नई दिल्ली: गुजरात के भरूच जिले के एक छोटे आदिवासी ब्लॉक झगड़िया में, स्थानीय अस्पताल में सामान्य खून की जांच के लिए आने वाले मरीज एक ऐसी स्टडी में हिस्सा ले रहे हैं, जो पूरे भारत में एनीमिया की जांच का तरीका बदल सकती है.
चल रही इस स्टडी के तहत, एक शोधकर्ता स्मार्टफोन से मरीज की निचली पलकों की फोटो लेता है और कैमरे के लेंस पर उंगली रखकर 30 सेकंड का वीडियो रिकॉर्ड करता है, ताकि खून के बहाव का अंदाज़ा लगाया जा सके. खून की जांच सामान्य तरीके से की जाती है.
इसके बाद तस्वीरों और खून की जांच के नतीजों को एक साथ जोड़कर मशीन लर्निंग मॉडल में डाला जाता है, जिसे एनीमिया पहचानना सिखाया जा रहा है, जैसे खून की जांच करती है, लेकिन बिना सुई के.
इस समय खून लेना सिर्फ एआई को सिखाने के लिए किया जा रहा है. हर तस्वीर को लैब में मापे गए हीमोग्लोबिन के लेवल से मिलाया जाता है, ताकि मॉडल आंखों में दिखने वाले पैटर्न को खास हीमोग्लोबिन स्तर से जोड़ना सीख सके. अंतिम लक्ष्य यह है कि आगे चलकर जांच के लिए खून की ज़रूरत ही न पड़े.
स्टडी का प्रोटोकॉल पिछले साल अप्रैल में प्रीप्रिंट के रूप में प्रकाशित हुआ था.
इसका उद्देश्य है “स्मार्टफोन से कंजंक्टाइवा (आंख की अंदरूनी सतह), जीभ और नाखून के हिस्से की तस्वीरों के साथ-साथ फोटोप्लिथिस्मोग्राम (पीपीजी) सिग्नल का यूज़ करके एनीमिया पहचानने के लिए प्वाइंट ऑफ केयर टेस्ट का संभावित विकास करना और इसकी सटीकता की तुलना सामान्य लैब जांच और प्वाइंट ऑफ केयर हीमोग्लोबिन जांच से करना.” PPG सिग्नल रोशनी के जरिए खून की मात्रा में बदलाव को मापने की तकनीक है.
यह इनोवेशन इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च-नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रिशन (ICMR-NIN) की INFUSE (Innovations in Nutrition & Food for Unified Solutions and Empowerment) पहल के तहत 150 से ज्यादा आवेदनों में से चुने गए 33 इनोवेशन में शामिल है. ICMR-NIN के शोधकर्ताओं ने दिप्रिंट को बताया कि इस पहल का मकसद कुपोषण और खान-पान से जुड़ी बीमारियों से निपटने के लिए तकनीकों की पहचान करना और उन्हें आगे बढ़ाना है.
ये इनोवेशन, जिनमें फूड टेक्नोलॉजी, पोषण आकलन और प्वाइंट-ऑफ-केयर जांच जैसे क्षेत्र शामिल हैं, अब टेस्टिंग, सुधार और पब्लिक हेल्थ प्रोग्राम में शामिल करने के लिए समर्थन पा रहे हैं.
कुछ अन्य आइडिया में आंत के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए किण्वित गेहूं चोकर उत्पाद, पोषक तत्व बढ़ाने के लिए साबुत अनाज चावल फोर्टिफिकेशन तकनीक, और “SmartDiet” व “TruthIn” जैसे डिजिटल टूल शामिल हैं, जो डाइट का आकलन करने और बेहतर भोजन चुनने में मदद करते हैं.
ग्रामीण भारत में एनीमिया की जांच के लिए स्मार्टफोन आधारित मल्टीमोडल एआई स्क्रीनिंग प्रोजेक्ट को Society for Education, Welfare and Action–Rural (SEWA Rural) लीड कर रहा है. इसमें गूगल इंजीनियरिंग और एल्गोरिदम से जुड़ी विशेषज्ञता दे रहा है, गेट्स फाउंडेशन से फंड मिल रहा है और इसे क्लिनिकल ट्रायल्स रजिस्ट्री ऑफ इंडिया में रजिस्टर किया गया है.
इस प्रोजेक्ट में अब तक अलग-अलग उम्र के लगभग 7,000 लोग शामिल हो चुके हैं, जिनमें बच्चे, गर्भवती महिलाएं और दक्षिण गुजरात के आदिवासी समुदायों के पुरुष और महिलाएं शामिल हैं.

एनीमिया और उसकी पहचान
यह स्टडी जिस समस्या को हल करने की कोशिश कर रही है, उसका स्तर बहुत बड़ा है.
एनीमिया एक ऐसी स्थिति है, जब खून में हीमोग्लोबिन पर्याप्त नहीं होता. हीमोग्लोबिन वह प्रोटीन है, जो शरीर में ऑक्सीजन पहुंचाने का काम करता है. यह दुनिया की लगभग एक चौथाई से एक तिहाई आबादी को प्रभावित करता है.
भारत में नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 2019-21 के अनुसार, प्रजनन आयु की 57 प्रतिशत महिलाएं और पांच साल से कम उम्र के 67 प्रतिशत बच्चे एनीमिया से प्रभावित हैं. जिन आदिवासी समुदायों में यह स्टडी हो रही है, वहां इसका स्तर 78 से 96 प्रतिशत तक है.

अभी एनीमिया की पहचान के लिए खून की जांच ज़रूरी होती है. ग्रामीण भारत में इसका मतलब है उपकरण, प्रशिक्षित कर्मचारी और केमिकल, जो समुदाय स्तर पर हमेशा उपलब्ध नहीं होते. इसके कारण बड़ी आबादी की जांच नहीं हो पाती और बीमारी का पता नहीं चलता. अगर स्मार्टफोन आधारित जांच टूल बनता है, जिसमें किसी सामान या खास ट्रेनिंग की जरूरत न हो, तो यह बदल सकता है कि किसकी जांच होती है और कितनी बार होती है.
ICMR-NIN में ड्रग सेफ्टी डिवीजन के वैज्ञानिक और विभाग प्रमुख तथा इस स्टडी के लेखक डॉ. रघु पुल्लाखंडम ने कहा, “भारत में लगभग हर दूसरी महिला एनीमिक है.”
केंद्र सरकार ने 2018 में एनीमिया मुक्त भारत अभियान शुरू किया था, जिसमें डिजिटल और प्वाइंट-ऑफ-केयर जांच टूल के जरिए समुदाय स्तर पर स्क्रीनिंग एक अहम कदम है.
फिर भी, सामान्य खून की जांच के विकल्प अभी सीमित हैं. आंख, जीभ या नाखून के रंग को देखकर एनीमिया पहचानना ज्यादा सटीक तरीका नहीं माना जाता.
डॉ. पुल्लाखंडम ने दिप्रिंट को बताया, “प्वाइंट-ऑफ-केयर फिंगरस्टिक डिवाइस मौजूद हैं, लेकिन इनमें खून का सैंपल लेना पड़ता है, डिवाइस और केमिकल का खर्च होता है, और फील्ड में इनकी सटीकता हमेशा एक जैसी नहीं रहती.”
उन्होंने कहा कि पहले की रिसर्च में बिना खून की जांच के एनीमिया पहचानने के तरीके खोजे गए हैं. इसमें स्पेक्ट्रोफोटोमेट्री और पीपीजी जैसी तकनीकें शामिल हैं, जो रोशनी के जरिए खून की विशेषताओं को मापती हैं.
कम संसाधन वाले इलाकों में स्मार्टफोन के बढ़ते इस्तेमाल के साथ, कुछ स्टडी में यह देखा गया कि क्या मोबाइल कैमरा एनीमिया पहचान सकता है. कुछ तरीके नाखून के नीचे रोशनी के रिफ्लेक्शन या ट्रांसमिशन को मापकर PPG सिग्नल लेते हैं, जबकि कुछ एल्गोरिदम शरीर के हिस्सों के रंग से हीमोग्लोबिन कम होने का संकेत पहचानते हैं.
स्टडी के प्रीप्रिंट में लेखकों ने कहा, “स्मार्टफोन आधारित कुछ तरीकों की सटीकता उम्मीद जगाने वाली रही है, लेकिन अभी तक कोई भी तरीका सख्त जांच या रेगुलेटरी मंजूरी तक नहीं पहुंचा है और न ही बड़े स्तर पर इस्तेमाल हो रहा है.”
AI मॉडल की ट्रेनिंग
इस तरीके का क्लिनिकल बेस नया नहीं है. डॉक्टर लंबे समय से कंजंक्टाइवा (निचली पलक की अंदरूनी परत) को देखकर जांच करते हैं कि वह फीकी तो नहीं दिख रही, जो एनीमिया का संकेत हो सकता है.
जब हीमोग्लोबिन का लेवल कम होता है, तो ऊतकों तक ऑक्सीजन वाला खून कम पहुंचता है, जिससे कंजंक्टाइवा का सामान्य गुलाबी रंग हल्का पड़ जाता है. हालांकि, इंसानी आंख हमेशा इस बदलाव को सही तरीके से पहचान नहीं पाती.
स्टडी के प्रोटोकॉल के अनुसार, यह मॉडल मशीन लर्निंग एल्गोरिदम को स्मार्टफोन से लिए गए डेटा और लैब में पुष्टि किए गए हीमोग्लोबिन के लेवल के साथ ट्रेन करके बनाया जा रहा है. शोधकर्ता आंख, जीभ और नाखून की फोटो लेते हैं और उंगली के सिरे से पीपीजी सिग्नल रिकॉर्ड करते हैं.
खून की जांच में मिले हीमोग्लोबिन का लेवल यह जांचने का आधार बनता है कि मॉडल की भविष्यवाणी कितनी सही है.
शोधकर्ताओं ने बिल्कुल नया एआई मॉडल शुरू से नहीं बनाया क्योंकि इसके लिए बहुत ज्यादा डेटा की ज़रूरत होती. इसके बजाय, वे पहले से मौजूद इमेज पहचानने वाले मॉडल का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिन्हें सामान्य कामों के लिए पहले ही ट्रेन किया जा चुका है और उन्हें एनीमिया पहचानने के लिए ढाला जा रहा है. इसे फाइन-ट्यूनिंग कहा जाता है.
इसके अलावा, वे ऐसे एडवांस मॉडल का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो तस्वीरों को महत्वपूर्ण पैटर्न या विशेषताओं में बदल देते हैं, जिन्हें हीमोग्लोबिन स्तर से जोड़ा जा सकता है.
परफॉर्मेंस की तुलना करने के लिए, वे आसान तरीकों को भी टेस्ट करते हैं—जैसे आंख, जीभ या नाखून के कुछ हिस्सों की लालिमा का विश्लेषण करना और इन मापों से हीमोग्लोबिन का स्तर अनुमान लगाते हैं.
डॉ. पुल्लाखंडम ने कहा, “इस समय मॉडल 75 से 80 प्रतिशत सेंसिटिविटी और स्पेसिफिसिटी हासिल कर रहा है. स्क्रीनिंग टूल के लिए इस चरण में परिणाम उम्मीद जगाने वाले हैं, लेकिन हम इसे और बेहतर बनाने की कोशिश कर रहे हैं. हम इसे लगभग 90 प्रतिशत तक ले जाना चाहते हैं.”
टेस्टिंग का विस्तार कई राज्यों में किया जाएगा
अब स्टडी मल्टी-सेंट्रिक वैलिडेशन चरण में जा रही है, जिसमें अलग-अलग जगहों और अलग-अलग आबादी पर मॉडल को टेस्ट किया जाएगा, ताकि देखा जा सके कि नियंत्रित परिस्थितियों से बाहर भी यह सही काम करता है या नहीं. प्रोजेक्ट से जुड़े लोग इस चरण को कई राज्यों में, क्लिनिक की जगह फील्ड सेटिंग में चलाने की योजना बना रहे हैं.
स्टडी के प्रीप्रिंट में लेखकों ने लिखा, “वैलिडेशन को सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण बनाने के लिए कम से कम 2,322 प्रतिभागियों का सैंपल साइज जरूरी है.”
अगर मॉडल उम्मीद के अनुसार काम करता है, तो शोधकर्ता एक साल के भीतर स्टडी के नतीजे प्रकाशित करने की उम्मीद कर रहे हैं.
डॉ. पुल्लाखंडम ने कहा कि अगर ऐसा होता है, तो अंतिम प्रोडक्ट एक डाउनलोड किया जा सकने वाला स्मार्टफोन ऐप होगा.
आशा कार्यकर्ता, जो दूर-दराज के ग्रामीण घरों में अक्सर स्वास्थ्य सेवा का पहला संपर्क होती हैं, कंजंक्टाइवा की फोटो लेंगी और ऐप मरीज को सामान्य, हल्का, मध्यम या गंभीर एनीमिक के रूप में बताएगा और आगे क्या करना है, इसकी सलाह देगा.
डेटा के मालिकाना हक और गोपनीयता पर, डॉ. पुल्लाखंडम ने कहा कि डेटा भारतीय संस्थानों के पास ही रहेगा. उन्होंने कहा, “मरीजों की तस्वीरों से पहचान से जुड़ी जानकारी हटा दी जाती है, उसके बाद ही गूगल की इंजीनियरिंग टीम के साथ साझा किया जाता है, और हर प्रतिभागी को एक अलग आईडी दी जाती है.”
टीम की योजना है कि गुमनाम डेटा को डेटा-शेयरिंग समझौते के तहत बाहरी शोधकर्ताओं के लिए भी उपलब्ध कराया जाए, ताकि दूसरे समूह भी इसी आधार पर मॉडल बनाने या बेहतर करने की कोशिश कर सकें.
SEWA Rural, झगड़िया, गुजरात में रिसर्च डायरेक्टर डॉ. श्रेय देसाई ने दिप्रिंट को बताया, “हमने सावधानी और जिम्मेदारी से उच्च गुणवत्ता वाला डेटा इकट्ठा किया है. इस डेटा का उपयोग पार्टनर एआई मॉडल बनाने और उसका मूल्यांकन करने के लिए कर रहे हैं. आने वाले महीनों में देश के दूसरे हिस्सों से बड़े डेटा के साथ एआई मॉडल को और बेहतर बनाया जाएगा. हमें उम्मीद है कि एआई मॉडल और यह डेटा हमारे लाखों नागरिकों की मदद करेगा.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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