नयी दिल्ली, 20 जनवरी (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय ने मंगलवार को कहा कि विवादों का सौहार्दपूर्ण निपटारा सभ्यता की पहचान है और विवाद समाधान की एक विधि के रूप में मध्यस्थता प्राचीन भारत में भी मौजूद थी।
दिल्ली उच्च न्यायालय मध्यस्थता एवं सुलह केंद्र की शुरुआत और समाधान के इस वर्ष का कैलेंडर जारी करने के अवसर पर न्यायमूर्ति उपाध्याय ने कहा कि मध्यस्थता मुकदमेबाजी की तुलना में तेज, सस्ती और लचीली है और देश एक मजबूत व संहिताबद्ध प्रणाली की ओर बढ़ रहा है जहां मध्यस्थता अदालत के बाहर विवादों को सुलझाने का एक पसंदीदा मार्ग है।
उन्होंने कहा, “विवादों का सौहार्दपूर्ण ढंग से निपटारा करना सभ्यता की पहचान है। प्राचीन भारत में मध्यस्थता प्रणाली किसी न किसी रूप में प्रचलित थी। यह हमारे गांवों में जारी है और आदिवासी क्षेत्रों में अपने पारंपरिक रूप में संरक्षित है।”
मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “जब लोगों को लगता है कि उनकी बात सुनी जा रही है और उनके साथ निष्पक्ष व्यवहार किया जा रहा है, तो विश्वास फिर से कायम होता है, तनाव कम होता है और सहयोग बढ़ता है। सद्भाव इसी तरह प्राप्त होता है। संघर्षों से बचने से नहीं, बल्कि उन्हें शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने से। सद्भाव बनाए रखने में मध्यस्थता की अहम भूमिका होती है। इसलिए हम कह सकते हैं कि मध्यस्थता केवल संघर्ष समाधान का एक तरीका नहीं है, बल्कि स्थायी सद्भाव की नींव है।”
इस कार्यक्रम में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति विक्रम नाथ भी उपस्थित थे, जो शीर्ष न्यायालय की मध्यस्थता और सुलह परियोजना समिति के अध्यक्ष भी हैं।
उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय के मध्यस्थता केंद्र की लगभग 50 प्रतिशत सफलता दर “अद्भुत” और “शानदार” है और उन्होंने उम्मीद जताई कि देश के सभी उच्च न्यायालय इस वर्ष “पहले से कहीं बेहतर प्रदर्शन करने का प्रयास करेंगे”।
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प्रशांत माधव
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