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Thursday, 5 March, 2026
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लखीमपुर मामला : आशीष मिश्रा को मिली जमानत शीर्ष अदालत ने की निरस्त

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नयी दिल्ली, 18 अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने लखीमपुर खीरी हिंसा मामले में केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा के बेटे आशीष मिश्रा को इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा दी गई जमानत सोमवार को रद्द कर दी और उन्हें एक सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने को कहा।

न्यायालय ने कहा कि पीड़ितों को जांच से लेकर आपराधिक मुकदमे की समाप्ति तक कार्यवाही में हिस्सा लेने का ‘निर्बाध’ अधिकार है।

शीर्ष अदालत ने कहा कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय में ‘पीड़ितों’ को निष्पक्ष एवं प्रभावी तरीके से नहीं सुना गया, क्योंकि उसने (उच्च न्यायालय ने) ‘‘साक्ष्यों को लेकर संकुचित दृष्टिकोण अपनाया।’’

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि उच्च न्यायालय ने अप्रासंगिक विवेचनाओं को ध्यान में रखा और प्राथमिकी की सामग्री को अतिरिक्त महत्व दिया।

शीर्ष अदालत ने प्रासंगिक तथ्यों और इस तथ्य पर ध्यान देने के बाद, कि पीड़ितों को सुनवाई का पूरा अवसर नहीं दिया गया था, गुण-दोष के आधार पर नए सिरे से सुनवाई के लिए जमानत अर्जी को वापस भेज दिया।

न्यायालय ने कहा कि उच्च न्यायालय का आदेश बरकरार नहीं रखा जा सकता और यह निरस्त करने के लायक है। इसने यह भी कहा कि यदि लखीमपुर खीरी की घटना आरोपों के अनुरूप सच है तो यह सरकारी अधिकारियों के लिए ‘नींद से जगाने वाली’ घटना है कि वह पीड़ितों के परिजनों के साथ-साथ चश्मदीद/घायल गवाहों की जान, स्वतंत्रता और सम्पत्ति की पर्याप्त सुरक्षा उपलब्ध करायें।

इस बीच कांग्रेस ने इस फैसले के बाद सरकार पर निशाना साधा तथा पूछा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने सहयोगी केंद्रीय गृह राज्य मंत्री को कब बर्खास्त करेंगे। इधर भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने कहा कि शीर्ष अदालत के फैसले ने किसानों में न्याय के प्रति उम्मीद की किरण जगायी है।

शीर्ष अदालत ने आपराधिक मामलों में पीड़ितों के अधिकारों के बारे में विस्तार से बताते हुए कहा कि ये (अधिकार) आपराधिक प्रक्रिया संहिता के तहत ‘पूरी तरह से स्वतंत्र, अतुलनीय हैं।’

मुख्य न्यायाधीश एन वी रमण और न्यायमूर्ति सूर्यकांत व न्यायमूर्ति हिमा कोहली की विशेष पीठ ने कहा कि उसका मानना है कि उच्च न्यायालय की अप्रासंगिक विवेचनाओं के कारण जमानत मंजूर करने का विवादित आदेश पारित किया गया। इतना ही नहीं, उच्च न्यायालय ने अपने अधिकार क्षेत्र का भी उल्लंघन किया तथा पीड़ितों को कार्यवाही में हिस्सा लेने के अधिकार से वंचित किया।

न्यायालय ने कहा कि उच्च न्यायालय ने प्रतिवादी/अभियुक्त को जमानत मंजूर करने में अधिक जल्दबाजी दिखाई, इसलिए जमानत को निरस्त किया जाना उचित है।

हालांकि पीठ ने स्पष्ट किया कि प्रतिवादी-अभियुक्त (मिश्रा) को ‘प्रासंगिक विवेचनाओं’ के आधार पर जमानत के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

शीर्ष अदालत ने भले ही आशीष मिश्रा की जमानत अर्जी खारिज कर दी, लेकिन यह कहते हुए उनके लिए एक उम्मीद की किरण अवश्य छोड़ दी कि किसी भी अभियुक्त को अनंतकाल के लिए हिरासत में नहीं रखा जा सकता और सख्त दंडात्मक प्रावधानों को स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों से ‘‘बड़ा और ऊपर’’ नहीं माना जा सकता।

पीठ ने अभियुक्त की आशंकाओं को दरकिनार करते हुए उनकी जमानत याचिका फिर से उच्च न्यायालय के पास भेज दी और उसे इसका निपटारा तीन महीने के भीतर करने का निर्देश दिया।

याचिकाकर्ता ने आशंका जतायी थी कि यदि शीर्ष अदालत जमानत याचिका को निरस्त कर देती है तो देश की कोई अदालत ऐसी याचिका की सुनवाई नहीं करेगी और उसे जमानत मिलने का रास्ता बंद हो जायेगा।

इस पर न्यायालय ने कहा, ‘‘यह अदालत यह सुनिश्चित करने के लिए अधिकृत है कि न तो अभियुक्त के जमानत पर रिहा होने के अधिकार का हनन हो, न ही ऐसी याचिका का विरोध करने के पीड़ितों के अधिकार पर कोई कुठाराघात हो। ऐसी स्थिति में यह अदालत मामले को फिर से उच्च न्यायालय वापस भेज रही है ताकि वहां आरोपी की जमानत याचिका पर नये सिरे से निष्पक्ष तरीके से सुनवाई हो।’’

पीठ की ओर से लिखे गये 24 पन्नों के आदेश में न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने पीड़ितों की इन दलीलों का भी संज्ञान लिया, जिसमें उन्होंने कहा था कि उच्च न्यायालय में उन्हें नहीं सुना गया क्योंकि उनके वकील का वीडियो कनेक्शन समाप्त हो गया था। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, ‘‘जिस तरीके से उच्च न्यायालय पीड़ितों के अधिकारों की पुष्टि करने में विफल रहा है, उस पर हम निराशा व्यक्त करने को मजबूर हैं।’’

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, “पीड़ितों की सुनवाई से इनकार और उच्च न्यायालय द्वारा दिखाई गई जल्दबाजी के बाद, जमानत आदेश रद्द करने योग्य है।” उन्होंने कहा कि “आदेश को बरकरार नहीं रखा जा सकता और इसे खारिज करना होगा।”

फैसले में इस मुद्दे पर विचार किया गया कि क्या सीआरपीसी के तहत परिभाषित ‘पीड़ित’ को अभियुक्त की जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान अपना पक्ष रखने का अधिकार है? इसने इस मुद्दे पर विचार किया कि उच्च न्यायालय ने यदि जमानत देते वक्त प्रासंगिक विवेचनाओं को नजरंदाज किया है तो क्या उच्चतम न्यायालय को उसमें हस्तक्षेप करना चाहिए?

पीठ ने कहा, ‘‘पीड़ित को अपराध घटित होने से लेकर हरेक कदम पर अपना पक्ष रखने का अधिकार प्राप्त है। इस तरह के पीड़ित को जांच के चरण से लेकर अपील या पुनरीक्षण के चरण तक मुकदमे की सुनवाई में अपना पक्ष रखने का अधिकार है।’’

पीठ ने कहा कि यह मानने की जरूरत नहीं है कि आरोपी की जमानत अर्जी पर वही न्यायाधीश सुनवाई नहीं कर सकते हैं। शीर्ष अदालत ने कहा कि इस पहलू को उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पर छोड़ देना बेहतर है।

मिश्रा की जमानत रद्द करवाने के लिए दायर किसानों की याचिका पर शीर्ष अदालत ने चार अप्रैल को अपना आदेश सुरक्षित रखा था।

उच्च न्यायालय की एकल न्यायाधीश की पीठ ने 10 फरवरी को मिश्रा को जमानत दे दी थी, जो चार महीने से हिरासत में था।

सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के, मिश्रा को जमानत देने के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा था कि जब मुकदमा शुरू होना बाकी था तो पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट, घावों की प्रकृति जैसे “अनावश्यक” विवरण में नहीं जाना चाहिए था।

आशीष की जमानत रद्द करने की मांग करने वाली किसानों की याचिका पर आदेश सुरक्षित रखते हुए पीठ ने इस तथ्य का भी कड़ा संज्ञान लिया था कि राज्य सरकार ने उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ अपील दायर नहीं की थी, जैसा कि शीर्ष अदालत द्वारा नियुक्त एसआईटी द्वारा सुझाया गया था। पीठ ने कहा था, “यह कोई ऐसी बात नहीं है जहां आप वर्षों तक प्रतीक्षा करते हैं।”

पीठ ने कहा, “न्यायाधीश पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आदि में कैसे जा सकते हैं। हम जमानत के मामले की सुनवाई कर रहे हैं, हम इसे लंबा नहीं करना चाहते। गुण-दोष में जाने और घाव आदि को देखने का यह तरीका जमानत के सवाल के लिए अनावश्यक है।”

जमानत को चुनौती देने वाली याचिका पर उच्चतम न्यायालय ने 16 मार्च को उत्तर प्रदेश सरकार और आशीष मिश्रा से उनका पक्ष मांगा था।

किसानों की तरफ से पेश हुए वकील द्वारा 10 मार्च को मामले के प्रमुख गवाह पर हमले के संदर्भ में जानकारी दिए जाने पर न्यायालय ने प्रदेश सरकार को गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का भी निर्देश दिया था।

पिछले साल तीन अक्टूबर को लखीमपुर खीरी में हिंसा के दौरान आठ लोग मारे गए थे। यह हिंसा तब हुई थी जब किसान उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के इलाके के दौरे का विरोध कर रहे थे।

उत्तर प्रदेश पुलिस की प्राथमिकी के अनुसार, एक वाहन जिसमें आशीष मिश्रा बैठे थे, उसने चार किसानों को कुचल दिया था। घटना के बाद गुस्साए किसानों ने वाहन चालक और दो भाजपा कार्यकर्ताओं को कथित तौर पर पीट-पीट कर मार डाला था।

इस दौरान हुई हिंसा में एक पत्रकार की भी मौत हो गई थी। केंद्र के अब निरस्त किए जा चुके कृषि सुधार कानूनों के खिलाफ आंदोलन कर रहे विपक्षी दलों और किसान समूहों में इस घटना को लेकर काफी आक्रोश था।

भाषा

सुरेश मनीषा

मनीषा

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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