Monday, 27 June, 2022
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चर्च और ईसाइयों पर हो रहे हमलों के बीच, कर्नाटक सरकार पारित करेगी धर्मांतरण विरोधी विधेयक

विवादास्पद धर्मांतरण विरोधी विधेयक राज्य विधानसभा के शीतकालीन सत्र में पेश किया जाना है, जो सोमवार से बेलगावी में शुरू हो रहा है.

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बेंगलुरु: कर्नाटक का शीतकालीन विधानसभा सत्र सोमवार से शुरू हो रहा है, जिसमें विवादास्पद धर्मांतरण विरोधी विधेयक को एक ऐसे समय में पेश किया जाना है जब राज्य भर में ईसाइयों और चर्चों पर हमलों की बाढ़ सी आ गई है.

इनमें से सबसे नवीनतम हमला पिछले सप्ताह के अंत में हुआ जब शनिवार को बेलगावी के एक चर्च में एक शख्स तलवार के साथ घुस गया और उसने पादरी को धमकाने की कोशिश की. सीसीटीवी कैमरे में दर्ज हुई इस घटना का वीडियो अब वायरल हो गया है.

हालांकि चर्च के प्रतिनिधियों ने स्थानीय पुलिस में शिकायत भीदर्ज करवाई थी मगर अभी तक किसी की गिरफ्तारी होना बाकी है.

बेलगावी पुलिस के आयुक्त (कमिश्नर) डॉ त्यागराजन ने द प्रिंट को बताया, ‘इस मामले का आरोपी अस्थिर दिमाग वाला लगता है. चर्च प्रशासन की ओर से शिकायत की गई है. आरोपी बार-बार अपराध करने वाला लगता है. अभी हम आरोपी का पता लगाने की प्रक्रिया में हैं.’

इस बीच, रविवार को हिंदुत्व कार्यकर्ताओं के एक समूह ने कोलार के श्रीनिवासपुरा में अवैध धर्मांतरण का आरोप लगाते हुए कुछ ईसाई मिशनरियों को धार्मिक पुस्तकें और पर्चे बांटने से रोक दिया. इन पुस्तकों और प्रचार सामग्री को आग के हवाले कर दिया गया और समुदाय को उनके धर्म को बढ़ावा देने के खिलाफ चेतावनी दी गई. बाद में पुलिस को हस्तक्षेप कर तनाव को शांत करना पड़ा और इस मुद्दे को ‘सौहार्दपूर्ण ढंग से हल हुआ’ मान लिया गया.

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हालांकि मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई और गृह मंत्री अरागा ज्ञानेंद्र दोनों ने जोर देकर कहा है कि नया कानून कथित तौर पर जबरन धर्मांतरण के खिलाफ पहले से मौजूद कानून को और मजबूत करेगा.

बोम्मई ने रविवार को हुबली में संवाददाताओं से बात करते हुए कहा, ‘यह विधेयक केवल लालच दिखाकर धर्मांतरण किये जाने के कार्य को रोकने के लिए है.’ उन्होंने यह भी कहा कि कानून विभाग ओडिशा द्वारा पारित इसी तरह के कानून का अध्ययन कर रहा है.

बोम्मई ने कहा, ‘इसके मसौदे को कैबिनेट के सामने विचार के लिए रखा जाएगा और अगर उसकी मंजूरी मिलती है, तो इसे बेलगावी सत्र में पेश किया जाएगा.’


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विपक्षी दल, अल्पसंख्यक इसके खिलाफ आंदोलित हो रहे हैं

एक तरफ जहां भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली कर्नाटक सरकार इस धर्मांतरण विरोधी विधेयक पर जोर दे रही हैं, वहीँ विपक्षी दलों के साथ-साथ अल्पसंख्यक समुदायों, विशेषकर ईसाइयों, ने भी इसका कड़ा विरोध किया है.

कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष डी.के. शिवकुमार ने बार-बार दोहराया है कि यह विधेयक अल्पसंख्यक विरोधी है.

शिवकुमार ने शुक्रवार को बेंगलुरु में संवाददाताओं से कहा, ‘बलात, लालच देकर या फुसलाने के माध्यम से होने वाले गैरकानूनी धर्मांतरण को रोकने के लिए पहले से ही एक कानून मौजूद है. फिर नए कानून की क्या जरूरत है? यह केवल अल्पसंख्यकों को परेशान करने और उन पर हो रहे हमलों को और प्रोत्साहित करने के लिए है.’

कर्नाटक के ईसाई समुदाय का आरोप है कि जब से मुख्यमंत्री ने राज्य में धर्मांतरण विरोधी कानून लाने की बात कही है, तभी से धार्मिक अल्पसंख्यकों, चर्चों और प्रार्थना सभाओं पर हमले बढ़ गए हैं.

बेंगलुरू डायोसीज के आर्कबिशप और कर्नाटक रीजनल कैथोलिक बिशप्स काउंसिल के अध्यक्ष रेव डॉ पीटर मचाडो ने 4 दिसंबर को जारी एक प्रेस बयान में कहा था कि, ‘जबरन धर्मांतरण का मुद्दा काफी बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया जाने वाला विषय है. भाजपा के भी कई नेताओं ने ईसाई स्कूलों में पढ़ाई की है और उन्होंने अपने इलाज के लिए भी कई बार ईसाई अस्पतालों का चुनाव किया गया है. मगर उनमें से किसी का भी जबरदस्ती धर्मांतरण नहीं कराया गया था.’

यह बयान भाजपा के कई नेताओं द्वारा इस तरह के आरोप लगाए जाने की पृष्ठभूमि में आया है कि राज्य भर में हिंदुओं को धर्म परिवर्तन के लिए लालच दिया जा रहा है.

होसदुर्ग से भाजपा विधायक गुलिहट्टी शेखर ने सितंबर में हुए पिछले विधानसभा सत्र के दौरान सबसे पहले इस तरह के आक्रामक रवैये की शुरुआत की थी. अल्पसंख्यक और पिछड़ा वर्ग कल्याण समिति का नेतृत्व करते हुए उन्होंने राज्य के सभी चर्चों, पादरियों और मिशनरियों के सर्वेक्षण का आदेश दिया था.

शेखर ने तब दिप्रिंट से कहा था, ‘पिछड़े तबके एवं गरीब परिवारों के लोगों को धर्मांतरण के लिए फुसलाया जा रहा है. 2008 की शुरुआत में ही जब मैं राज्य में मंत्री था तो मेरे समुदाय (लम्बानी) के लोगों को बहला-फुसलाकर उनका धर्म परिवर्तित किया जा रहा था. मुझे इस मामले में दखल देने के लिए धमकी भी दी गई. अब ऐसे मामले और बढ़ गए हैं.’

लेकिन विधानसभा में उनकी टिप्पणियों के बाद से, हिंदुत्ववादी संगठनों द्वारा प्रार्थना सभाओं पर हमला करने, चर्चों के अंदर घुसकर विरोध करने और ईसाइयों द्वारा की जा रही प्रार्थना को बाधित करने के कई उदाहरण सामने आए हैं.

अक्टूबर में, विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के सदस्य हुबली स्थित एक चर्च में घुस गए थे और उन्होंने प्रार्थना सभा के दौरान हिंदू प्रार्थना गीत, भजन आदि गाए थे.

हमलों का सिलसिला

फिर 19 अक्टूबर को हुबली के एक पादरी सोमू अवराधी को भाजपा विधायक अरविंद बेलाड के नेतृत्व में हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद एक दलित व्यक्ति का धर्म परिवर्तन करवाने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था.

इसके बाद, 28 नवंबर को, बजरंग दल के कुछ सदस्यों ने बलात धर्मांतरण का आरोप लगाते हुए हसन जिले के बेलूर स्थित एक चर्च में धावा बोल दिया. ईसाई धर्म के अनुयायियों, जिनमें से ज्यादातर महिलाएं थीं, का बजरंग दल के पुरुष सदस्यों से लड़ते हुए एक वीडियो काफी वायरल हुआ था. हफ्तों के बाद भी इस मामले में कोई प्राथमिकी दर्ज करने अथवा किसी की गिरफ्तारी की कार्यवाही नहीं हुई है. मामले को ‘सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझा विवाद’ के रूप में बंद कर दिया गया है.

इससे पहले, 7 नवंबर को, कट्टरपंथी हिंदूवादी संगठन श्री राम सेना हिंदुस्तान के सदस्यों ने बेलगावी जिले के मराठा कॉलोनी में आयोजित एक प्रार्थना सभा के दौरान एक पादरी और ईसाई भक्तों को अंदर ही बंद कर दिया था.

इस मामले में पादरी के खिलाफ ही एक प्राथमिकी भी दर्ज की गई थी, जबकि प्रार्थना सभा को बाधित करने वालों को किसी तरह का दुष्परिणाम नहीं भुगतना पड़ा. ईसाई समुदाय का आरोप है कि यह अब एक ‘नियम’ सा बनता जा रहा है.

इस बारे में बेलगावी पुलिस के आयुक्त डॉ त्यागराजन ने दिप्रिंट को बताया, ‘प्राथमिकी दर्ज होने के तुरंत बाद पादरी को जमानत मिल गई थी. लेकिन प्रार्थना सभा को बाधित करने वालों के खिलाफ हमें कोई शिकायत नहीं मिली थी. इसी वजह से उनके खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं किया गया है.’

उन्होंने ईसाई समुदाय के इन आरोपों से भी इनकार किया कि पुलिस ने उन्हें बेलगावी में विधायी सत्र समाप्त होने तक कोई भी प्रार्थना सभाएं नहीं करने के लिए कहा है.

मगर जे.ए. बेंगलुरु आर्चडायोसीज के प्रवक्ता कंथराज ने पुलिस के दावों को खारिज किया.

उन्होंने दिप्रिंट को बताया, ‘इस बारे में कोई लिखित आदेश तो नहीं दिया गया था, लेकिन हमारे समुदाय को अपनी ‘स्वयं की सुरक्षा और हित’ के लिए प्रार्थना सभा आयोजित करना बंद करने के लिए कहा गया था.‘ वे कहते हैं,’कानून हम सभी को अपने धर्म को मानने और उसका अनुपालन करने की अनुमति देता है लेकिन यहां तो हमें अपनी प्रार्थना सभाओं को ही रोक देने के लिए कहा जा रहा है.’

रेव डॉ. पीटर मचाडो ने भी पिछले हफ्ते बेंगलुरु में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि नया कानून केवल इन हमलों को और बढ़ावा ही देगा.

उन्होंने कहा था, ‘जनवरी से लेकर अब तक बेलगावी, हुबली, बेलूर और अन्य क्षेत्रों में चर्चों पर 32 हमले हुए हैं, जिनमें पिछले कुछ हफ्तों में हुए पांच या छह गंभीर मामले शामिल हैं. अगर बिना किसी कानून के यह सब हो सकता है, तो कल्पना करें कि कानून पारित होने के बाद क्या होगा?.’

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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