गुरुग्राम: करीब तीन दशक पहले दुकान से जब्त किए गए 1.5 किलो खोया से शुरू हुआ एक मामला आखिरकार खत्म हो गया. हालांकि, अदालत ने व्यक्ति को दोषमुक्त नहीं किया, लेकिन पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने माना कि वह पहले ही काफी सज़ा भुगत चुका है.
16 जुलाई के अपने आदेश में जस्टिस दीपक मनचन्दा ने जगदीश राम की खाद्य मिलावट रोकथाम कानून (Prevention of Food Adulteration Act) के तहत हुई सज़ा को बरकरार रखा, लेकिन उनकी 6 महीने की जेल की सज़ा को घटाकर उतना ही कर दिया, जितना समय वह पहले ही जेल में बिता चुके हैं, यानी करीब 2 महीने 20 दिन. साथ ही कोर्ट ने शर्त रखी कि वह दो महीने के भीतर 5,000 रुपये का जुर्माना जमा करें.
यह मामला 28 अगस्त 1998 का है. उस दिन होशियारपुर जिला स्वास्थ्य अधिकारी की निगरानी में डॉ. जे.एस. बैंस ने दोपहर करीब 1:30 बजे जगदीश राम की दुकान की जांच की. इस दौरान कपिल कुमार को स्वतंत्र गवाह बनाया गया. जांच में दुकान से बिक्री के लिए रखा 1.5 किलो खोया मिला.
जब खोया का सैंपल जांच के लिए भेजा गया, तो उसमें दूध की वसा (Milk Fat) सिर्फ 4.95 प्रतिशत पाई गई, जबकि कानून के अनुसार यह कम से कम 20 प्रतिशत होनी चाहिए थी. इसके बाद खोया को तय मानकों से कम गुणवत्ता वाला घोषित किया गया और जगदीश राम के खिलाफ मामला दर्ज किया गया.
2001 में स्थानीय अदालत ने उन्हें दोषी ठहराते हुए 6 महीने की सख्त कैद और 1,000 रुपये जुर्माने की सज़ा सुनाई. इसके बाद उन्होंने होशियारपुर की फास्ट ट्रैक कोर्ट में अपील की, लेकिन 2008 में वह भी खारिज हो गई. इसके बाद उन्होंने हाई कोर्ट का रुख किया.
‘अब दोषसिद्धि नहीं, सिर्फ सज़ा में राहत चाहता हूं’
कई साल बाद जब मामला जस्टिस मनचन्दा की अदालत में पहुंचा, तो जगदीश राम के वकील सर्वेश कुमार गुप्ता ने दोषसिद्धि को चुनौती नहीं दी. उन्होंने अदालत से कहा कि उनके मुवक्किल के पास अपने पक्ष में अच्छे तर्क हैं, लेकिन अब वे उस पर बहस नहीं करना चाहते. उनकी सिर्फ एक मांग है कि सजा में नरमी बरती जाए.
जगदीश राम की ओर से अदालत को बताया गया कि अब वह काफी बुजुर्ग हो चुके हैं, खोया का कारोबार छोड़ चुके हैं और इन वर्षों में उनके खिलाफ कोई दूसरा आपराधिक मामला भी दर्ज नहीं हुआ.
उन्हें 2008 में ज़मानत मिलने से पहले करीब तीन महीने जेल में भी रहना पड़ा था. उस समय हाई कोर्ट ने उनकी सजा पर रोक लगा दी थी, क्योंकि पुनर्विचार याचिका लंबित थी.
वहीं, पंजाब सरकार ने इस मांग का विरोध किया और 13 जुलाई 2026 का हिरासत प्रमाणपत्र अदालत में पेश किया.
ऐसा कानून जिसमें राहत की गुंजाइश बहुत कम
इस मामले की खास बात यह है कि खाद्य मिलावट रोकथाम कानून में सज़ा कम करने का अधिकार अदालत के पास बहुत सीमित होता है.
कानून की धारा 20AA के मुताबिक, इस कानून में दोषी पाए गए व्यक्ति को परिवीक्षा (Probation) का लाभ नहीं मिल सकता. यह लाभ सिर्फ उस स्थिति में मिल सकता है, जब अपराध के समय आरोपी की उम्र 18 साल से कम हो.
जगदीश राम 1998 में अपराध के समय करीब 37 साल के थे और 2001 में दोषी ठहराए जाने के समय उनकी उम्र 40 साल थी. इसलिए उन्हें परिवीक्षा का लाभ नहीं मिल सकता था.
अदालत ने यह भी कहा कि इस कानून में तय न्यूनतम सजा को मनमर्जी से कम नहीं किया जा सकता.
फिर राहत कैसे मिली?
अदालत ने कहा कि इसका जवाब संविधान के अनुच्छेद 21 में दिए गए जल्द सुनवाई के अधिकार (Right to Speedy Trial) में छिपा है.
जस्टिस मनचन्दा ने 1980 के सुप्रीम कोर्ट के मशहूर हुसैनआरा खातून फैसले समेत कई पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि अगर किसी मामले की सुनवाई कई साल तक चलती है, तो सिर्फ यह देरी भी सज़ा में राहत देने का आधार बन सकती है, भले ही दोषसिद्धि बनी रहे.
इस मामले में अपराध के करीब 28 साल और जमानत मिलने के 18 साल बाद फैसला आया.
अदालत ने खास तौर पर 2026 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले ‘इसराफिल @पप्पू@नईमुद्दीन खान बनाम मध्य प्रदेश सरकार’ का भी हवाला दिया. उस फैसले में कहा गया था कि लंबे समय तक चलने वाला आपराधिक मुकदमा अपने आप में एक सजा जैसा होता है. वर्षों तक अनिश्चितता, सामाजिक बदनामी और मुकदमे का बोझ भी सजा का हिस्सा माना जाना चाहिए.
अदालत ने कहा कि सज़ा तय करते समय इन बातों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए.
अंतिम आदेश
इन सभी बातों को देखते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि दशकों पुराने मामले में जगदीश राम को दोबारा जेल भेजने का कोई खास उद्देश्य नहीं होगा.
इसलिए उनकी दोषसिद्धि बरकरार रहेगी, लेकिन सज़ा उतनी ही मानी जाएगी, जितना समय वह पहले ही जेल में काट चुके हैं. इसके साथ 5,000 रुपये का जुर्माना देना होगा.
हालांकि, अदालत ने साफ कहा कि अगर दो महीने के भीतर ट्रायल कोर्ट में 5,000 रुपये का जुर्माना जमा नहीं किया गया, तो उनकी पुरानी जेल की सज़ा फिर से लागू हो जाएगी और उन्हें बची हुई सजा काटने के लिए दोबारा जेल जाना होगा.
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