नई दिल्ली: दक्षिण अंडमान के घने जंगलों की गहराई में, जहां समुद्र घने मैंग्रोव से घिरा मिलता है, ओंगे जनजाति के लोग सदियों से शिकारी-संग्राहक के रूप में रहते आए हैं. नंगे पैर जानवरों का पीछा करते हुए, शहद इकट्ठा करते हुए, और आधुनिक दुनिया से लगभग पूरी तरह अलग-थलग रहकर गुज़ारा करते हुए. आज, उनका यह लाइफस्टाइल छोटे-छोटे, लेकिन महत्वपूर्ण तरीकों से बदलने लगी है.
राजा और झाज, दोनों ही अपनी 20 की उम्र में हैं, और एकांत में पले-बढ़े हैं. ओंगे जनजाति के सदस्य होने के नाते—जो दुनिया के सबसे छोटे मूल निवासी समुदायों में से एक है और जिसकी आबादी लगभग 250 है—उन्होंने अपने शुरुआती साल जंगलों में शिकार करते हुए और डुगोंग (तुगोंग) क्रीक के किनारों पर भोजन की तलाश करते हुए बिताए. अपने समुदाय के कई अन्य लोगों की तरह, उन्होंने भी कभी कोई औपचारिक नौकरी नहीं की थी, न ही कोई बैंक खाता खोला था, और न ही उन्हें कभी व्यवस्थित स्कूली शिक्षा मिली थी.
लेकिन 2025 में, उनकी ज़िंदगी ने एक अप्रत्याशित मोड़ ले लिया. उन्होंने अपने धनुष-बाण छोड़कर खाकी वर्दी और पुलिस के जूते पहन लिए, और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में होम गार्ड स्वयंसेवकों के रूप में सक्रिय फील्ड गश्त में शामिल होने वाले ‘विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूह’ (PVTG) के पहले सदस्यों में से एक बन गए.
यह बदलाव जितना प्रतीकात्मक है, उतना ही व्यावहारिक भी है. वही सहज वृत्ति, जिसने कभी उन्हें जानवरों का पता लगाने में मदद की थी, अब पुलिस के साथ मिलकर जंगल में गश्त करने में उनका मार्गदर्शन करती है. द्वीपों में तैनात एक पुलिस अधिकारी ने कहा, “जंगल ही उनका घर है. इलाके की उनकी समझ बेजोड़ है.”
इस साल की शुरुआत में, उनकी यह जानकारी बेहद अहम साबित हुई. 16 जनवरी को, जब राजा और झाज घने ‘पांगा मुंडी’ जंगल में गश्त कर रहे थे, तो उन्हें कुछ असामान्य चीज़ दिखाई दी. दूसरों के लिए, वह महज़ आम रेत जैसी दिख रही थी. लेकिन उन्हें वह संदिग्ध लगी.
वे रुके, ज़मीन खोदी, और रेत तथा सूखी पत्तियों के नीचे दबे हुए प्लास्टिक के पैकेट बाहर निकाले. उन पैकेटों के अंदर लगभग 7 किलोग्राम उच्च-गुणवत्ता वाला मेथामफेटामाइन (नशीला पदार्थ) भरा हुआ था.
दक्षिण अंडमान की पुलिस अधीक्षक श्वेता के. सुगाथन ने कहा, “घने जंगल वाले इलाके में रेत और सूखी पत्तियों के नीचे छिपाकर रखे गए इन नशीले पदार्थों का पता लगाने और उन्हें बरामद करने में उन्होंने एक निर्णायक भूमिका निभाई.” उन्होंने इसके लिए उनकी “तेज़ नज़र” और उस ज़मीन के बारे में उनकी गहरी जानकारी को श्रेय दिया.
उनकी इस भूमिका के लिए, 24 फरवरी को पुलिस महानिदेशक द्वारा उन्हें सम्मानित किया गया और प्रत्येक को 10,000 रुपये का नकद पुरस्कार दिया गया. यह राशि उस समुदाय के लिए बहुत बड़ी है, जहाँ नकद आय मिलना एक दुर्लभ बात है.

सभ्यताओं को जोड़ना
जंगल में रहने वालों से वर्दीधारी स्वयंसेवक बनने तक का उनका सफ़र महीनों पहले शुरू हुआ था, जब अंडमान और निकोबार पुलिस ने आठ आदिवासी पुरुषों को होम गार्ड के तौर पर भर्ती किया था, जिनमें चार ओंगे भी शामिल थे. यह अपने आप में एक पहली घटना थी. PVTG (विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूह) के सदस्यों ने सक्रिय पुलिसिंग में, भले ही सीमित दायरे में, एक व्यवस्थित भूमिका में कदम रखा था.
उन्हें प्रशिक्षण देने का मतलब था दो अलग-अलग सभ्यताओं के बीच एक पुल बनाना. हट बे पुलिस स्टेशन में, प्रशिक्षकों ने बुनियादी बातों पर ध्यान केंद्रित किया. जैसे वर्दी कैसे पहननी है, बूट के फीते कैसे बांधने हैं, वरिष्ठों को सलामी कैसे देनी है, और लाठी कैसे संभालनी है. एक अधिकारी ने कहा, “हमारे सामने चुनौती यह थी कि लोगों के एक आदिम समूह को आधुनिक अनुशासन कैसे सिखाया जाए.”
यह प्रशिक्षण एक महीने तक चला. हालांकि ये नए रंगरूट हिंदी बहुत अच्छी तरह बोलते थे, लेकिन उनमें से ज़्यादातर पढ़-लिख नहीं सकते थे. फिर भी, उनकी जिज्ञासा और उत्साह सबसे अलग थे. अधिकारी ने आगे कहा, “वे अपनी ज़मीन की रक्षा करना चाहते थे. शिकारियों से, और नशीले पदार्थों से.”
उनकी भूमिकाएं स्पष्ट रूप से परिभाषित हैं. वे पारंपरिक पुलिसिंग के कामों में शामिल नहीं होते, जैसे कि जांच-पड़ताल या क़ानून-व्यवस्था बनाए रखने के कर्तव्य. इसके बजाय, वे जंगलों में गश्त करते हैं. ऐसे इलाक़ों में जहाँ उनका पारंपरिक ज्ञान उन्हें वह बढ़त देता है, जहाँ तक आधुनिक पुलिसिंग की पहुंच नहीं है.
ओंगे लोगों के लिए, यह कदम सिर्फ़ सेवा के बारे में नहीं है, बल्कि अपने अस्तित्व को बचाए रखने के बारे में भी है. होम गार्ड स्वयंसेवकों के तौर पर, वे हर महीने 25,000 रुपये से ज़्यादा कमाते हैं. यह एक स्थिर आय है जिससे उनके परिवारों को स्वास्थ्य सेवाएं, दवाएं और शिक्षा जैसी सुविधाएं मिल पाती हैं. ऐसी सुविधाएं जो अब तक उनकी पहुंच से हमेशा बाहर रही थीं.
“इस पैसे से उन्हें एक स्थिर और सुरक्षित माहौल मिलता है.” एक अधिकारी ने कहा, “उनके परिवारों को अब उन सुविधाओं का लाभ मिल रहा है, जो उन्हें पहले उपलब्ध नहीं थीं.”
अब तक, अलग-अलग जनजातियों के आठ लोगों को ज़मीन पर तैनात किया गया है. पुलिस का कहना है कि वे कई दूसरे आदिवासी समूहों और लोगों के लिए आगे आने और अपनी ज़मीन की रक्षा करने की प्रेरणा हैं.
इस पहल को अंडमान आदिम जनजाति विकास समिति (AAJVS) का समर्थन हासिल है, जो इन द्वीपों में रहने वाले मूल समुदायों के कल्याण के लिए काम करती है. अधिकारियों का कहना है कि इस कार्यक्रम को बहुत सावधानी से आगे बढ़ाया जा रहा है, ताकि एकीकरण और संरक्षण के बीच के नाज़ुक संतुलन को बनाए रखा जा सके.
“आदिवासी समूहों को यह समझाना एक चुनौती है कि उनकी ज़िंदगी वैसी ही रहेगी, उनकी संस्कृति में कोई दखल नहीं दिया जाएगा.” अधिकारी ने कहा, “उन्हें हमेशा यह डर रहता है कि मुख्यधारा में शामिल होने से सब कुछ बदल सकता है.”
पूरे अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में, मूल समुदाय बाहरी दुनिया के साथ संपर्क के अलग-अलग चरणों में हैं. जहां निकोबारी जैसे समूह काफी हद तक मुख्यधारा में शामिल हो चुके हैं—जिनके सदस्य पुलिस अधिकारी और डॉक्टर के तौर पर काम कर रहे हैं—वहीं सेंटिनलीज़ और शोम्पेन जैसे दूसरे समूह अभी भी काफी हद तक दुनिया से कटे हुए हैं.
ओंगे जनजाति इन दोनों के बीच कहीं ठहरती है. वे अपनी परंपराओं से जुड़े हुए हैं, लेकिन साथ ही आधुनिक दुनिया के साथ भी सावधानी से तालमेल बिठा रहे हैं.
इस बीच, पुलिस के मुताबिक, नॉर्थ सेंटिनलीज़ जैसी कुछ जनजातियां ऐसी भी हैं जो पूरी तरह से दुनिया से कटी हुई हैं, अलग-थलग हैं, और उन तक पहुँचने का कोई रास्ता नहीं है. अधिकारी ने आगे बताया, “यहां तक कि प्रशासन भी उन तक नहीं पहुंच सकता, और अगर कोई ऐसा करने की कोशिश करता है, तो वे तीर-कमान और दूसरे हथियारों से उन पर हमला कर देते हैं.”
यहां तक कि शोम्पेन जनजाति का भी मुख्यभूमि से कोई संपर्क नहीं रहा है. “पुलिस धीरे-धीरे, उनकी सभ्यता में कोई दखल दिए बिना, उनसे संपर्क बनाने की कोशिश कर रही है.”
राजा और झाज के लिए, यह संतुलन अब हर रोज देखने को मिलता है. एक तरफ वे जंगल के रास्ते हैं जिन्हें वे हमेशा से जानते आए हैं, और दूसरी तरफ वे गश्त के रास्ते हैं जिन पर अब वे वर्दी पहनकर चलते हैं. उनके हर कदम में एक खामोश बदलाव छिपा है. एक ऐसा बदलाव जो, एक तरफ तो बदलते हालात के दबाव को दिखाता है, और दूसरी तरफ, अपनी ही शर्तों पर खुद को ढाल रहे लोगों के मज़बूत इरादों को भी दर्शाता है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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