Saturday, 20 August, 2022
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एक महीने में हिंदुओं और मुसलमानों के खिलाफ 11 मामले दर्ज, बोम्मई सरकार में मॉरल पुलिसिंग की घटनाएं सुर्खियों में छाईं

कर्नाटक में कांग्रेस और सिविल सोसाइटी की तरफ से अपराधों खासकर जिसमें हिंदू सतर्कता संगठनों की संलिप्तता है, की अनदेखी करने के लिए मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई की कड़ी आलोचना की जा रही है.

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बेंगलुरु: कर्नाटक के तटीय शहर सुरथकल में 26 सितंबर को कुछ हिंदूवादी कार्यकर्ताओं ने मेडिकल छात्रों के एक समूह, जिसमें विभिन्न समुदायों के लोग शामिल थे, को कथित तौर पर रोका, धमकाया और काफी उत्पीड़ित किया. दो दिन बाद इस मामले में बजरंग दल के पांच सदस्यों को गिरफ्तार तो किया गया लेकिन उसी दिन जमानत पर छोड़ दिया गया.

इससे करीब एक हफ्ते पहले 20 सितंबर को ऐसे ही एक ग्रुप ने पुत्तूर के एक होटल में भोजन करते समय विभिन्न समुदायों के तीन लोगों पर कथित तौर पर हमला किया और उत्पीड़ित किया. उत्पीड़ित लोगों में शामिल एक हिंदू महिला ने शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद हिंदू जागरण वैदिक (एचजेवी) के दो सदस्यों को गिरफ्तार किया गया.

18 सितंबर को बेंगलुरु में दो मुस्लिमों ने बेंगलुरु में अपनी मुस्लिम महिला सहयोगी को घर छोड़ने पहुंचे एक हिंदू व्यक्ति को कथित तौर पर रोका, उसके साथ मारपीट और गाली-गलौच की. दोनों मुस्लिमों को 12 घंटे के भीतर गिरफ्तार कर लिया गया, गैर-जमानती धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया और जेल भेज दिया गया.

27 अगस्त को बंतवाल में छह पैरामेडिकल छात्रों को सिर्फ इसलिए उत्पीड़ित किया गया और धमकाया गया क्योंकि अलग-अलग धर्मों के होने के बावजूद वे एक साथ समय बिता रहे थे. इसमें से एक लड़की की तरफ से शिकायत किए जाने के बाद एचजेवी के तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया लेकिन जमानत पर छोड़ दिया गया.

पिछले हफ्ते, 8 अक्टूबर को शिवमोगा पुलिस ने दो मुस्लिमों को अपनी एक मुस्लिम महिला मित्र को छोड़ने आए हिंदू युवक को कथित तौर पर दौड़ा लेने और उसके साथ मारपीट करने के आरोप में गिरफ्तार किया था.

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इसके एक दिन बाद मूदाबिदिरी पुलिस ने बजरंग दल के दो सदस्यों को गिरफ्तार किया जिन्होंने कथित तौर पर एक दो हिंदू लड़कियों के साथ जा रहे एक मुस्लिम जोड़े की कार का पीछा किया और उनके साथ गाली-गलौच किया था. उसी दिन रात 9 बजे तक स्थानीय भाजपा विधायक के दखल के बाद उन्हें जमानत पर छोड़ दिया गया.

10 अक्टूबर को पुरुषों के एक ग्रुप का वीडियो वायरल हुआ, जिसमें वह बाइक सवार एक मुस्लिम युवक और एक हिंदू महिला को कथित तौर पर धमकाते नजर आ रहे हैं जिसके बाद लड़की के पिता मौके पर पहुंचते हैं और उसे वहां से ले जाने के लिए बाध्य होते हैं.

ये सारी घटनाएं कर्नाटक में हाल के दिनों में मॉरल पुलिसिंग की एक बानगी हैं—ऐसी घटनाएं राज्य के लिए पूरी तरह से नई तो नहीं है लेकिन पिछले दो महीनों में इनमें अचानक तेजी दिखी है.

पिछले एक माह में कर्नाटक में मॉरल पुलिसिंग के कम से कम 11 मामले सामने आए हैं. जिन 11 मामलों ने काफी सुर्खियां बटोरीं, उनमें आठ में हिंदू और तीन में मुस्लिम उत्पीड़न करने वाले थे.

यद्यपि मॉरल पुलिसिंग की घटनाएं कर्नाटक के तटीय जिलों में पिछले एक दशक से अधिक समय से ही लगातार होती रही हैं, लेकिन अब यह चिंताजनक रूप से अन्य जिलों में फैल रही हैं.

पिछले एक महीने में शिवमोगा, मांड्या और यहां तक कि राजधानी बेंगलुरु में मॉरल पुलिसिंग के तीन मामले सामने आए हैं.

इस सबके बीच मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई को ऐसे अपराधों, खासकर जिसमें हिंदू सतर्कता संगठनों की संलिप्तता है, की अनदेखी करने के लिए आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है.

बोम्मई ने सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील माने जाने वाले मंगलुरु में बुधवार को संवाददाताओं से कहा, ‘जब भावनाएं आहत होंगी तो स्वाभाविक तौर पर क्रिया और प्रतिक्रिया होगी. हमें समाज में नैतिकता की जरूरत है, है कि नहीं? क्या हम नैतिकता के बिना रह सकते हैं?’ उन्होंने यह बात उन पत्रकारों से पूछी जिन्होंने मॉरल पुलिसिंग का मुद्दा उठाया था.

बमुश्किल तीन हफ्ते पहले ही मुस्लिम संदिग्धों से जुड़े एक मामले में बोम्मई का रुख कुछ और ही था. मुख्यमंत्री ने तब ट्वीट किया था, ‘मेरी सरकार इस तरह की घटनाओं से सख्ती से निपटती है.’

इस सबको लेकर ट्विटर पर बोम्मई और विपक्ष के नेता सिद्धारमैया के बीच विवाद भी हो गया.

कांग्रेस नेता द्वारा मॉरल पुलिसिंग को जायज ठहराने के लिए मुख्यमंत्री की आलोचना किए जाने के बाद बोम्मई ने सिद्धारमैया को ‘हिंदू विरोधियों का एक प्रतीक’ करार दिया और दावा किया कि वह ‘हिंदू कार्यकर्ताओं की हत्या पर राज करते रहे हैं जैसा टीपू सुल्तान ने किया था.’

ऐसा लगता है कि बोम्मई के रुख से राज्य में हाशिये पर रहे हिंदू संगठनों का भी हौसला बढ़ा है. उनके द्वारा मॉरल पुलिसिंग को जायज ठहराए जाने के एक दिन बाद ही बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद (विहिप) की तरफ से मंगलुरु में एक ‘त्रिशूल दीक्षा’ कार्यक्रम आयोजित किया, जहां कथित तौर पर संगठन के सदस्यों को शस्त्र दिए गए—हालांकि इस दावे को संगठनों ने खारिज कर दिया है.

हालांकि, विहिप मॉरल पुलिसिंग में शामिल होने की बात से इनकार नहीं करता है. मंगलूर जिले में विहिप के सचिव शरण पंपवेल ने दिप्रिंट से कहा, ‘मैं मुख्यमंत्री के बयान का स्वागत करता हूं. जब हमारी भावनाएं आहत होंगी तो निश्चित रूप से प्रतिक्रिया तो होगी ही.’

उन्होंने कहा, ‘हमारे खिलाफ मामला दर्ज करने की कोई जरूरत नहीं है. ऐसा नहीं है कि हम बेवजह लोगों की पिटाई कर रहे हैं. हमें लगता है कि हमारी बहन-बेटियों को सुरक्षा की जरूरत है. किसी महिला को परेशान करने या हमला करने का हमारा इरादा नहीं है. हम केवल मुस्लिम युवकों के झांसे में आने से बचाने के लिए उन्हें जागरूक करना चाहते हैं.’

शरण एक सुरक्षा एजेंसी चलाते हैं जिसका इस्तेमाल अक्सर उनके व्यक्तिगत सूचना नेटवर्क के तौर पर किया जाता है क्योंकि इसमें काम करने वाले सुरक्षा कर्मी मॉल, कार्यालयों, शैक्षणिक संस्थानों और अन्य स्थानों पर तैनात रहते हैं. उन्होंने दावा किया कि अकेले इस साल ही सतर्कता बरतने के कारण 200 से अधिक हिंदूवादी कार्यकर्ताओं के खिलाफ मामले दर्ज किए गए हैं.

शरण ने कहा, ‘हिंदू लड़कियों को मुस्लिम युवकों के साथ देखे जाने पर लोग हमारे पास आकर शिकायत करते हैं. अंतर-सांप्रदायिक मेलजोल की ऐसी घटनाओं को लेकर हमारे कार्यकर्ता, उनका नेटवर्क, बसों, बाजारों, पार्कों, होटलों के अलावा में सड़कों पर चलते आम लोग हमें सूचनाएं देते हैं.’


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कर्नाटक में मॉरल पुलिसिंग के इर्द-गिर्द घूमती राजनीति

कर्नाटक में मॉरल पुलिसिंग की वास्तविक झलक देश ने पहली बार 24 जनवरी 2009 को देखी जब प्रमोद मुतालिक द्वारा स्थापित दक्षिणपंथी हिंदू संगठन श्री राम सेना के सदस्यों ने मंगलुरु के एक पब में घुसकर वह मौजूद युवक-युवतियों के साथ मारपीट की. इस बर्बर घटना के नौ साल बाद मामले के सभी आरोपी बरी हो चुके हैं.

पिछले 12 वर्षों के दौरान कर्नाटक ने मॉरल पुलिसिंग की तमाम घटनाएं देखी हैं—जो कि खासकर दक्षिण कन्नड़ और उडुपी के तटीय जिलों में सामने आती रही हैं और वह भी विशेष तौर पर वेलेंटाइन डे और नए साल की पूर्व संध्या के आसपास. लेकिन अब धार्मिक असहिष्णुता से भरी सतर्कता के कारण पूरे राज्य में ऐसी घटनाएं बढ़ रही हैं.

मॉरल पुलिसिंग पर बोम्मई के बयानों के बारे में भाजपा सूत्रों का कहना है कि वह पार्टी के वैचारिक आधार, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को खुश करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं, ताकि भाजपा और संघ परिवार की विचारधारा को लागू न करने को लेकर उनकी कोई आलोचना न की जा सके. बोम्मई मूलत: आरएसएस से जुड़े नहीं रहे हैं.

पार्टी के एक राष्ट्रीय महासचिव ने पहले दिप्रिंट को बताया था, ‘2023 में कर्नाटक चुनाव में भाजपा के लिए हिंदुत्व प्रमुख चुनावी मुद्दा होगा.’

कर्नाटक कांग्रेस के एक पदाधिकारी का कहना है कि ऐसे मामलों में तेजी का एक अन्य कारण उनकी पार्टी की चुप्पी भी रही है.

उन्होंने कहा, ‘चाहे बजरंग दल हो, विहिप हो या पीएफआई या एसडीपीआई के गुंडे हों, कर्नाटक में सतर्कता से जुड़ी घटनाएं इसलिए भी बढ़ रही हैं क्योंकि कांग्रेस इनके बारे में बोलने से कतरा रही है.’

उन्होंने कहा, ‘कांग्रेस की यह धारणा गलत है कि अगर वह मॉरल पुलिसिंग के बारे में बोलने से बचती है और नरम हिंदुत्व का रास्ता अपनाती है तो हिंदू वोट वापस हासिल करने में सफल हो सकती है. ऐसा कतई नहीं होने वाला है.’

मॉरल पुलिसिंग में शामिल होने पर गर्व करने वाले हिंदूवादी संगठनों के उलट केरल के विवादास्पद मुस्लिम संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई), ऐसे मामलों में शामिल होने की बात से इनकार करता है.

पीएफआई के राष्ट्रीय महासचिव अनीस अहमद ने दिप्रिंट से कहा, ‘यह सच हो सकता है कि हमारे कार्यकर्ता कुछ साल पहले मॉरल पुलिसिंग में शामिल रहे हो लेकिन हाल के दिनों में ऐसा कुछ नहीं हुआ है…अपने प्रशिक्षण और नीतियों के तहत हम ऐसी गतिविधियों से बचते हैं.’

इस बीच, तमाम लोगों ने इन मामलों से निपटने के लिए नए कानून की मांग की है.

कांग्रेस प्रवक्ता लावण्या बल्लाल ने कहा, ‘हमें भारत में एक सतर्कता-विरोधी कानून की सख्त जरूरत है. चाहे मॉरल पुलिसिंग हो या लिंचिंग या फिर अंतरधार्मिक संबंधों का विरोध या धर्मांतरण की घटनाएं, इस पर रोक के लिए सतर्कता विरोधी कानून इस समय की एक बड़ी जरूरत है.’

बल्लाल खुद कथित तौर पर सतर्कता कार्यकर्ताओं के निशाने पर आ चुकी हैं. 30 सितंबर को हिंदूवादी कार्यकर्ता होने का दावा करने वाले एक व्यक्ति ने लाइव टेलीविजन डिबेट के दौरान लावण्या को फोन करके धमकी दी थी. उन्होंने धमकी देने वाले व्यक्ति के खिलाफ दो शिकायतें दर्ज कराई हैं, लेकिन घटना के 16 दिन बाद भी आरोपी की पहचान नहीं हो पाई है.

हालांकि, कर्नाटक के गृह मंत्री अरागा ज्ञानेंद्र का कहना है ऐसे कानूनों की कोई जरूरत नहीं है.

उन्होंने दिप्रिंट से कहा, ‘मॉरल पुलिसिंग पर अंकुश लगाने के लिए नया कानून लाने की जरूरत नहीं है. पुलिस ऐसा करने वाले लोगों के खिलाफ मौजूदा कानूनों के तहत ही कार्रवाई करेगी. हमारे कानून काफी सशक्त हैं. ये एक सामाजिक मुद्दा है और समाज को इस पर चर्चा करनी चाहिए. जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है, क्योंकि हर समस्या का समाधान कानूनों से नहीं हो सकता.’

पुलिस उपाधीक्षक रैंक के एक अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया कि मॉरल पुलिसिंग के मामलों में आरोपी अक्सर लगभग तुरंत ही जमानत पर छूट जाते हैं.

अधिकारी ने कहा, ‘मॉरल पुलिसिंग के लिए विशेष रूप से कोई धारा नहीं बनाई गई है, लेकिन हम कुछ आईपीसी धाराओं जैसे 504 (जानबूझकर अपमान), 506 (आपराधिक धमकी), 339 (गलत ढंग से रोकने) और 153 (ए) (धर्म के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच वैमनस्य बढ़ाने) आदि का इस्तेमाल करते हैं. अपराध की प्रकृति या दुर्व्यवहार को मामूली की श्रेणी में रखा गया है. लेकिन इसके नतीजे बहुत गहरे होते हैं.’

कर्नाटक कांग्रेस ने शनिवार को मूदाबिदिरी पुलिस थाने में बैठे भाजपा विधायक उमानाथ कोटियन की तस्वीरें साझा कीं, जो कथित तौर पर उन दो लोगों को रिहा कराने पहुंचे थे जिन्हें मॉरल पुलिसिंग के आरोप में पकड़ा गया था. भाजपा विधायक के दावे के मुताबिक दोनों आरोपियों को उसी दिन रात नौ बजे जमानत पर रिहा कर दिया गया था.


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सिविल सोसाइट पर बोम्मई का पलटवार

मॉरल पुलिसिंग पर मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई के बयान के 24 घंटे के भीतर ही 58 एक्टिविस्ट, लेखकों, कलाकारों, अधिवक्ताओं और यहां तक कि हाई कोर्ट के पूर्व जज, जस्टिस एच.एन. नागमोहन दास (सेवानिवृत्त) के एक ग्रुप ने उनके बयान की आलोचना करते हुए एक खुला पत्र लिखा.

पत्र में लिखा गया है, ‘आपके प्रशासन ने बीटीएम लेआउट में अनैतिक पुलिसिंग की घटनाओं में कार्रवाई को लेकर पूरी तत्परता दिखाई और खुद आपने भी इसकी निंदा करते हुए एक बयान जारी किया और कार्रवाई का आश्वासन दिया. लेकिन उन मामलों में आप त्वरित कार्रवाई क्यों नहीं कर रहे जहां पीड़ित अल्पसंख्यक हैं और आरोपी दक्षिणपंथी हिंदूवादी समूहों के सदस्य हैं?’

पत्र पर हस्ताक्षर करने वाली एक प्रमुख हस्ती और दक्षिण कन्नड़ जिले में मॉरल पुलिसिंग के खिलाफ एक मुखर आवाज विद्या दिनकर ने कहा, ‘मुख्यमंत्री जो कह रहे हैं, उसका सीधा मतलब तो यही है कि ‘सबको खुली छूट है.’ जिले में हर तरह के चरमपंथी तत्व हावी हो सकते हैं और प्रशासन और कानून का अब कोई मायने नहीं रह गया है. एक नागरिक के तौर पर हम बहुत हताश महसूस कर रहे हैं.’

कुछ पुलिस अधिकारियों ने भी दिप्रिंट से बातचीत में कहा कि जब कोई मुख्यमंत्री, जो पहले गृह मंत्री रह चुका हो, इस तरह का बयान देता है तो यह निश्चित तौर पर ‘निराशाजनक’ होता है.

एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी ने दिप्रिंट से कहा, ‘यह बहुत खराब तस्वीर पेश करता है. मुख्यमंत्री को तो सभी से कानूनों का पालन करने को कहना चाहिए. मॉरल पुलिसिंग एक अपराध है और इसे कम करके नहीं आंका जा सकता, भले ही आरोपी किसी भी राजनीतिक विचारधारा से जुड़ा क्यों न हो.’

अधिकारी ने कहा कि राजनीतिक टिप्पणियों के बावजूद पुलिस वही करेगी जो कानूनन उन्हें करने की जरूरत होती है लेकिन राजनीतिक दबाव की बात से इनकार नहीं किया जा सकता. अधिकारी ने कहा, ‘हम फिर से 2008 जैसे चर्च हमले नहीं झेल सकते हैं.’

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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