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Tuesday, 16 July, 2024
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राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह के बीच जानिए राजनीतिक सुर्खियों के साथ शंकराचार्यों का इतिहास

शंकराचार्यों का प्रभाव अक्सर राजनीति में महसूस किया गया है, जिसमें राम मंदिर से संबंधित मामले भी शामिल हैं. कुछ कांग्रेस के करीबी रहे हैं और उनके भाजपा के साथ संबंध हमेशा अच्छे नहीं रहे हैं.

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नई दिल्ली: 22 जनवरी को अयोध्या में होने वाली राम लला की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा पर चारों प्रमुख दिशाओं के शंकराचार्यों ने असहमति जताई है.

दो धार्मिक नेताओं — पुरी और ज्योतिष पीठ (जोशीमठ) के शंकराचार्य — ने समारोह के पहलुओं की आलोचना की है और कहा है कि वे इसमें शामिल नहीं होंगे. दूसरी ओर, श्रृंगेरी और द्वारका के शंकराचार्यों ने बिना यह कहे कि वे व्यक्तिगत रूप से इसमें शामिल होंगे समारोह का समर्थन किया है.

विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार ने शुक्रवार को पीटीआई-भाषा को बताया कि चारों शंकराचार्यों में से कोई भी इस समारोह में शामिल नहीं होगा.

चार मठों के प्रमुख, जो दार्शनिक आदि शंकराचार्य से अपनी मठवासी वंशावली जोड़ते हैं, हिंदू धर्म के सबसे प्रमुख धार्मिक नेताओं में से हैं.

शंकराचार्यों का प्रभाव भारतीय राजनीति में अक्सर महसूस किया गया है, जिसमें 1990 के दशक के बाद से राम मंदिर से संबंधित मामले भी शामिल हैं. उनमें से कुछ कांग्रेस के करीबी रहे हैं और कुछ के भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ रिश्ते हमेशा अच्छे नहीं रहे हैं.

लेखक और राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई के अनुसार, हिंदी पट्टी पर भाजपा की पकड़ को देखते हुए समारोह से उनकी संभावित अनुपस्थिति का हिंदू जनता पर क्या प्रभाव पड़ सकता है, यह बहस का विषय है.


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मध्यकालीन जड़ें

“कोई व्यक्ति रस्सी को सांप समझने की भूल कर सकता है…सांप की मौजूदगी तब तक बनी रहती है जब तक रस्सी की बारीकी से जांच नहीं की जाती. संसार की तुलना सर्प से और ब्रह्म की तुलना रस्सी से की जा सकती है. जब हम सच्चा ज्ञान प्राप्त करते हैं, तो हम पहचानते हैं कि संसार ब्रह्म की अभिव्यक्ति मात्र है,” यह दुनिया की उपस्थिति और परम वास्तविकता के बीच संबंध के लिए आदि शंकराचार्य की सादृश्यता है, जिसे अपनी किताब हिंदूइज़्म में लेखक के. एम. सेन ने उद्धृत किया है.

आधुनिक इतिहासकार शंकराचार्य को लगभग आठवीं शताब्दी ई.पू. का बताते हैं और उन्हें उपनिषदों की टिप्पणियों और एकल दार्शनिक कार्यों से लेकर भक्ति भजनों तक के ग्रंथों का लेखक मानते हैं. उन्होंने अद्वैत या गैर-द्वैतवाद में अद्वैत दर्शन का समर्थन किया, जिसने ब्रह्म (सर्वोच्च चेतना) के साथ आत्मा की पहचान पर जोर दिया.

अपनी किताब द इटरनल रिलिजन: ग्लिम्पसेस ऑफ हिंदूइज़्म में विद्वान और कांग्रेस नेता करण सिंह लिखते हैं, “शंकराचार्यों ने ज्ञान के माध्यम से प्राप्त मुक्ति के सर्वोच्च महत्व पर जोर दिया जो तपस्या और ध्यान से पैदा होता है.”

पारंपरिक कथाओं में शंकराचार्य के बारे में बहुत कुछ कहा गया है, जिन्हें अद्वैत परंपरा में केंद्रीय व्यक्ति के रूप में देखा जाता है. ऐसा माना जाता है कि उनका जन्म कलाडी गांव (अब केरल के एर्नाकुलम जिले में) में हुआ था, वे कम उम्र में संन्यासी बन गए और उपमहाद्वीप की लंबाई और चौड़ाई की यात्रा की, ब्राह्मणवादी पुनरुत्थान का नेतृत्व किया और बहस में बौद्ध भिक्षुओं को हराया.

मध्यकाल में एक परंपरा सामने आई कि शंकराचार्य ने अपनी यात्राओं के दौरान, उपमहाद्वीप के उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम में एक-एक करके चार मठ स्थापित किए थे. इन्हें पीठम या मठ कहा जाता है और उनके प्रमुख शंकराचार्य की उपाधि धारण करते हैं.

चार मठ हैं: पुरी (ओडिशा) में पूर्वाम्नाय श्री गोवर्धन पीठम, श्रृंगेरी (कर्नाटक) में दक्षिणाम्नाय श्री शारदा पीठम, द्वारका (गुजरात) में पश्चिमाम्नाय श्री शारदा पीठम और जोशीमठ (उत्तराखंड) में उत्तराम्नाय श्री ज्योतिष पीठम

वर्तमान में चार शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती (जोशीमठ) निश्चलानंद सरस्वती (पुरी), भारती तीर्थ (श्रृंगेरी) और सदानंद सरस्वती (द्वारका) हैं.

पांचवीं मठ संस्था, तमिलनाडु के कांची कामकोटि पीठम, का भी दावा है कि इसकी स्थापना आदि शंकराचार्य ने की थी, हालांकि श्रृंगेरी मठ इस पर विवादित है. फिर भी, यह 20वीं शताब्दी के अधिकांश समय तक सुर्खियों में रहा, जिसका मुख्य कारण चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती का करिश्मा था, जिन्होंने 1907 से 1994 तक मठ का नेतृत्व किया था.


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शंकराचार्य और राजनीति

मठ मध्यकाल से ही राजनीतिक शक्ति और संरक्षण का केंद्र रहे हैं. उदाहरण के लिए श्रृंगेरी मठ एक समय विजयनगर के शासकों के साथ घनिष्ठता से जुड़ा था. आधुनिक समय में राजनेता अक्सर शंकराचार्यों के पास जाते रहे हैं और उनसे परामर्श करते रहे हैं. विशेष रूप से कांची मठ के चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती हर युग में प्रभावशाली व्यक्ति थे, उन्होंने महात्मा गांधी से लेकर इंदिरा और राजीव गांधी तक कई नेताओं से मुलाकात की थी.

एक अन्य उदाहरण स्वरूपानंद सरस्वती हैं, जिन्होंने 2022 में अपनी मृत्यु तक दशकों तक द्वारका और ज्योतिष पीठम दोनों के प्रमुख के रूप में कार्य किया, उन्होंने अक्सर अपनी विवादास्पद राय सार्वजनिक रूप से व्यक्त की और कांग्रेस नेताओं, विशेष रूप से नेहरू-गांधी परिवार के करीबी थे.

स्वरूपानंद के एक करीबी सहयोगी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “कांग्रेस, भाजपा और सभी राजनीतिक दलों के लोग स्वामीजी (स्वरूपानंद) से मिलने आते थे. उन्होंने राजनीति में कभी भी खुलकर किसी का समर्थन नहीं किया, लेकिन राजीव गांधी के समय में वह उनके बहुत करीब थे और उनसे बहुत स्नेह करते थे.”

1980 में संजय गांधी की मृत्यु के बाद, स्वरूपानंद ने कथित तौर पर इंदिरा गांधी से मुलाकात की और उनसे कहा कि राजीव को पायलट बनना बंद कर देना चाहिए. जब उन्होंने पूछा कि उन्हें इसके बजाय क्या करना चाहिए, तो शंकराचार्य ने कहा कि उन्हें खुद को देश की सेवा के लिए समर्पित करना चाहिए.

स्वरूपानंद के निधन के बाद उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए एक संदेश में प्रियंका गांधी वाड्रा ने यह भी कहा कि उन्होंने 1990 में उनके परिवार के लिए गृह प्रवेश पूजा करवाई थी.

यह वही साल था जब चन्द्रशेखर प्रधानमंत्री बने और उन्होंने टी.एन. शेषन को मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) के पद पर नियुक्त करने का फैसला लिया. सीईसी के रूप में शेषन का कार्यकाल अभूतपूर्व रहा, उनकी आत्मकथा के अनुसार, वह पहले इस बात को लेकर असमंजस में थे कि क्या पद को स्वीकार किया जाए या नहीं और उन्होंने कांची शंकराचार्य से परामर्श करने के बाद ही ऐसा किया.

कुछ साल बाद, तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए श्रृंगेरी मठ के प्रमुख भारती तीर्थ के नेतृत्व में एक ट्रस्ट स्थापित करने की अपनी योजना में सभी शंकराचार्यों को शामिल करने का प्रयास किया. हालांकि, स्वरूपानंद कथित तौर पर यह मांग करते हुए पीछे हट गए कि सरकार अपनी भागीदारी बंद कर दे और शंकराचार्यों को मंदिर निर्माण में पूर्ण स्वतंत्रता दे. पुरी के निश्चलानंद ने भी ऐसा ही किया और राव की योजना धरी की धरी रह गई.

स्वरूपानंद कई मुद्दों पर संघ परिवार के भी कट्टर आलोचक थे, जिसमें राम मंदिर परियोजना का “राजनीतिकरण” भी शामिल था — एक परियोजना जिसके साथ वह खुद लंबे समय से जुड़े हुए थे और जब नरेंद्र मोदी 2014 में वाराणसी लोकसभा सीट के लिए प्रचार कर रहे थे, तो शंकराचार्य ने कथित तौर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत से “हर हर मोदी” नारे के बारे में शिकायत की और इसे “भगवान शिव का अपमान” और व्यक्ति पूजा कहा.

स्वरूपानंद और निश्चलानंद ने 2021 में मोदी सरकार के तीन विवादास्पद कृषि कानूनों की आलोचना करते हुए कहा कि कानून बनाने से पहले किसानों को भरोसे में लिया जाना चाहिए था.

हालांकि, उससे एक साल पहले, निश्चलानंद ने मोदी सरकार के एक कदम — नागरिकता (संशोधन) अधिनियम — के पक्ष में भी बात की थी. उन्होंने कहा कि भारत, नेपाल और भूटान को हिंदू राष्ट्र घोषित किया जाना चाहिए. हालांकि, उन्होंने कहा था कि अगर पहले उचित विचार-विमर्श किया गया होता तो कानून के खिलाफ विरोध प्रदर्शन से बचा जा सकता था.


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प्राण प्रतिष्ठा

2021 में स्वरूपानंद — जिन्होंने पहले कहा था कि 2020 में राम मंदिर के भूमि पूजन के लिए तय किया गया समय अशुभ था — ने मंदिर के निर्माण को पूरा करने के लिए गठित ट्रस्ट पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा, “इसमें एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो प्राण प्रतिष्ठा कर सके.”

अब, 22 जनवरी को होने वाली प्राण प्रतिष्ठा में निश्चलानंद और अविमुक्तेश्वरानंद — जो 2022 में उनकी मृत्यु के बाद ज्योतिष पीठ में स्वरूपानंद के उत्तराधिकारी बने — कहा है कि वे इस समारोह में शामिल नहीं होंगे.

जबकि निश्चलानंद ने कहा कि वह अपने पद की “गरिमा के प्रति सचेत” हैं और पूछा कि “मोदी जी द्वारा मूर्ति का उद्घाटन और स्पर्श करने के दौरान वह क्या करेंगे”, अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि प्राण प्रतिष्ठा शास्त्रों के अनुसार नहीं होगी — क्योंकि सबसे बड़ी समस्या यह है कि मंदिर अभी अधूरा है.

अविमुक्तेश्वरानंद ने यह भी कहा कि सभी चार शंकराचार्य इस कार्यक्रम में शामिल नहीं होंगे, लेकिन द्वारका या श्रृंगेरी मठों की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है.

हालांकि, श्रृंगेरी मठ ने प्राण प्रतिष्ठा के लिए समर्थन व्यक्त करते हुए एक बयान जारी किया है — लोगों को शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया है — और उन दावों का खंडन किया है कि शंकराचार्य भारती तीर्थ ने समारोह पर नाराज़गी व्यक्त की थी.

द्वारका मठ ने भी शंकराचार्य सदानंद सरस्वती की ओर से एक बयान जारी कर इस समारोह का समर्थन किया है और उम्मीद जताई है कि इसे वेदों और शास्त्रों के अनुसार आयोजित किया जाएगा.

शनिवार को पुरी शंकराचार्य ने स्पष्ट किया कि समारोह को लेकर चारों शंकराचार्यों के बीच “कोई मतभेद नहीं” है, साथ ही इस बात पर भी जोर दिया कि इसे शास्त्रों के अनुसार किया जाना चाहिए.

समारोह में शंकराचार्यों की संभावित अनुपस्थिति के बारे में दिप्रिंट से बात करते हुए लेखक और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर हेरंब चतुर्वेदी ने कहा, “उनके आशीर्वाद के बिना की गई कोई भी प्राण प्रतिष्ठा अधूरा होगी. उन्हें वहां सबसे ऊंचे आसन पर बैठाना होगा. वे राजाओं से भी ऊपर, सबसे ऊंचे स्थान पर विराजमान होते थे.”

वृन्दावन के बांके बिहारी मंदिर के पुजारी छोटू गोस्वामी के अनुसार, “शंकराचार्य धार्मिक जगत में सबसे वरिष्ठ पदों पर हैं. वे हमारे बीच सर्वोच्च हैं. उद्घाटन को लेकर कुछ दिक्कतें हैं, लेकिन ये तारीख का मामला हो सकता है. हम भी सोच रहे थे कि अगर यह राम नवमी (इस साल अप्रैल में) पर होता तो बेहतर होता, लेकिन तब तक आचार संहिता लागू हो जाएगी.”

किदवई को लगता है कि शंकराचार्यों की अनुपस्थिति बीजेपी को ज्यादा परेशान नहीं करेगी. उन्होंने कहा, “वे बातचीत को प्रभावित करने की स्थिति में नहीं हैं. भाजपा के पास हिंदुत्व के चैंपियन के रूप में अपने चेहरे हैं. वो धार्मिक नेताओं के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखते हैं, लेकिन जैसे ही वे मैदान से हटते हैं, भाजपा उनके खिलाफ हो जाती है.”

उन्होंने कहा, “राजनीतिक रूप से कहें तो, शंकराचार्यों के पास कोई प्रभावशाली शक्ति नहीं है क्योंकि भाजपा का हिंदी पट्टी पर प्रभाव है. मध्य प्रदेश, गुजरात और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में बीजेपी की ही सरकार है.”

किदवई ने कहा, “ये धार्मिक नेता (शंकराचार्य) उन लोगों पर हुक्म चलाना चाहते हैं जो कहते हैं कि वे (भाजपा की तरह) हिंदू धर्म का चेहरा हैं, लेकिन भाजपा बहुत चतुर है और समझती है कि शंकराचार्य की घोषणाएं और दुनिया के विचार बहुत अलग हैं. जातिगत मैट्रिक्स में शंकराचार्यों का प्रभाव ‘उच्च’ जातियों के बीच प्रमुख है और इससे भाजपा को मदद नहीं मिलती.”

(संपादन : फाल्गुनी शर्मा)

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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