लखनऊ: उत्तराखंड के ज्योतिर्मठ के 46वें पीठाधीश्वर यानी “शंकराचार्य” स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती एक बार फिर चर्चा में हैं. इस बार वजह यह है कि उन्होंने आरोप लगाया है कि आदित्यनाथ सरकार ने उन्हें रविवार को मौनी अमावस्या के शुभ दिन प्रयागराज में त्रिवेणी संगम पर पवित्र स्नान करने से रोका और उनके साथ आए लोगों के साथ बदसलूकी की.
अविमुक्तेश्वरानंद को पुलिस ने रोका था. बताया गया कि उनके साथ 200–300 लोगों का बड़ा समूह था और उनके पास ज़रूरी अनुमति नहीं थी.
सोमवार रात प्रयागराज प्रशासन ने उन्हें नोटिस जारी किया. नोटिस में प्रयागराज माघ मेले के दौरान उनके शिविर में लगाए गए बोर्ड पर खुद को “ज्योतिषपीठ का शंकराचार्य” बताने और प्रचार करने पर आपत्ति जताई गई.
नोटिस में सुप्रीम कोर्ट में लंबित अपील का हवाला देते हुए कहा गया कि अभी तक किसी भी धार्मिक नेता को आधिकारिक तौर पर ज्योतिषपीठ का शंकराचार्य घोषित नहीं किया गया है.
मंगलवार को अविमुक्तेश्वरानंद ने इस नोटिस को लेकर आदित्यनाथ सरकार को चुनौती दी.
उन्होंने मीडिया से कहा, “न प्रशासन, न यूपी का मुख्यमंत्री, न देश का राष्ट्रपति तय करेगा कि कौन शंकराचार्य है. ये शंकराचार्य ही तय करेंगे कि ज्योतिषपीठ का शंकराचार्य कौन है. किसी और को यह अधिकार नहीं है. मैं निर्विवाद शंकराचार्य हूं.”
उन्होंने रविवार को मौनी अमावस्या के दिन हुई अव्यवस्था के लिए भी योगी प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया. पुलिस के लाठीचार्ज के बाद अविमुक्तेश्वरानंद ने खाना-पानी छोड़ दिया और त्रिवेणी मार्ग पर अपने शिविर के बाहर धरने पर बैठ गए. उनके शिष्य भी इस विरोध में शामिल हुए.
यह पहली बार नहीं है जब अविमुक्तेश्वरानंद ने बीजेपी सरकार को निशाना बनाया हो. पिछले साल कुंभ के दौरान भगदड़ के बाद उन्होंने योगी सरकार को जिम्मेदार ठहराया था. तब उन्होंने कहा था कि अगर योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने रहते हैं तो ऐसी घटनाएं दोबारा होंगी.
इससे पहले 2024 में अयोध्या में राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में आमंत्रित किए जाने के बावजूद उन्होंने इसमें हिस्सा नहीं लिया था और अधूरे मंदिर में समारोह कराने के फैसले की आलोचना की थी. उन्होंने कहा था कि अधूरे मंदिर का उद्घाटन धर्म के खिलाफ है और लोकतांत्रिक देश में धर्मगुरुओं की अहम भूमिका होती है.

उनकी आलोचना सिर्फ उत्तर प्रदेश सरकार तक सीमित नहीं रही है. पहले भी वे नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर गाय संरक्षण के लिए ठोस कदम नहीं उठाने का आरोप लगा चुके हैं.
बीजेपी सरकारों की खुली आलोचना और अपने बेबाक बयानों की वजह से सोशल मीडिया पर उनके आलोचक उन्हें “एंटी-बीजेपी” कहते हैं, लेकिन यह धारणा उनके अतीत को नज़रअंदाज़ करती है. आध्यात्मिक जीवन में आने से पहले अविमुक्तेश्वरानंद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) से जुड़े छात्र नेता रह चुके हैं.
एबीवीपी से जुड़ा अतीत और मोदी समर्थक रुख
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का जन्म 1969 में उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ में एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था. उनका मूल नाम उमाशंकर उपाध्याय है. उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई प्रतापगढ़ में की और आगे की पढ़ाई के लिए गुजरात चले गए.
इसी दौरान (1980 से 1986 के बीच) गुजरात में उनका संपर्क ब्रह्मचारी राम चैतन्य से हुआ, जो स्वामी कर्पात्री जी महाराज के शिष्य थे और धर्म व राजनीति—दोनों में गहरी रुचि रखते थे.
राम चैतन्य के प्रोत्साहन पर उमाशंकर उपाध्याय ने संस्कृत की पढ़ाई में और गहराई से रुचि ली. इसके बाद वे उच्च शिक्षा के लिए वाराणसी लौट आए. वहां उन्होंने संस्कृत व्याकरण, वेद, पुराण, उपनिषद, आयुर्वेद और अन्य धार्मिक ग्रंथों का गहन अध्ययन किया.
बाद में उन्होंने वाराणसी की प्रसिद्ध सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्री और आचार्य की डिग्री हासिल की. पढ़ाई के साथ-साथ वे छात्र राजनीति में भी सक्रिय रहे और 1994 में विश्वविद्यालय में छात्रसंघ का चुनाव जीता.
उनके करीबी सहयोगी शैलेन्द्र ने दिप्रिंट से कहा, “स्वामी जी एबीवीपी के सक्रिय सदस्य थे और 1994 में उसके समर्थन से उन्होंने छात्र चुनाव लड़ा था. सोशल मीडिया पर कुछ लोग झूठे दावे फैलाते हैं कि वे कांग्रेस समर्थक हैं या कभी कांग्रेस से जुड़े रहे हैं. यह पूरी तरह गलत है. असल में वे एबीवीपी के समर्पित कार्यकर्ता थे और नरेंद्र मोदी के पक्के समर्थक थे. 2014 में उन्होंने खुलकर मोदी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनने का समर्थन किया था.”
शैलेन्द्र ने यह भी कहा कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उनकी सरकार गाय संरक्षण को लेकर ठोस कदम उठाने में “नाकाम” रही, जबकि यह शंकराचार्य की मुख्य चिंता रही है.
इसके उलट, शैलेन्द्र ने आरोप लगाया कि “मोदी सरकार के दौरान बीफ निर्यात में काफी बढ़ोतरी हुई, जिससे स्वामी जी बहुत नाराज़ हुए.”
उन्होंने कहा कि यह मुद्दा बार-बार उठाया गया, लेकिन जो सरकार खुद को अक्सर ‘हिंदुओं की सरकार’ बताती है, उसने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की.
उनके सहयोगी ने कहा, ‘सोशल मीडिया पर कुछ लोग झूठे दावे फैलाते हैं कि वे कांग्रेस समर्थक हैं या कभी पार्टी से जुड़े रहे हैं. यह पूरी तरह गलत है. असल में वे एबीवीपी के समर्पित कार्यकर्ता थे और नरेंद्र मोदी के पक्के समर्थक थे. 2014 में उन्होंने खुलकर मोदी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनने का समर्थन किया था.’
शंकराचार्य बनने को लेकर विवाद
अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद, उमाशंकर उपाध्याय ने 1990 के दशक के आखिर में संन्यास लिया और अपना नाम अविमुक्तेश्वरानंद रखा.
अविमुक्तेश्वरानंद ने 2006 में स्वामी स्वरूपानंद से दीक्षा ली. इसके बाद से वे उत्तराखंड स्थित ज्योतिर्मठ की सभी धार्मिक और अन्य गतिविधियों की देखरेख करते रहे. 2022 में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद, अविमुक्तेश्वरानंद को उत्तराखंड के ज्योतिर्मठ का नया शंकराचार्य बनाया गया.
2022 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें ज्योतिर्मठ का नया शंकराचार्य बनाए जाने की प्रक्रिया पर रोक लगा दी.
15 अक्टूबर 2022 को जस्टिस बी.आर. गवई और बी.वी. नागरत्ना की पीठ ने यह आदेश उस समय दिया, जब सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि पुरी के गोवर्धन मठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद ने एक हलफनामा दाखिल किया है, जिसमें कहा गया है कि ज्योतिष पीठ के नए शंकराचार्य के रूप में अविमुक्तेश्वरानंद की नियुक्ति को मंजूरी नहीं दी गई थी.
आवेदन को स्वीकार करते हुए पीठ ने कहा, “यह आवेदन प्रार्थना खंड के अनुसार स्वीकार किया जाता है.”

सुप्रीम कोर्ट उस याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने झूठा दावा किया है कि उन्हें शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने ज्योतिर्मठ का उत्तराधिकारी शंकराचार्य नियुक्त किया था.
याचिका में आगे आरोप लगाया गया कि अदालत के सामने चल रही कार्यवाही को जानबूझकर बेअसर करने की कोशिश की गई, ताकि एक “अयोग्य और अपात्र व्यक्ति” बिना अधिकार के इस पद को संभाल सके.
अविमुक्तेश्वरानंद के करीबी सहयोगियों का कहना है कि हिंदू विद्वानों का मानना है कि कोई भी पीठ शंकराचार्य के बिना नहीं रह सकती. इसलिए अविमुक्तेश्वरानंद शंकराचार्य बने रहे, क्योंकि वे स्वरूपानंद सरस्वती के प्रमुख शिष्य थे और अन्य किसी भी शंकराचार्य ने इस पर आपत्ति नहीं जताई.
बीजेपी सरकार की आलोचना
अविमुक्तेश्वरानंद लगातार बीजेपी सरकार के खिलाफ रुख अपनाने के कारण ज्यादा चर्चा में रहे हैं.
सितंबर 2022 में अविमुक्तेश्वरानंद ने वाराणसी में काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के निर्माण के लिए कई पुराने मंदिरों को तोड़े जाने का कड़ा विरोध किया था.
2023 में, उन्होंने यह दावा करके विवाद खड़ा कर दिया कि उत्तराखंड के केदारनाथ मंदिर से 228 किलो सोना गायब हो गया है और इसे “सोना घोटाला” बताया. उन्होंने दिल्ली में केदारनाथ मंदिर की एक प्रतिकृति (रेप्लिका) बनाए जाने का भी विरोध किया और कहा कि असली मंदिर हिमालय में ही होना चाहिए.
अविमुक्तेश्वरानंद को 2016 में वाराणसी में पुलिस के लाठीचार्ज का भी सामना करना पड़ा था. उस समय राज्य में समाजवादी पार्टी की सरकार थी. वे गंगा में मूर्ति विसर्जन रोकने के फैसले के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे. उस समय बीजेपी ने लाठीचार्ज की आलोचना की थी.
बीजेपी के एक नेता ने कहा, “अगर हम उनके समर्थन में बोलते हैं, तो पार्टी के भीतर कई लोग नाराज़ होंगे, क्योंकि उनकी टिप्पणियां बीजेपी की आलोचना करती रही हैं, लेकिन अगर हम उनके खिलाफ बोलते हैं, तो इसे हिंदू-विरोधी बताया जा सकता है, क्योंकि वे शंकराचार्य हैं, जो हिंदू धर्म के सबसे बड़े धार्मिक पदों में से एक हैं.”
जून 2024 में, जब बीजेपी ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में अपने पहले भाषण में राहुल गांधी द्वारा कथित तौर पर हिंदुओं को हिंसक बताए जाने को लेकर उन पर हमला किया, तब अविमुक्तेश्वरानंद राहुल गांधी के बचाव में आए. उन्होंने कहा कि राहुल के बयान को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है.
उस समय संत ने पत्रकारों से कहा, “हमने राहुल गांधी का पूरा भाषण ध्यान से सुना. उन्होंने साफ कहा था कि हिंदू धर्म हिंसा का समर्थन नहीं करता.”
हालांकि, एक साल बाद उन्होंने प्राचीन संस्कृत ग्रंथ मनुस्मृति का कथित रूप से “अपमान” करने के आरोप में राहुल गांधी को हिंदू धर्म से बहिष्कृत कर दिया.
मनुस्मृति को सनातन धर्म की आधारशिला बताते हुए उन्होंने दावा किया कि राहुल गांधी ने लोकसभा में ऐसे बयान दिए, जो इस ग्रंथ का अपमान हैं.
लेकिन प्रयागराज माघ मेले से जुड़े मौजूदा विवाद के दौरान कांग्रेस स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन में सामने आई है. पार्टी नेता पवन खेड़ा ने आरोप लगाया कि योगी आदित्यनाथ सरकार ने हिंदू संत को निशाना बनाया, क्योंकि उन्होंने कई मौकों पर बीजेपी के फैसलों, जिनमें प्राण-प्रतिष्ठा समारोह भी शामिल है, की आलोचना की थी.
समर्थन देने वाले एक और राजनीतिक नेता उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव रहे. उन्होंने सोशल मीडिया पर उनके पक्ष में पोस्ट किए और फोन कर उन्हें इस मामले में अपना समर्थन भी दिया.
अंतरराष्ट्रीय हिंदू परिषद के अध्यक्ष प्रवीण तोगड़िया ने भी अविमुक्तेश्वरानंद का समर्थन किया और “हिंदू बटेगा तो कटेगा” का नारा दिया.
उन्होंने कहा कि जैसे गोरखनाथ पीठ हिंदुओं के लिए पूजनीय है, वैसे ही शंकराचार्य भी पूजनीय हैं. उन्होंने शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, जो गोरखनाथ पीठ के पीठाधीश्वर भी हैं, से मुलाकात कर आपसी बातचीत से मुद्दा सुलझाने की अपील की.
इस बीच, बीजेपी नेताओं ने चुप्पी साधे रखी है और अविमुक्तेश्वरानंद या इस विवाद पर कोई सार्वजनिक बयान नहीं दिया है.
उत्तर प्रदेश बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने दिप्रिंट को बताया कि पार्टी ने इस मुद्दे पर चुप रहने का फैसला किया है.
नेता ने कहा, “अगर हम उनके समर्थन में बोलते हैं, तो पार्टी के भीतर कई लोग नाराज़ होंगे, क्योंकि उनकी टिप्पणियां बीजेपी की आलोचना करती रही हैं. लेकिन अगर हम उनके खिलाफ बोलते हैं, तो इसे हिंदू-विरोधी बताया जा सकता है, क्योंकि वे शंकराचार्य हैं, जो हिंदू धर्म के सबसे बड़े धार्मिक पदों में से एक हैं.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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