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Wednesday, 4 March, 2026
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भागवत ने खेती के लिए ‘भारत केंद्रित’ दृष्टिकोण का आह्वान किया

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नागपुर, 20 जून (भाषा) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने सोमवार को खेती के जैविक और प्राचीन भारतीय तरीकों के महत्व को रेखांकित किया तथा कहा कि इस तरह के स्थानीय ज्ञान को बिना पड़ताल किए खारिज करना गलत होगा।

भागवत राष्ट्रीय पशु चिकित्सा विज्ञान अकादमी (भारत), नयी दिल्ली और महाराष्ट्र पशु एवं मत्स्य विज्ञान विश्वविद्यालय, नागपुर द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित वार्षिक ‘दीक्षांत-सह-वैज्ञानिक सम्मेलन’ को संबोधित कर रहे थे।

केंद्रीय मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्री पुरुषोत्तम रूपाला कार्यक्रम में सम्मानित अतिथि थे। उन्हें, भागवत और राज्य के मंत्री सुनील केदार के साथ मानद फेलोशिप की उपाधि से सम्मानित किया गया।

इस मौके पर भागवत ने कहा कि खेती और पशुपालन के भारतीय तरीके सबसे प्राचीन हैं तथा आधुनिक विज्ञान के कुछ दुष्प्रभाव भी होते हैं लेकिन हमारे प्राचीन ज्ञान और विधियों का कोई ऐसा दुष्प्रभाव नहीं हैं।

उन्होंने कहा, ‘स्थानीय ज्ञान के उपयोग और अनुसंधान में लचीलेपन पर ध्यान देना चाहिए। स्थानीय ज्ञान को अवैज्ञानिक करार देकर अस्वीकार करना गलत है। आप इसकी पड़ताल करने के बाद इसे अस्वीकार कर सकते हैं, यदि यह सही नहीं है तो आप इसे खारिज करने के लिए स्वतंत्र हैं।’

भागवत ने कहा, ‘दूसरा, मशीनीकृत खेती दीर्घ काल तक नहीं चलेगी। आज भी, 65 प्रतिशत किसान छोटी जोतों की खेती करते हैं और मशीनीकृत खेती उनके लिए बहुत फायदेमंद नहीं है। उर्वरक सहित अन्य कारणों से, वह (किसान) कर्ज में डूब जाता है और आत्महत्या कर लेता है। उन्हें सतत खेती सिखाई जानी चाहिए, जिसे वे समझ सकते हैं।’

उन्होंने खेती की ‘भारत केंद्रित’ पद्धति पर जोर दिया, जो देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) को बढ़ा सकती है। उन्होंने कहा कि 1700 ई. तक देश की अर्थव्यवस्था पहले नंबर पर थी। उन्होंने कहा, ‘उस समय हमारी कृषि अर्थव्यवस्था थी और उद्योग एवं वाणिज्य भी कृषि से संबंधित थे। हमें इसे (जीडीपी में वृद्धि) हासिल करने के लिए भारत केंद्रित दृष्टिकोण की आवश्यकता होगी।’

भागवत ने कहा कि सततता के लिए सार्वजनिक भागीदारी की जरूरत है, क्योंकि सरकार सभी विभागों को धन उपलब्ध नहीं करा सकती। उन्होंने पशुपालन संबंधी अधिकांश जानकारी अंग्रेजी में होने का भी जिक्र किया और कहा, ‘नयी शिक्षा नीति में तकनीकी विषयों में स्थानीय भाषा के इस्तेमाल पर जोर दिया गया है। हमें इस ज्ञान को स्थानीय भाषाओं में फैलाने की जरूरत है।’

रूपाला ने सहकारी क्षेत्र के जरिए आत्मनिर्भर बनने के साथ ही मिट्टी संरक्षण के तरीकों पर भी बात की। उन्होंने कहा, ‘हमें देशी गायों के गोबर से मिट्टी संरक्षण की अपनी पुरानी पद्धति पर वापस लौटना होगा। मुझे लगता है कि गाय और पशुपालन विभाग के लिए अच्छे दिन आने वाले दिनों में वापस आएंगे तथा और ये हमारी अर्थव्यवस्था और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।’’

रूपाला ने कार्यक्रम में आरएसएस प्रमुख भागवत की मौजूदगी की सराहना करते हुए कहा कि स्वयंसेवक होना प्रतिबद्धता, समर्पण और सेवा का प्रमाण है।

भाषा अविनाश दिलीप

दिलीप

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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