हैं, ‘उन दिनों कश्मीर में एक ही बात कही जाती थी- ‘बैलेट नहीं, अब बुलेट से होगा फैसला’.’

यानी कि कश्मीर के जो वर्तमान हालात हैं, उसे एक विधानसभा चुनाव में हुई गड़बड़ियों का हासिल कहा जा सकता है. उस घटना के बाद ही लोगों ने बंदूक उठाना शुरू कर दिया. लेकिन इससे इतर लेखक ने बीते दो दशकों में उन चार सालों को कश्मीर के लिए महत्वपूर्ण माना है, जिसने वहां की नई पीढ़ी को गढ़ा है. वो साल थे- 2008, 2010, 2016 और 2019.

2008 और 2010 में सामान्य तौर पर लोगों में विद्रोह की भावना जगी थी लेकिन सबसे बड़ा अंतर 2016 में बुरहान वानी की मौत के बाद हुआ. लेखक कहते हैं, ‘बुरहान का मिलिटेंसी में शामिल होना नब्बे के दशक और मध्यांतर में पैदा हुए कश्मीरी बच्चों के किशोरावस्था में झांकने का एक बेहतरीन उदाहरण है.’

और 2019 में अनुच्छेद-370 ने तो राज्य के भूगोल और पहचान को ही बदलकर रख दिया.


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‘टॉर्चर’ के साये में गुज़रती ज़िदगियां

‘लाल चौक ‘ किताब की विश्वसनीयता इसी बात में है कि लेखक ने जम्मू-कश्मीर में काफी लंबा समय बिताकर वहां के तमाम स्टेक होल्डर्स और आवाम से लंबी बातचीत की है. वहां के आवामी मुद्दों को समझने की कोशिश की है बिना किसी पूर्वाग्रह के. लेखक ने भारतीय राष्ट्रवादी दृष्टिकोण को किनारे कर के कश्मीर को जाना है, उसके सितम की कहानियों को जिया है और उसे बिना लाग-लपेट के ज्यों का त्यों लिखने की हिम्मती कोशिश की है.

वो लिखते हैं, ‘कश्मीर का इतिहास और हमारी कंडीशनिंग ही ऐसी हुई है कि कश्मीर को हम राष्ट्रीय सुरक्षा के लेंस के इतर देख ही नहीं पाते. हम यह सोच भी नहीं पाते कि सरकार या सुरक्षाबलों के दावे मिथ्या प्रचार मात्र भी हो सकते हैं. लोगों तक मानवाधिकार हनन की कहानियां पहुंची ही नहीं हैं, जैसे पहुंचनी चाहिए थीं.’

लेखक उन परिवारों के दरवाजे पर अपनी दस्तक देते हैं जिन्हें सैन्य बलों और राज्य पुलिस द्वारा लगातार टॉर्चर किया गया, कॉर्डन और सर्च ऑपरेशन (कासो) के बहाने उन्हें उत्पीड़ित किया गया. कई ऐसे लोग भी थे जो पहले मिलिटेंट संगठनों से जुड़े थे लेकिन बाद में उन्होंने अपने हथियार डाल दिए और शांति से गुजर बसर करने लगे, लेकिन सत्ता प्रतिष्ठानों ने उन्हें कभी आराम की जिंदगी मयस्सर नहीं होने दी. उन्हें सताया गया, इंटेरोगेशन कैंपों में महीनों तक रखा गया, पीटा गया और कईयों को लापता कर दिया गया. इसी तरह की सच्चाइयां खोजी पत्रकार जोसी जोसेफ ने अपनी किताब द साइलेंट कू में भी लिखी है.

इसी तरह के एक फर्स्ट हैंड नैरेटिव में एक कश्मीरी शख्स के हवाले से लेखक ने लिखा है, ‘आज घाटी में हर एक घर किसी न किसी तरह से कश्मीर में सुरक्षाबलों के उत्पीड़न से प्रभावित हैं. बच्चों का बचपन खत्म हो गया है. बच्चे अपने घरों में देखते हैं, जुल्म सहते हैं और पत्थर फेंकने को उकसाए जाते हैं.’


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कश्मीरी महिलाओं की मुखरता

लेखक ने एक दिलचस्प बात लिखी है कि घाटी में बुरहान वानी की मौत के बाद लोगों का मिलिटेंट्स के जनाजों में जाने की संख्या में काफी इजाफा हुआ. उस घटना के बाद ही पत्थरबाजी की घटनाओं में तेजी आई. यहां तक कि इन जनाजों में महिलाएं भी बड़ी संख्या में नज़र आने लगी.

लेखक ने पत्थरबाजी करने वाली महिलाओं से बात कर उनकी मनोदशा जानने की कोशिश की और वो पुरुषों के बरक्स इन घटनाओं में क्यों शामिल होने लगी, इसके मनोविज्ञान को तलाशा. उन्होंने पाया कि जनाजों में जाना कश्मीरी महिलाओं के पितृसत्ता से मुक्ति तलाशने का प्रयास थे. हालांकि कई जानकारों के हवाले से उन्होंने ये भी लिखा कि महिलाएं 1990 और उससे पहले भी घाटी में सक्रिय रही हैं लेकिन मौजूदा तकनीक ने उन्हें पूरे विश्व के सामने मुखरता से पेश किया है.

वो लिखते हैं, ‘मिलिटेंट्स के जनाजों में महिलाओं की हिस्सेदारी बताती है कि महिलाएं कश्मीर में क्रांति की वाहक बन रही हैं. यह न सिर्फ सैन्य शक्ति के खिलाफ बगावत है बल्कि सांस्कृतिक और धार्मिक पितृसत्ता के खिलाफ भी.’


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गहराता असंतोष

कश्मीरी लोगों के नज़रिए को शामिल कर लिखी गई ये किताब कई पूर्वाग्रहों को तोड़ती है जो भारत के लोगों के मन में दशकों से जड़ें जमाए हुए हैं. इसमें न केवल वहां की दर्द भरी आवाज़ें हैं, चीत्कारें हैं बल्कि असंतोष का एक गहराता समंदर भी है, जिसे पाटने की कोशिश न वहां के सियासी राजदानों ने की न ही दिल्ली में बैठे हुक्मरानों ने.

किताब उस नैरेटिव से सीधा मुकाबला करती है जो भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान दिल्ली में बैठकर गढ़ते हैं. लेखक ने उन नैरेटिव की सच्चाई जानने के लिए ज़मीनी आवाजों और हकीकतों का सहारा लिया है और वो इस काम में सफल होते दिखे हैं. उनका काम मज़बूत सत्ता से टकराने का है, पीड़ितों की आवाज़ को बुलंद करने का है, पूर्वाग्रहों को तोड़ने का है, एक ईमानदार नज़रिया पैदा करने का काम है.

कश्मीर पर असंख्य किताबें लिखी गईं लेकिन उनमें मौजूदा कश्मीर मौजूद नहीं था. वहां के लोगों की बात नहीं थी, आवाम की परेशानियों और मानवाधिकारों के हनन के इतने किस्से मौजूद नहीं थी. इस मायने में रोहिण कुमार की ‘लाल चौक ‘ काफी खास और अहमियत रखती है.

अंतिम में जम्मू-कश्मीर के महत्वपूर्ण नेताओं के साथ लिए साक्षात्कारों ने इस किताब को और मजबूत किया है. हालांकि लेखक ने किताब की शुरुआत में कहा जरूर है कि वो किसी भी तरह के ओपिनियन देने से बचे हैं लेकिन वो पूरी तरह से इससे बच नहीं सके. फिर भी सताए हुए लोगों पर ईमानदारी और साहस से लिखना ही क्या कोई कम बड़ी बात है.

एक अच्छे और गंभीर विषय पर लिखी किताब का संपादन भी दुरुस्त किए जाने की जरूरत थी लेकिन इससे विषय कहीं प्रभावित नहीं हुआ है.

आखिर में सैयद ज़ीशान जयपुरी के चंद अल्फाज़, जिसे लेखक ने किताब की शुरुआत में जगह दी है-

इक दिन डल का पानी
इज्ज़त का गाना गाएगा
झेलम अपनी गहगाई को
बहते-बहते कह जाएगा
इक दिन ऊंचे पर्वत का दिल
उड़ती चिड़िया बहलाएगी
और कोयल सच की खुशबू पर
इंसाफ़ का गाना गाएगी

(रोहिण कुमार की किताब ‘लाल चौक’ को हिंद युग्म प्रकाशन ने छापा है)


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