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Friday, 14 June, 2024
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सरकारी आंकड़ों से बिहार में 134 कोविड केस में से केवल 1, UP में 100 में 1 और केरल में 6 में 1 का पता लगा

भारत में कोविड मामलों को कम करके आंका जाना करीब 33 के गुणक में रहा है, जिसका मतलब है कि 31 मई तक 9,265 लाख भारतीय कोरोनावायरस से संक्रमित हुए, लेकिन केवल 282 लाख मामलों की ही पहचान हो सकी.

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नई दिल्ली: केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय कोविड से प्रभावी तरीके से निपटने के लिए शुक्रवार को एक और केंद्रीय टीम केरल भेजेगा क्योंकि राज्य में रोज सामने आने वाले मामलों में तेजी जारी है. जुलाई में राज्य का दौरा करने वाली यह इस तरह की दूसरी टीम होगी.

कभी विश्व स्तर पर कोविड-19 से निपटने में ‘आदर्श’ माने जाने वाले केरल में पिछले दो दिनों में 22,000 से अधिक नए मामले सामने आए हैं जो देश के प्रतिदिन के मामलों में 50 प्रतिशत से अधिक हैं. हालांकि, केंद्र सरकार के एक विश्लेषण में पाया गया है कि सभी राज्यों में से केवल केरल में कोविड मामलों को कम करके आंका जाना सबसे कम रहा है.

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) की तरफ से हाल में जारी सीरो सर्वेक्षण के निष्कर्षों के आधार पर किए गए एक विश्लेषण में पाया गया कि कोविड केस की अंडररिपोर्टिंग वाले शीर्ष दो राज्य बिहार और उत्तर प्रदेश हैं.

बिहार में जहां कोविड मामलों को 134 गुणक में कम करके आंका गया है, वहीं उत्तर प्रदेश में यह आंकड़ा 100 के गुणक में रहा. उधर, केरल के मामले में यह फैक्टर छह से कम रहा है. इसका मतलब यह है कि केरल में जितने केस सामने आए उससे छह गुना मामलों का पता लगाने में प्रशासन चूक गया.

बिहार में सामने आए हर एक केस के संदर्भ में 134 संक्रमितों का पता लगाने में चूक हुई, और उत्तर प्रदेश में प्रत्येक केस पर 100 संक्रमितों का पता नहीं लगाया जा सका. इसका सीधा मतलब यह है कि 31 मई तक बिहार में वास्तव में सात लाख केसलोड के मुकाबले संक्रमितों का कुल आंकड़ा 947 लाख था, जबकि यूपी में 17 लाख केसलोड की जगह दरअसल 1,689 लाख लोग संक्रमित थे.

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अन्य सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य महाराष्ट्र में कम आंके गए मामलों में यह गुणक 12 का रहा है. इसका मतलब है कि राज्य में 714 लाख मामले थे जबकि आधिकारिक तौर पर इसकी गणना सिर्फ 57 लाख थी.

विश्लेषण में पाया गया कि अगर पूरे देश की बात करें तो केस कम आंकने के मामले में गुणक 33 है. इसका मतलब है कि 31 मई तक 9,265 लाख भारतीय कोरोनावायरस से संक्रमित थे, लेकिन केवल 282 लाख मामलों का ही पता चल पाया. अध्ययन आईसीएमआर की तरफ से जून-जुलाई में किए गए चौथे सीरो सर्वेक्षण और 31 मई को राज्यों में केस संख्या पर आधारित है.

विश्लेषण में शामिल एक अधिकारी ने चेताया, ‘सैंपल में वे लोग भी शामिल हैं जिन्हें टीका लगाया गया था. सर्वेक्षण के समय अधिकांश राज्यों में पूर्ण टीकाकरण करा लेने वाली आबाद पांच प्रतिशत से कम थी, फिर अगर यह फैक्टर छोड़ दिया जाए तो अंडरकाउंटिंग का गुणक और भी ज्यादा हो जाने का अनुमान है.


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पिछले हफ्ते जारी चौथे सीरो सर्वेक्षण के परिणामों से पता चलता है कि इस साल जून के पहले सप्ताह तक 67.6 प्रतिशत भारतीयों में सार्स-कोव-2 वायरस के प्रति एंटीबॉडी थे. राज्य वार ब्रेकअप में पाया गया कि 79 प्रतिशत सीरो प्रिवेलेंस के साथ मध्य प्रदेश में सार्स-कोव-2 वायरस के संपर्क में आने वाली आबादी का अनुपात सबसे अधिक था, जबकि केरल में सबसे कम 44 प्रतिशत था.

दिलचस्प यह है कि भारत सरकार पहले कह चुकी है कि अंडरकाउंटिंग केवल कोविड केस की संख्या में हुई है न कि मौतों में, फिर भी स्वास्थ्य सेवाओं के महानिदेशक को राज्यों से मृत्यु पंजीकरण डाटा लेने के लिए कहा गया है. यह कदम सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (सीआरएस) के तहत मृत्यु पंजीकरण में असामान्य वृद्धि को उजागर करने वाली कई रिपोर्ट सामने आने के बाद उठाया गया.

सभी राज्यों में कम कोविड केस रजिस्टर

डाटा दर्शाता है कि सभी राज्यों ने कोविड मामले कम संख्या में दर्ज हुए हैं, लेकिन केवल उत्तर प्रदेश और बिहार ने यह 100 या उससे अधिक के गुणक में रहा है.

कम आंकने के मामले में गुणक मध्य प्रदेश में 86, झारखंड में 70, राजस्थान में 66, गुजरात में 59 और पश्चिम बंगाल में 44 रहा है. इसका मतलब है जब मध्य प्रदेश में आधिकारिक गिनती आठ लाख थी, तब राज्य में वास्तव में 674 लाख लोग संक्रमित थे. वहीं झारखंड में मरीजों की संख्या आधारिक तौर पर तीन लाख होने के दौरान वास्तव में 236 लाख लोग संक्रमण के शिकार थे. जब राजस्थान में आधिकारिक संख्या नौ लाख थी, तब वहां 617 लाख लोग संक्रमित थे. गुजरात में संक्रमण के मामले 481 लाख थे जब उसने केवल आठ लाख मामलों का पता लगाया था और पश्चिम बंगाल में 14 लाख मामलों के आधिकारिक आंकड़े के मुकाबले 607 लाख संक्रमित थे.

स्वास्थ्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ‘दुनिया में कहीं भी सभी कोविड-19 संक्रमणों का पता नहीं चल पाया है. यह आंशिक तौर पर वायरस की प्रकृति पर भी निर्भर है. अधिकांश मामले एसिमप्टोमैटिक होते हैं और उनका पता भी नहीं चलता है. यहां तक कि खुद लोग भी इस बात से अनजान होते हैं, वह इसकी चपेट में आए हैं. सबसे ज्यादा उन्नत स्वास्थ्य प्रणाली वाले देशों में भी यही स्थिति है.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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