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Friday, 24 April, 2026
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विकास संतुलन के साथ बाघों की व्यवहार्य आबादी रखने का लक्ष्य: बाघ परियोजना प्रमुख

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नयी दिल्ली, पांच अप्रैल (भाषा) देश में ‘बाघ परियोजना’ के एक अप्रैल को 50 साल पूरे करने के मद्देनजर परियोजना प्रमुख एस पी यादव ने बुधवार को कहा कि भारत का लक्ष्य विकास और वन्यजीव संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखते हुए बाघों की व्यवहार्य संख्या बनाकर रखना है जो वैज्ञानिक रूप से आंकी गयी उनकी आवास क्षमता पर आधारित हो।

अवर वन महानिदेशक यादव ने कहा कि बेहतर प्रौद्योगिकी और संरक्षण तकनीकों के कारण बाघों का शिकार काफी हद तक कम हुआ है, लेकिन यह अब भी उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है।

भारत ने बाघ संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए एक अप्रैल, 1973 को बाघ परियोजना की शुरुआत की थी। शुरुआत में इसके दायरे में 18,278 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले नौ बाघ अभयारण्य थे। इस समय 75,000 वर्ग किलोमीटर (देश के भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 2.4 प्रतिशत) से अधिक क्षेत्र में फैले 53 बाघ अभयारण्य इसमें आते हैं।

भारत में करीब 3,000 बाघ हैं और यह संख्या दुनियाभर में इस वन्यजीव की संख्या से 70 प्रतिशत से अधिक है। देश में यह संख्या छह प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से बढ़ रही है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नौ अप्रैल को कर्नाटक के मैसुरु में बाघ परियोजना के 50 वर्ष पूरे होने के मौके पर आयोजित एक समारोह में बाघों की ताजा गणना के आंकड़े जारी करेंगे।

वह ‘अमृत काल’ में बाघ संरक्षण के लिए सरकार के दृष्टिकोण को भी जारी करेंगे।

यादव ने ‘पीटीआई-भाषा’ को दिए साक्षात्कार में कहा, ‘‘बहुत अहम प्रगति हुई है। दुनियाभर में इस तरह की शायद ही कोई योजना हो जिसका प्रभाव इतना अधिक रहा हो।’’

बाघ परियोजना के अगले 50 वर्ष के लक्ष्य के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, ‘‘लक्ष्य बाघों के पर्यावासों में उनकी व्यवहार्य और सतत संख्या बनाकर रखने का है जिसमें इन पर्यावासों में बाघों के रहने की क्षमता का वैज्ञानिक तरीके से आकलन किया गया हो।’’

उन्होंने कहा, ‘‘मैं इसकी कोई संख्या का आकलन नहीं कर रहा। हम इसी रफ्तार से बाघों की आबादी नहीं बढ़ा सकते क्योंकि इससे उनका मानव जाति के साथ संघर्ष बढ़ेगा।’’

यादव ने कहा कि सरकार बाघ संरक्षण कार्यक्रम के तहत उनके सक्षम पर्यावासों पर ध्यान केंद्रित कर रही है और उनकी क्षमता के हिसाब से अभयारण्यों का सक्रियता से प्रबंधन कर रही है।

उन्होंने कहा, ‘‘कई अभयारण्यों में बाघों की संख्या बहुत कम है। इनमें पश्चिम बंगाल का बक्सा बाघ अभयारण्य और ओडिशा के सतकोसिया एवं सिमलीपाल हैं। मध्य प्रदेश का सतपुड़ा बाघ अभयारण्य भी इनमें शामिल है। जिन अभयारण्यों में बाघों की संख्या उनके रहने की क्षमता से कम या अधिक है, वहां सक्रियता से प्रबंधन की जरूरत है।’’

यादव ने कहा, ‘‘हमें इन बाघों को उन इलाकों में भेजना होगा जहां उनके शिकार के लिए अच्छी संख्या में जानवर हों और उनके रहने की अच्छी संभावनाएं हों। हमारे देश में बाघ संरक्षण के लिए भविष्य की रणनीति कुछ ऐसी रहेगी।’’

राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) के सदस्य सचिव यादव ने कहा कि विकास और वन्यजीव गतिविधियों के बीच संतुलन बनाने की जरूरत है।

एनटीसीए के आंकड़े दिखाते हैं कि भारत में 2012 से 2020 के बीच 857 बाघों की मौत हो गयी, वहीं 193 शिकार के कारण मारे गये। बाद में इस तरह की घटनाओं में काफी कमी आई और 2018 में यह संख्या 34 थी जो 2020 में घटकर केवल सात रह गयी।

यादव ने कहा कि बाघों के लिए उनके पर्यावास कम होने या खत्म होने के अलावा शिकार भी एक चुनौती है।

उन्होंने कहा, ‘‘शिकार इसलिए नहीं होता क्योंकि हमारे देश में इसकी मांग है। यह उपभोक्ता देशों में मांग से संचालित है। प्रौद्योगिकी, बेहतर निगरानी, गश्त और संरक्षण प्रणालियों की वजह से भारत में शिकार के मामलों में काफी कमी आई है। लेकिन यह अब भी एक खतरा है।’’

क्या भारत के वन्यजीव संरक्षण के प्रयासों से वनों पर आश्रित लोगों के साथ न्याय हुआ है, इस प्रश्न के जवाब में अधिकारी ने कहा कि जनता के सहयोग और सहिष्णुता की वजह से ही बाघों, एशियाई हाथियों, गैंडों तथा एशियाई शेरों का सफल संरक्षण संभव हुआ है।

भाषा वैभव नेत्रपाल

नेत्रपाल

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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