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Sunday, 22 February, 2026
होमदेशदो ड्रेन की दास्तान: जहां दिल्ली का पीने का पानी और हरियाणा की सीवेज नाली नंबर 6 करीब बहती हैं

दो ड्रेन की दास्तान: जहां दिल्ली का पीने का पानी और हरियाणा की सीवेज नाली नंबर 6 करीब बहती हैं

प्रदूषण निगरानी संस्था ने एनजीटी को बताया कि मीठे पानी के चैनल डीडी-8 पर कई जगहों से लिए गए पानी के नमूनों में “उच्च प्रदूषण भार” दिखा.

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नई दिल्ली: शुक्रवार को दिल्ली की बीजेपी सरकार ने राष्ट्रीय राजधानी में अपने एक साल के कामकाज की रिपोर्ट जारी की. 43 पन्नों के इस दस्तावेज में कई उपलब्धियों की लंबी सूची गिनाई गई, जिनमें शहर की तीन बड़ी नालियों पर किए गए काम का भी जिक्र था. लेकिन इसमें दुर्भाग्यपूर्ण डायवर्जन ड्रेन नंबर-8 का कोई उल्लेख नहीं था. यह एक मीठे पानी की नहर है, जो पिछले एक दशक से हरियाणा की ओर से होने वाले प्रदूषण के कारण चर्चा में रही है.

सोनीपत के अकबरपुर बरोटा के नीचे की ओर दो नालियां एक-दूसरे के समानांतर बहती हैं. एक तरफ डायवर्जन ड्रेन नंबर-6 है, जिसे बीच-बीच में कंक्रीट पाइप से ढका गया है. इसमें गंदगी, औद्योगिक कचरा और सीवर का पानी भरा रहता है. इसके ठीक बगल में डीडी-8 बहती है, जिसका पानी साफ किया जाता है और दिल्ली के कई इलाकों में सप्लाई किया जाता है.

उत्तर-पश्चिमी दिल्ली के मुंगेशपुर के निवासी और पर्यावरण कार्यकर्ता श्याम पखावन ने बताया कि कई सालों तक दोनों नालियों को सिर्फ ईंट और रेत की बोरियों से बनी कमजोर दीवार से अलग किया गया था. जब किसी एक नाली में पानी का स्तर बढ़ जाता था, तो वह दूसरी में मिल जाता था.

उन्होंने कहा, “समस्या यह है कि डीडी-8 मीठे पानी की नाली है. और डीडी-6 में हरियाणा की तरफ से आने वाला औद्योगिक कचरा मिला रहता है. यह बिना ट्रीट किया गया कचरा दिल्ली के पीने के पानी में मिल जाता है. इससे बुरा और क्या हो सकता है.”

2024 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने इस मामले में दखल दिया. जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव की अगुवाई वाली बेंच ने हरियाणा की तरफ से डीडी-8 में हो रहे प्रदूषण का स्वतः संज्ञान लिया. नियमित सुनवाई और एजेंसियों से बार-बार स्टेटस रिपोर्ट लेने के बावजूद, दिल्ली की तरफ आने वाली इस नाली में हरियाणा का औद्योगिक कचरा लगातार मिल रहा है.

DD-8, which is a freshwater channel in Delhi, often gets contaminated water from Haryana's DD-6 | Soumya Pillai
DD-8, जो दिल्ली में एक मीठे पानी का चैनल है, में अक्सर हरियाणा के DD-6 से गंदा पानी आता है | सौम्या पिल्लई

लोकेशन

गूगल मैप के अनुसार डीडी-8 की शुरुआत सोनीपत के गढ़ी बिंदरौली गांव के पास वेस्टर्न यमुना कैनाल से होती है. यह लगभग 20 किलोमीटर तक पश्चिम से पूर्व की ओर बहती है और फिर दिल्ली के हिस्से का पीने का पानी यमुना नदी में छोड़ती है.

यमुना में मिलने के बाद यह पानी वजीराबाद वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट तक जाता है, जहां इसे साफ कर दिल्ली में सप्लाई किया जाता है.

दूसरी ओर डीडी-6 पानीपत के समालखा से शुरू होती है. यह करीब 60 किलोमीटर लंबी है, उत्तर से दक्षिण की ओर बहती है और औद्योगिक व रिहायशी इलाकों का ठोस और तरल कचरा लेकर चलती है.

समस्या अकबरपुर बरोटा में शुरू होती है, जहां दोनों नालियां एक-दूसरे को काटती हैं. और यहीं से हालात और खराब हो जाते हैं.

अकबरपुर बरोटा गांव के बाद दोनों नालियां करीब 10 किलोमीटर तक साथ-साथ बहती हैं. यह हरियाणा के कुंडली औद्योगिक क्षेत्र की शिवपुरी कॉलोनी तक जाती हैं, जहां डीडी-6 का करीब 2 किलोमीटर हिस्सा बिना ट्रीट किया गया गंदा पानी डीडी-8 में छोड़ता है.

Maps showing the passing of DD-6 and DD-8 | Bhim Singh Rawat (SANDRP)
DD-6 और DD-8 के गुजरने को दिखाने वाले मैप | भीम सिंह रावत (SANDRP)

पानी प्रबंधन पर काम करने वाले समूह साउथ एशियन नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपल्स के भीम सिंह रावत ने बताया कि हरियाणा सरकार ने करीब 10 किलोमीटर तक डीडी-6 को डीडी-8 के अंदर से गुजारा है. शुरू में दोनों को अलग करने के लिए सिर्फ नौ इंच की दीवार थी.

उन्होंने कहा, “जांच के दौरान हमने पाया कि कई जगह यह दीवार टूटी और कमजोर थी. अगर किसी भी नाली में पानी थोड़ा भी बढ़ जाता था, तो दोनों का पानी मिल जाता था.”

रावत ने बताया कि हरियाणा की यह नाली जीटी करनाल रोड की ओर मोड़ दी जाती है, लेकिन फिर दोबारा दिल्ली में प्रवेश करती है और नजफगढ़ नाले में मिल जाती है. अंत में इसका जहरीला पानी वजीराबाद बैराज की तरफ से यमुना में मिल जाता है.

Diagram showing how DD-6 and DD-8 converge in the Delhi-Haryana border and intermix | Bhim Singh Rawat (SANDRP)
डायग्राम दिखा रहा है कि DD-6 और DD-8 दिल्ली-हरियाणा बॉर्डर पर कैसे मिलते हैं और आपस में मिलते हैं | भीम सिंह रावत (SANDRP)

व्हिसलब्लोअर्स

2010 में पल्ला से वजीराबाद के बीच यमुना में नाव चलाने वाले मछुआरे राम साहनी ने नदी में मरी हुई मछलियों की संख्या बढ़ती देखी.

समय के साथ मरी मछलियों की संख्या बढ़ती गई. आसपास के रिहायशी इलाकों में बदबू फैलने लगी. लेकिन मछलियों की मौत का कारण साफ नहीं था.

2024 में, जब मीडिया में दिल्ली के मछुआरों की हालत पर कई रिपोर्टें छपीं, तब एनजीटी ने हस्तक्षेप किया. उसी साल नवंबर में अदालत के दखल के बाद दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति ने विस्तृत रिपोर्ट दी और मरी मछलियों के लिए हरियाणा के प्रदूषित पानी को जिम्मेदार ठहराया.

प्रदूषण निगरानी संस्था ने एनजीटी को बताया कि डीडी-8 के कई स्थानों से लिए गए पानी के नमूनों में “प्रदूषण का स्तर बहुत अधिक” पाया गया. यह पानी जब नदी में मिलता है तो वहां की जल गुणवत्ता खराब हो जाती है.

साहनी ने कहा, “हमने कई बार मीडिया के जरिए यह मुद्दा उठाया, लेकिन आज भी जब गंदे पानी की मात्रा बढ़ती है, तो बड़ी संख्या में मछलियां मरती हैं.”

उन्होंने कहा कि पल्ला-वजीराबाद का हिस्सा दिल्ली की यमुना का इकलौता साफ भाग है, जिससे उनके जैसे मछुआरों की रोजी-रोटी चलती है. हरियाणा और दिल्ली की सरकारी एजेंसियों की लापरवाही से उनका गुजारा मुश्किल हो गया है.

उन्होंने कहा, “दिल्ली में मछली पकड़ना लगभग खत्म हो चुका है. एक समय था जब हम इससे अच्छा जीवन जी लेते थे, लेकिन हर दिन बढ़ते प्रदूषण के कारण हम परेशान हैं.”

अदालती मामला

दिसंबर 2025 में ग्रीन कोर्ट ने कहा कि हरियाणा की ओर से 67 एमएलडी और 46.2 एमएलडी क्षमता वाले सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट लगाए गए हैं, फिर भी डीडी-6 से बिना ट्रीट किया गया कचरा डीडी-8 में जा रहा है.

एनजीटी की बेंच ने कहा, “यह भी देखा गया है कि डीडी-6 में 51.124 एमएलडी तक सीवेज या औद्योगिक गंदा पानी आ रहा है, जबकि रिपोर्ट में चार एसटीपी और तीन सीईटीपी की कुल क्षमता क्रमशः 67 एमएलडी और 46.2 एमएलडी बताई गई है.”

बेंच ने यह भी कहा कि डीडी-8 को तीन अन्य एसटीपी से करीब 15.8 एमएलडी सीवेज मिल रहा है.

यह निर्देशों की लंबी श्रृंखला का एक हिस्सा था. मार्च 2024 में अदालत ने हरियाणा को दोनों नालियों की समस्या 12 महीने में ठीक करने का निर्देश दिया था.

सितंबर में अदालत ने दिल्ली और हरियाणा सरकार को जिम्मेदारी न लेने पर फटकार भी लगाई थी.

इसके बाद नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा ने हरियाणा को निर्देश दिया कि डीडी-6 को तुरंत ढका जाए ताकि गंदा पानी डीडी-8 में न मिल सके.

एनएमसीजी ने एनजीटी के सामने हलफनामे में कहा, “डीडी-6 से डीडी-8 में ओवरफ्लो रोकने के लिए हरियाणा सरकार उस हिस्से में अलग पाइपलाइन या नाली बना रही है जहां दोनों नालियां एक-दूसरे से मिलती हैं. हरियाणा सरकार को इस काम की समयसीमा बतानी होगी. प्रदूषण की किसी भी संभावना को खत्म करने के लिए काम जल्द पूरा किया जाए.”

दिल्ली सरकार की रिपोर्ट

बीजेपी सरकार की एक साल की रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया कि पीने के पानी को प्रदूषण से बचाने के लिए क्या काम किया गया.

दस्तावेज में मुख्य रूप से तीन बड़े नाला प्रोजेक्ट का जिक्र है. 220.93 करोड़ रुपये का मुंडका हॉल्ट-सप्लीमेंट्री ड्रेन, 250.21 करोड़ रुपये का किराड़ी-रिठाला ट्रंक ड्रेन और 387.84 करोड़ रुपये का एमबी रोड स्टॉर्म वॉटर ड्रेन प्रोजेक्ट.

लेकिन ये प्रोजेक्ट सिर्फ जलभराव की समस्या से निपटने के लिए हैं. एसटीपी और सीईटीपी को अपग्रेड करने और यमुना की सफाई का काम अभी भी बहुत धीमी गति से चल रहा है.

दिल्ली सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “हम अपनी तरफ एसटीपी अपग्रेड कर रहे हैं. लेकिन अगर आप सिर्फ डीडी-8 की समस्या देखें, तो इसका बड़ा हिस्सा हरियाणा की तरफ से हल होना है.”

हरियाणा सरकार ने सवालों का कोई जवाब नहीं दिया.

गहरी समस्या

बिना ट्रीट किया गया कचरा यमुना नदी में जाना सिर्फ डीडी-8 तक सीमित समस्या नहीं है. विशेषज्ञों का कहना है कि गंदे पानी को नदी में छोड़ने से पहले उसे ठीक से साफ करने की व्यवस्था होनी चाहिए, सिर्फ ऊपर-ऊपर से ढंकने की नहीं.

रावत ने कहा, “हरियाणा सरकार कह रही है कि उन्होंने एसटीपी और सीईटीपी लगाए हैं ताकि डीडी-8 में गंदा पानी न जाए. लेकिन फिर भी बिना ट्रीट किया गया कचरा इन नालियों में बह रहा है.”

पर्यावरण कार्यकर्ताओं का आरोप है कि विवाद से बचने के लिए अधिकारी प्रदूषण के आंकड़ों को गलत तरीके से पेश कर रहे हैं, ताकि यमुना को असलियत से ज्यादा साफ दिखाया जा सके.

नवंबर और दिसंबर 2025 की मासिक जल गुणवत्ता रिपोर्ट में दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति ने दावा किया कि यमुना की हालत बेहतर हुई है. रिपोर्ट में कहा गया कि फीकल कोलीफॉर्म का स्तर काफी कम था, जो इंसान और जानवरों के मल से आने वाले बैक्टीरिया की मात्रा को दिखाता है.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि नदी के पानी में बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड यानी बीओडी का स्तर पहले की तुलना में ज्यादा था. बीओडी यह बताता है कि सूक्ष्म जीव जैविक कचरे को तोड़ने के लिए कितनी ऑक्सीजन लेते हैं और यह जैविक प्रदूषण का सीधा संकेत होता है.

लेकिन जिन विशेषज्ञों ने इन रिपोर्टों का विश्लेषण किया, उनका कहना है कि यह आंकड़े जमीन पर दिख रही स्थिति से मेल नहीं खाते.

लोन अर्थ वॉरियर से जुड़े पर्यावरण कार्यकर्ता पंकज कुमार ने कहा, “हमें रिपोर्ट में गड़बड़ी मिली. नवंबर और दिसंबर में यमुना का पानी झाग से भरा और बदबूदार दिख रहा था. जबकि सितंबर और अक्टूबर में, जो मानसून के बाद का समय था, नदी में पानी का बहाव अच्छा था.”

कुमार ने डीपीसीसी और दिल्ली सरकार को पत्र लिखकर कहा है कि असली आंकड़ों को छिपाने की कोशिश हो सकती है.

उन्होंने कहा, “आप समस्या को कालीन के नीचे नहीं छिपा सकते और उम्मीद नहीं कर सकते कि वह अपने आप खत्म हो जाएगी. यमुना की सफाई के मामले में अभी यही हो रहा है.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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