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Sunday, 25 January, 2026
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दिल्ली में प्रदूषण संकट गहराने के साथ सांस की समस्या वाले रोगियों की संख्या 20-30 प्रतिशत बढ़ी

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नयी दिल्ली, 13 दिसंबर (भाषा) दिल्ली के चिकित्सकों ने कहा है कि यहां लगातार उच्च प्रदूषण स्तर के कारण अस्पतालों में श्वसन संबंधी मरीजों की संख्या में 20-30 प्रतिशत की वृद्धि देखी जा रही है, जिनमें कई पहली बार के मामले और युवा शामिल हैं।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि वर्तमान प्रदूषण संकट एक गंभीर जन स्वास्थ्य खतरा है, न कि मौसमी असुविधा।

पिछले कई वर्षों की सर्दियों की तरह, इस बार भी दिल्ली में जहरीली हवा के कारण दम घुट रहा है। ज्यादातर दिन प्रदूषण का स्तर 300 से ऊपर दर्ज किया जा रहा है। परिणामस्वरूप, अस्पतालों में सांस लेने में तकलीफ, सीने में जकड़न और लगातार खांसी से पीड़ित मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।

दिल्ली के कई चिकित्सकों ने कहा कि पिछले कुछ सप्ताहों में लंबे समय तक उच्च प्रदूषण स्तर के कारण अधिक श्वसन संबंधी परेशानियों से जूझने वाले रोगियों की संख्या में बहिरंग विभागों और आपातकालीन कक्षों में 20-30 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।

ओखला के फोर्टिस अस्पताल के फेफड़ा रोग विशेषज्ञ डॉ. अवि कुमार ने कहा, ‘‘सर्दी, खांसी, सांस लेने में तकलीफ और सीने में जकड़न की शिकायत लेकर आने वाले मरीजों की संख्या में स्पष्ट वृद्धि हुई है, जिसका सीधा कारण हमारे आसपास की खराब वायु गुणवत्ता है। पिछले हफ्तों की तुलना में यह वृद्धि लगभग 15-20 प्रतिशत है।’’

उन्होंने कहा कि चिंता की बात लक्षणों की गंभीरता और निरंतरता है।

उन्होंने कहा, ‘‘कई मरीजों के लक्षण नियमित इलाज के बावजूद ठीक नहीं हो रहे हैं। उन्हें स्टेरॉयड की अधिक खुराक और लंबे समय तक दवा लेने की आवश्यकता पड़ रही है। एक और खास बात यह है कि नए मरीजों (ऐसे लोग जिन्हें पहले कभी सांस लेने में कोई समस्या नहीं हुई थी) की संख्या बढ़ रही है और बाहर खेलने वाले बच्चे भी इससे प्रभावित हो रहे हैं।’’

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, सूक्ष्म प्रदूषण कण फेफड़ों में गहराई तक प्रवेश करते हैं और तेजी से रक्तप्रवाह में मिल जाते हैं, जिससे व्यापक सूजन और समग्र स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ते हैं।

डॉ. कुमार ने कहा, ‘‘पिछले कुछ हफ्तों में, सांस लेने में तकलीफ, घरघराहट और अस्थमा या सीओपीडी के लक्षणों में वृद्धि वाले मरीजों की संख्या में 25-30 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।’’

पूर्वी दिल्ली के एक सरकारी अस्पताल में सलाहकार चिकित्सक डॉ. रितु अग्रवाल ने कहा, ‘‘प्रदूषण का एक कम ज्ञात प्रभाव यह है कि यह श्वसन मांसपेशियों को कमजोर कर देता है जो फेफड़ों में हवा के आने-जाने में मदद करती है। तंत्रिका क्षति से पीड़ित मधुमेह रोगियों में, आराम की स्थिति में भी सांस लेने में कठिनाई महसूस होती है।’’

फेफड़ा रोग विशेषज्ञ डॉ. अनिल गोयल के अनुसार, कई मरीज मुख्य सड़कों, निर्माण क्षेत्रों और औद्योगिक क्षेत्रों के प्रदूषण प्रभावित इलाकों से आ रहे हैं।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ आम गलतफहमियों के प्रति भी आगाह कर रहे हैं। पश्चिमी दिल्ली के एक निजी क्लिनिक में कार्यरत ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. नेहा वर्मा ने कहा, ‘‘भाप लेने से अस्थायी राहत मिल सकती है, लेकिन यह फेफड़ों को जहरीले प्रदूषकों से नहीं बचाती। लोगों को केवल घरेलू उपचारों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए और लक्षण बने रहने पर चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।’’

भाषा राजकुमार संतोष

संतोष

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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